प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात के सबसे बड़े जिले कच्छ में रैली को संबोधित कर अपने चुनाव अभियान की शुरूआत की. कच्छ के राजनीतिक सामाजिक ढांचें का वृत्तांत.
कच्छ को भाजपा विकास के द्वीप के रूप में पेश कर रही है. यहीं से प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की है. यहां 2001 में भूकंप के बाद कहने को 1.40 लाख करोड़ का निवेश हुआ बताया जाता है और वहां तीन हजार के करीब माइक्रो, मीडियम और छोटी औद्योगिक इकाईयां भी हैं. लेकिन वहां ज़मीन पर विकास की हालत कुछ और है. हर चुनाव हिंदू मुसलमान ध्रुवीकरण से लड़ा जाता है और इस इलाके का असली कुटीर उद्योग शराब की तस्करी है. चुनाव के मौके पर इसी साल मार्च महीने में हुई यात्रा याद आई.
पब्लिक ट्रांसपोर्ट के शुरूआती दिनों से ही कंडक्टर और ड्राइवर जरा टेढ़े लोग हुआ करते हैं. भुज से रापड़ जाती उस सरकारी बस का कंडक्टर भी जरा गुंडा था. वह हाथ में पहने तांबे के कड़े को फेरते हुए अपने भारी बूट दरवाजे के बीच तक लटका कर बैठता था. उसका पैर सवारियों के सामाजिक वजन के हिसाब से पीछे खिसकता था वरना वह जूते से मालिश का मजा देने के लिए ही बैठा हुआ था. वेतन के अलावा यह एक दैनिक बोनस था जो उसे गरमाती रेगिस्तानी दोपहर में चैतन्य और कपट उनींदा एक साथ बनाए हुए था.

अगले स्टैंड पर उतरने के लिए तैयार, एक दाढ़ी वाले मुसलमान बुजुर्ग करीब पचास सेकेंड तक कंधे की मालिश कराते हुए कंडक्टर की भलमनसाहत के जागने का इंतजार करते रहे. जब वह नहीं जगी तो दो सीढ़ी ऊपर आकर खड़े हो गए. यह गुजरात में कहीं भी दिखाई पड़ने वाले साझा संस्कृति के भीतर से पैदा हुए नए सांप्रदायिक न्याय के उदास, खामोश, मानीखेज नमूनों में से एक था, इसकी व्याख्या के लिए सिर्फ एक शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. वह है ‘मोदी’.
सड़क के किनारे पवन चक्कियों की कतारें थीं, नमक के खेत थे, इक्का दुक्का छोटी फैक्ट्रियों की इमारतें थी जिसे विकास कहा जाता है, जिसके बीच के विस्तार में गरीब जहां-तहां चरवाहे ऊंटों के बाल काट रहे थे.
मेहमाननवाज कच्छी संस्कृति पर पैसा केंद्रित गुजराती संस्कृति के अतिक्रमण से खफा रहने वाले मेरे स्थानीय दोस्त सावजराज सिंह का अंदाजा आज फिर गलत निकला. हमने टूथब्रश और मोबाइल चार्जर का वजन ढोना भी मुनासिब नहीं पाया था क्योंकि उनके मुताबिक हड़प्पाकालीन नगर धौलावीरा पहुंचने में चार घंटे, आर्कियोलॉजिकल साइट देखने में दो घंटे और वापस भुज लौटने में चार घंटे लगने थे.
सहयात्री कवि अविनाश मिश्र को अपने काव्यस्रोतों से पक्की जानकारी थी कि एक अन्य सनकी कवि विष्णु खरे तेरह बार धौलावीरा आ चुके हैं लिहाजा वह अपने लू से झुलसे हुए कान ढकने के लिए रुमाल तक नहीं लाया था.
…लेकिन हमें रापड़ पहुंचने में ही साढ़े पांच घंटे लग गए. अभी 95 किलोमीटर का सफर और था. जो अगली बस मिली पक्की रेगिस्तानी थी. ड्राइवर के केबिन के आगे कुंडों में स्टील के दो गिलास खड़खड़ा रहे थे लेकिन डिब्बे में पानी नदारद था. कंडक्टर “धुम्रपान मनाई छै” की सुंदर लिखावट के नीचे बैठा बीड़ी पी रहा था. सावज ने पांच का फटा नोट वापस किया तो उसने और अधिक फटा नोट पकड़ाते हुए कहा, “यहां लेनदेन ऐसे ही चलता है”. आगे की सीट पर बैठी दो औरतों के बाल इस कदर काले थे कि सिर से पल्लू सरकने पर चमक से बस में उजास भर जाती थी.

छोटा सफेद रण पार करने तक सूरज डूब रहा था. आबादी बिरल हो चुकी थी. बस में सवारियां बहुत कम रह गईं थीं. छोटे सफेद रण (सूख चुका समुद्र) और पाकिस्तान सीमा के बीच सिर्फ बारह गांव बसे हुए हैं जिन्हें बेट या द्वीप कहा जाता है.
आखिरकार पांच सवारियां बचीं. दो छोकरे और हम तीन जो दूर टिमटिमाती रोशनियों के बीच के अंधेरे में डूब उतरा रहे थे कि बस सिसकी लेने लगी. घबराए ड्राइवर ने स्पीड कम की तो पता चला कि यह अनवरत सिसकारी थी जो अगले पहिए से पंचर के कारण छूट रही थी. ड्राइवर ने सवारियों से पत्थर लाकर पहियों के नीचे लगाने को कहा और खुद जैक के साथ नीचे लेटते हुए कहा, “अब इस बस में जिगरा नहीं रह गया है”. इससे पहले कि हम बबूल की झाड़ियों से घिरी सिंगल लेन सड़क पर अंधेरे में टायर बदलने का पराक्रमपूर्ण दृश्य अच्छी तरह देख पाते कंडक्टर ने हम तीनों को एक दूध ढोने वाले छोटे ट्रक पर बिठा दिया.
ट्रक के ड्राइवर दशरथ भाई से पूछा गया, “अगर टायर बदलने के बाद बस को धौलावीरा जाना ही था तो हमें इस ट्रक में बिठाने का क्या मतलब होता है.” उन्होंने बताया कि ड्राइवर और कंडक्टर धौलावीरा तक का डीजल पीते हुए वहीं से वापस लौटना चाहते थे. यह आदर्श गुजरात में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का दम भरने वाली सरकार के राज का एक चेहरा है.
दशरथ भाई ने कहा, ‘आदमी ही आदमी के काम आता है.’ उन्हें ‘दोस्ती करना बहुत पसंद है’ वगैरह कहते हुए अपने व्हाट्सएप में मुंबई के उन टूरिस्टों के फोटो दिखाने शुरू किए जिनकी जान उन्होंने छोटा सफेद रण में भटक जाने पर बचाई थी. अंततः उन्होंने तेरह किमी दूर के रिसार्ट का पता बताते हुए कहा कि वे हम लोगों को वहां तक मुफ्त में छोड़ सकते हैं. उन्होंने हमें विचार का समय देने के लिए जनाण गांव की सड़क पर उतारा और आधे घंटे में वापस आने का वादा करके आगे निकल गए.

पहली चीज ये पता चली कि अब धौलावीरा जाने के लिए कोई साधन नहीं मिलेगा. कंटीली झाड़ियों से आती हवा से सड़क किनारे की रेत ठंडी हो रही थी. तारे चटक थे और कुत्तों का रोना स्पष्ट. नौ घंटे बस में धक्के खाने की अकड़न ढीली पड़ रही थी तभी कानों में हैंड्सफ्री के तार खोंसे अंधेरे से एक आदमी सड़क पर आया. सावजराज ने लपककर कच्छी में पहला सवाल किया-
कौन जात हो?
“सोडा… रघुवीर सिंह”
“मैं भी सोडा राजपूत हूं”
“कहां का”
“लखपत जो”
“आईडी निकाल.”
उसने सावजराज के वोटर आईडी के जेब में रखने के बाद हमें पीछे आने का इशारा किया. कोई दो सौ कदम अंधेरे में चलने के बाद एक एकमंजिला इमारत के अहाते में घुसते हुए कहा, “यहां अपन के बाप का राज है”. ये शिक्षकों के लिए बने सरकारी क्वार्टर्स थे. पास में लाइब्रेरी का खंडहर था जिसे भूकंप के बाद जापान की सरकार ने बनवाया था.
सामने एक कमरे में पांच-सात लोग शराब पीते हुए अपने मोबाइल फोनों में डूबे हुए थे. लंबा गलियारा पार करके उसने एक कमरे का ताला खोलकर लाइट जलाई. फर्श पर बीड़ी के टोटों और प्लास्टिक के गिलासों के बीच दो पुराने कंबल और गूदड़ रखे हुए थे. खिड़कियां टूटी हुई थीं. तीन प्लास्टिक की कुर्सियां थीं. एक मेज पर खराब कंप्यूटर रखा था जिसका यूपीएस मोबाइल की बैटरी चार्ज करने के काम आता था. एक पंखा था जो मच्छरों को उड़ाने का काम कर रहा था.
मैंने पूछा, आप करते क्या हैं?
उसने सावज को कच्छी में बताया, अभी हम लोगों ने दो दिन पहले मुसल्लों का एक गांव फूंक दिया. दो सोडा छोकरे मोटरसाइकिल से जा रहे थे उनकी किसी से टक्कर हो गई. मुसल्लों ने उनको मारा तो वे हमारे पास आए. हम लोगों ने जाकर खूब धुनाई किया, आग लगा दिया, सब गांव छोड़कर भाग गए. उसे सुनते हुए जो हमारे चेहरों पर झलक रहा था उसे और गाढ़ा बनाने के लिए उसने कहा, “अब तुम्हारे यहां भी योगी आ गया है सब ठीक हो जाएगा.”
बाद में सावज ने बताया, मुसलमानों के गांव फूंकने की बात झूठ है जो हम पर रौब गांठने के लिए कही गई थी.
याद आया दो दिन पहले हम लोग नलीया में “अत्तर नरगीस” बेच रहे अली मोहम्मद की दुकान पर रुके थे. उनके हाथ में “गुजरात समाचार” अखबार था जिसमें पहले पन्ने पर यूपी में योगी सरकार बनने की ख़बर इस अंदाज में छपी थी- “अवध में आनंद भयो, अयोध्या में राममंदिर बनने का रास्ता साफ हुआ.”
रात में रुकने की जगह देने का आभार प्रकट करने के लिए मैंने उसे यूपी आने का न्यौता दिया तो वह खिल गया, अब तो राममंदिर बनेगा तब कारसेवा करने आएंगे.

पिछले आठ घंटों में हमने सिर्फ एक बड़ा पाव खाकर छाछ पिया था. किसी बहाने खाने का जिक्र चलता इसके पहले एक दुबला पतला आदमी लहराते हुए कमरे के बीच आ खड़ा हुआ. उसने पूछा, “तमे कौण छौ?” उसके घूरने में ऐसी ठंडी क्रूरता थी हम सभी उठकर बैठ गए. सावज ने बताया, हम लोग रघुवीर सिंह के सगे हैं. बस पंचर हो गई इसलिए यहां आना पड़ा.
उस दुबले आदमी को सफेद रण में अंडरग्राउंड बिजली के तार डलवाने का ठेका मिला था. लोहे के खंभों के नमक से गलकर गिर जाने के कारण सरकार ने यह प्रोजेक्ट पास किया था. वह दिन भर नमक की पहाडियों में ब्लास्टिंग करवा कर लौटा था. उसने कहा, “पता होता तो हम आपको रण में ही उतार लेते. जब शाम को आपकी बस वहां से गुजर रही थी, हम लोग बैठे पी रहे थे. रण के खुले में बैठकर पीने का मजा और है.”
कच्छ में शराब विकास के पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के जरिए तीन भाजपा शासित राज्यों महाराष्ट्र, राजस्थान और हरियाणा से पहुंचती है जिसके विशाल नेटवर्क में पुलिस, आबकारी महकमा, माफिया, कैरियर और हिंदू युवा शामिल हैं. मैंने सलाह दी, राजस्थान हरियाणा की शराब मिलावटी भी हो सकती है इसलिए आपको जरा सावधान रहना चाहिए.
उसने अविश्वास से देखते हुए कहा, इधर तो अभी तक कोई शिकायत नहीं आई है. हम लोग माल पहचानते हैं. बीएसएफ वालों से भी लेकर पीते हैं लेकिन खपत ज्यादा होने के कारण पूरा नहीं पड़ता. खुद मेरा बड़ा भाई बूटलेगर है.
“क्या आपका भाई बीएसएफ ब्रिगेडियर है?”
“अरे बाबा, बिरगेडियर नहीं बूटलेगर जिसका मतलब शराब की तस्करी करने वाला होता है.” उसके गर्व से जाहिर था कि इस इलाके में बूटलेगर सम्मानित और प्रभावशाली आदमी होता है.
क्या आप लोग बीजेपी से जुड़े हुए हैं?
“इधर सब हिंदू हिंदू है. सफेद रण से पाकिस्तान बार्डर के बीच के गांवों में अपना ही हिसाब किताब चलता है.”
(तस्वीर साभार – अविनाश मिश्र)