झरिया: यहां ज़मीन के नीचे आग और काला सोना साथ-साथ रहते हैं

झरिया में जमीन के नीचे 90 साल से आग लगी है लेकिन इसे बुझाने का पहला गंभीर प्रयास 1990 में शुरू हुआ.

WrittenBy:सचिन झा शेखर
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झारखंड का 15वां सबसे बड़ा नगर झरिया है. दुनिया की सात प्रतिशत खनिज सम्पदा झारखंड में पायी जाती है. झरिया में भारत में पाए जाने वाले कोयले का सबसे उच्च कोटि का कोयला बिटुमिनस मिलता है. जिससे कोक (कोयले से तैयार किए जाने वाला ठोस ईंधन है. इसका उपयोग स्टील उद्योग में किया जाता है) का निर्माण होता है. झरिया शहर की चर्चा भोजपुरी फिल्मों में काफी देखने को मिलती है. 70 के दशक में वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने झरिया की चर्चा करते हुए लिखा था कि झरिया और मुम्बई में फ़र्क बस इतना है कि झरिया का धन धरती के नीचे है और मुम्बई का धन धरती के ऊपर.

झरिया शहर में प्रवेश करते ही आप एक अलग संस्कृति एबीसी (आरा, बलिया, छपरा के लिए स्थानीय भाषा में प्रयोग होने वाला शब्द) और झारखंड के मूल निवासियों की मिश्रित संस्कृति का एहसास करेंगे. 18वीं सदी में कोयले के इस क्षेत्र में पाए जाने के बाद गंगा के मैदानी भाग से भारी संख्या में लोग रोजगार के लिए झरिया आए और यहीं के होकर रह गये. यही कारण है कि यहां एक नई मिश्रित संस्कृति का विकास हुआ.

झरिया शहर को पहली नजर 1916 में लगी जब पहली दफा यह बात सामने आई कि शहर के नीचे भूमिगत आग लगी हुई है. लेकिन आग के ऊपर ही संस्कृति और सभ्यता बढ़ती रही. झरिया स्वयं जलता रहा और देश को ऊर्जा देता रहा. कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण से पहले किसी निजी खदान मालिक ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया.

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90 के दशक में आम जनता के बीच इस मुद्दे पर चर्चा का दौर चलना शुरू हो गया लेकिन ये राजनीतिक मुद्दा नही बन सका. 2000 में अलग राज्य झारखंड बनने के बाद आम लोगों में कुछ आस जगी थी. 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के वैज्ञानिक सलाहकार अब्दुल कलाम (बाद मे राष्ट्रपति भी बने) आए और झरिया की भूमिगत आग के बारे में उन्होंने कहा, “झरिया की आग को अभी भी रोका जा सकता है, बस कोशिशें तेज हों.”

2000 का दशक आते-आते आम जनता भी झरिया को बचाने के लिए एकजुट होने लगे थी. कई छोटे-छोटे संगठन इसके लिए संघर्ष करने लगे थे. इन संगठनों में प्रमुख नाम झरिया कोलफिल्ड बचाओ समिति का था. इसके नेतृत्व में अनेकों छोटे- बड़े आंदोलन हुए. लोगो का गुस्सा तब फूट पड़ा जब झरिया-धनबाद रेलखंड को 2001 में बंद कर दिया गया.

चुनावों मे भी यह मुद्दा बना. कोल इण्डिया की इकाई बीसीसीएल (भारत कोकिंग कोल लिमिटेड) के द्वारा जब झरिया में शिक्षा के केन्द्र आरएसपी कॉलेज को आग के खतरे के कारण बंद करने की बात की गयी तो युवा नेताओं के नेतृत्व में ऐतिहासिक चिल्ड्रेन पार्क में जोरदार विरोध किया गया.

आम आदमी पार्टी की धनबाद इकाई के युवा नेता भाष्कर सुमन कहते हैं, “झरिया की दुर्दशा के लिए सरकार और बीसीसीएल जिम्मेदार है. समय रहते अगर प्रयास किया गया होता तो शहर आज इस मुकाम पर नहीं पहुंचा होता. आम जनता को जहां बसाया जा रहा वहां न झरिया में लगी आग को बुझाने का पहला गंभीर प्रयास साल 2008 में किया गया. आग लगने के लगभग 90 साल बाद. जर्मन कंसल्टेंसी फ़र्म डीएमटी ने आग के स्रोत का पता लगाकर उसे बुझाने की कोशिश की. इस तकनीक में आग के केन्द्र का पता लगाकर जमीन में बोरिंग कर आग को बुझाया जाता है और फिर खदान के अंदर की खाली जगह को रेत से भर दिया जाता है, ताकि कोयला ऑक्सीजन के सम्पर्क में न आ पाए. आग तो बुझ जाती है लेकिन इस विधि से आग बुझाने में काफी खर्च होता है. इसके बाद यहां गैसों पर पंपिंग करके और सतह को बंद कर आग को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया था. इस प्रयास में बीसीसीएल कंपनी को सीमित सफलता ही मिली.

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2008 के बाद कंपनी ने गहरी और चौड़ी खुदाई करने के बजाय जलते हुए कोयले को हटाने का प्रयास किया था. यह प्रयास अधिक प्रभावी था लेकिन जमीन की सतह को क्षतिग्रस्त करने की वजह से इस तरीके की खूब आलोचना हुई. गर्म कोयले को ठंडा करने के लिए जमीन के ऊपर पानी डालने और खदानों के आस-पास पत्थर लगाने का तरीका भी अपनाया गया. यह भी असफल रहा. 2014 में अपनाए गए तरीके से सबसे ज्यादा सफलता मिली. छह साल पहले जलने वाली कुल जगह नौ वर्ग किलोमीटर थी, जिसे 2014 में 2.2 वर्ग किलोमीटर मं सिमटा दिया गया.

2014 से पूर्व तक दिखावा ही सही लेकिन आग बुझाने के प्रयास चलते रहे. लेकिन 2014 में केन्द्र की और 2015 में राज्य की सरकार बदल गयी. सरकार बदलने के साथ ही डीजीएमएस (डाइरेक्टरेट जनरल ऑफ माइन्स सेफ्टी) ने हाथ खड़े कर दिये. आग बुझाने के लगभग सभी प्रयास या तो खत्म हो गये या कमज़ोर पड़ गए. धनबाद-चन्द्रपुरा रेलखंड को आनन-फानन में बंद कर दिया गया. झरिया का दुर्भाग्य ये रहा कि राजनीतिक रूप से पिछले 50 वर्ष से जिस परिवार का कब्जा रहा वो आपसी संघर्ष का शिकार हो गया.

झरिया के लोकप्रिय नेता नीरज सिंह की हत्या हो गई और वर्तमान विधायक संजीव सिंह जेल चले गए. इसी हत्या के बाद क्षेत्र में किसी जननेता का आभाव साफ दिख रहा है. जिस आरएसपी कॉलेज को बचाने के लिए 25,000 की भीड़ चिल्ड्रेन पार्क में एक आवाज़ में जमा होती थी उसे बिना किसी बड़े विरोध के बंद कर दिया गया.

केंद्र और राज्य सरकारें पुनर्वास योजना चलाने का दावा करती हैं. 2004 में झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकार (जेआरडीए) का गठन किया गया. यह जरेडा के नाम से जाना जाता है. जरेडा ने पुनर्वास के लिए 7,112 करोड़ रुपये का मास्टर प्लान तैयार किया है. इसे दो फेज में 2021 तक पूरा किया जाना है. बेलगढ़िया के बारे में दावा किया जाता है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना के तहत बसाई गई पहली कॉलोनी है. झरिया से विस्थापित हुए लोगों को यहीं बसाया गया है. बेलगढ़िया, धनबाद से कोई 12-15 किलोमीटर दूर है. झरिया से भी यह दूरी लगभग बराबर है. तहलका में 2016 आई एक रिपोर्ट के अनुसार बेलगढ़िया में मूलभूत सुविधाओं की काफी कमी है. पुनर्वास की योजना और मौजूदा स्थिति पर हमने बीसीसीएल के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने बात करने से मना कर दिया.

जुलाई के महीनें में इस पत्रकार ने स्वयं बेलगढ़िया की यात्रा की और पाया कि लोग नरकीय जीवन जी रहे थे. 8 गुणा 10 के कमरे में पूरा परिवार रह रहा था. हालांकि 26 अगस्त को धनबाद में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री रधुवर दास ने कहा था, “भइया हम किसी बड़ी घटना का इतंजार नही कर सकते. झरिया में रोज-रोज भू-धसान की घटनाएं हो रही हैं. एलएंडटी बड़े पैमाने पर जरूरतमंद लोगों के लिए आवास बना रहा है.”

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हालांकि मुख्यमंत्री के बयान की हवा बीसीसीएल के अधिकारी और स्थानीय नेता ही दबी जुबान से निकाल देते हैं, “सब खेल है.” पुनर्वास इतना आसान नहीं है. अपनी जमीन पर जो बसे हैं और जो आग वाले इलाके में हैं, ऐसे परिवारों की संख्या करीब 29,444 है. वहीं बीसीसीएल की जमीन पर जो लोग बसे हैं और आग वाले इलाके में हैं, वैसे परिवारों की संख्या 23,847 है. इस तरह पुनर्वास के लिए कुल 2,730 एकड़ जमीन चाहिए, जबकि बीसीसीएल मात्र 849.68 एकड़ जमीन ही दे सकी है. जरेडा ने भी अब तक सिर्फ 120.82 एकड़ जमीन ही अधिगृहीत की है. यानी अगर बेलगढ़िया की तरह ही जिंदगी और लाखों लोगों को देनी है तो वह सपने.

झरिया की आग को “राष्ट्रीय त्रासदी” घोषित करवाने के लिए 1977 में तत्कालीन सांसद एके राय (मार्क्सवादी समन्वय समिति) ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर किया. कोर्ट ने उनकी अर्जी को स्वीकार भी किया, बाद के वर्षों में यह लाल फीताशाही के चपेट में आ गयी. पिछले महीने मार्क्सवादी समन्वय समिति के ही इकलौते विधायक अरुप चटर्जी ने बेलगढ़िया का दौरा किया और वहां की समस्या पर चिंता जताई. बीसीसीएल से सुविधाओं को बढ़ाने की मांग की. पूर्व में भी कुछ नेताओं ने इस मुद्दे को उठाया था.

बेलगढिया कभी भी झरिया का विकल्प नहीं हो सकता है. चार लाख की आबादी का पुनर्वास का काम बच्चों का खेल नहीं है. बेलगढ़िया जनता के सर ढकने के उपाय से अधिक सरकार का चेहरा छिपाने का उपाय जान पड़ता है. सरकार कितने सुनियोजित ढंग से झरिया को उजाड़ रही है इसे आप समझ सकते हैं. जब आप 2011 की जनगणना रिपोर्ट में झरिया का हाल जानने के लिए उसके वेबसाइट पर जाएगें तो झरिया से जुड़ी तमाम जानकारी उपलब्ध नहीं है. झरिया तिनका-तिनका कर जल रहा है. धनुडीह का अधिकांश क्षेत्र, इडली पट्टी, कुकुरतोपा, भगतडीह, एलयूजी पीट, बागडिगी, लालटेनगंज, बोका पहाड़ी जैसे 13 इलाके नक्शे से गायब हो चुके हैं. आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ने की उम्मीद है. शायद सरकार भी यही चाहती है.

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अगर झरिया खत्म हो जाएगा, बदले में सरकार को अरबों का राजस्व भी प्राप्त हो जाएगा. लेकिन बदले में ये 4 लाख आबादी कहां जाएगी उस परिवार का क्या होगा जो एक सदी से ज्यादा समय से यहीं पर रहते आए हैं.

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पिछले वर्ष नंदन कानन एक्सप्रेस से इस लेख का रिपोर्टर दिल्ली आ रहा था. साथ की सीट पर झरिया के बोका पहाड़ी क्षेत्र के रहने वाले मुकेश भी यात्रा कर रहे थे. बातचीत में उसने बताया कि बीसीसीएल ने उसके परिवार को विस्थापित कर दिया. उसके पास कोई रोजगार भी नहीं है. वह पढ़ा लिखा भी नही है. कुछ दिन पूर्व एक एजेन्ट ने 10 हजार रुपए लेकर उसे गुरुग्राम के एक फैक्टरी में नौकरी लगवा दिया. वहां उसे 8 घंटे तक लेथ मशीन पर काम करना होता है. जिसके कारण उसके कानो में 24 घंटे तक झनझनाहट रहती है. उसे मात्र 8,000 रुपया महीना तनख्वाह मिलती है. मुकेश ने ही बताया कि काफी संख्या में झरिया से उजड़ चुके परिवार की महिलाएं गुरुग्राम के घरों मे झाड़ू-पोछा का काम कर जीवनयापन रही हैं. सरकार ने पुनर्वास का कोई पुख्ता रोडमैप नहीं बनाया तो 4 लाख की आबादी का अधिकतर हिस्सा महानगरों मे आकर मजदूर बनने को मजबूर हो गया.

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस प्रकार से टिहरी शहर और नर्मदा धाटी को बचाने के लिए व्यापक आंदोलन हुआ. उस तरह के आंदोलन की संभावना फिलहाल झरिया में होती नहीं दिख रही. झरिया के लोगों के एक बेहतर भविष्य के लिए उनके मुआवजे और आवास के लिए भी एक व्यापक जनआंदोलन की जरुरत है.

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