एसआईआर के दौरान अंतिम मतदाता सूची से 5,505 नाम हटाए गए. इनमें से 2,496 नाम एईआरओ द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों के आधार पर हटाए गए, जबकि 240 नाम ईआरओ द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों के आधार पर हटाए गए.
विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग का जोर एक ही बात रहा- 'कोई भी पात्र मतदाता छूट न जाए'. यहां तक कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की तमाम प्रेस रिलीज से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक यही नारा दोहराया गया. लेकिन उत्तराखंड के गदरपुर निर्वाचन क्षेत्र में अंतिम मतदाता सूची की पड़ताल के दौरान हमें कुछ और ही कहानी नजर आई.
बताते चलें कि उत्तराखंड के गदरपुर निर्वाचन क्षेत्र में फॉर्म 7 (यानि दूसरों के नाम वोटर सूची से हटाने के लिए आवेदन) और फॉर्म 8 (सुधार के लिए आवेदन) के मामलों में यह इलाका राज्य में दूसरे नंबर पर है. यहां 10 असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (एईआरओ) और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ईआरओ) ने 18 सितंबर और 28 सितंबर- इन दो तारीखों पर कुल 2,742 आपत्तियां दर्ज कीं. ये दोनों तारीखें 13 अगस्त को 'दावे और आपत्तियां' दर्ज करने की समय-सीमा खत्म होने के एक महीने से भी ज्यादा समय बाद की थीं. दूसरी तारीख तो अंतिम मतदाता सूची जारी होने से महज पांच दिन पहले की थी.
गदरपुर में, एसआईआर के दौरान अंतिम मतदाता सूची से 5,505 नाम हटाए गए. इनमें से 2,496 नाम एईआरओ द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों के आधार पर हटाए गए, जबकि 240 नाम ईआरओ द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों के आधार पर हटाए गए. अन्य लोगों द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियों के बाद 240 नाम और हटा दिए गए, जबकि बाकी 2,529 नामों को बिना किसी आपत्ति के ही हटा दिया गया.
गौरतलब है कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 22 के तहत, ईआरओ (निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी) किसी नाम को तब भी हटा सकता है, जब उसके खिलाफ 'फॉर्म 7' में कोई आपत्ति दर्ज न की गई हो. ऐसा तब किया जा सकता है जब मतदाता की मृत्यु हो गई हो या वह अब उस निर्वाचन क्षेत्र में न रहता हो या किसी अन्य कारण से अयोग्य हो गया हो. हालांकि, ऐसा करने से पहले मतदाता को अपनी बात रखने का उचित अवसर देना अनिवार्य है.
मालूम हो कि दावों और आपत्तियों को दर्ज कराने की अवधि 14 जुलाई से 13 अगस्त, 2026 तक थी. उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा प्रकाशित 'फॉर्म 10' के रिकॉर्ड के अनुसार, 13 अगस्त तक 4,785 नामों के खिलाफ आपत्तियां दर्ज की गईं, जबकि 2,828 नामों के खिलाफ आपत्तियां समय-सीमा समाप्त होने के बाद दर्ज की गईं. इनमें से 763 आपत्तियां 18 सितंबर को और 1,979 आपत्तियां 28 सितंबर को ईआरओ और एईआरओ द्वारा दर्ज की गईं. बाकी 83 आपत्तियां अन्य लोगों द्वारा दर्ज की गईं, जिनमें भाजपा नेता चंकित हुरिया द्वारा दर्ज कराई गई 27 आपत्तियां भी शामिल हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री ने गदरपुर की ईआरओ अमृता शर्मा से दावों और आपत्तियों की समय-सीमा खत्म होने के बाद ईआरओ और एईआरओ द्वारा इतनी बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज करने को लेकर सवाल किया. जवाब में शर्मा ने कहा, "असल में, हमारे अधिकारियों को यह जानकारी नहीं थी कि जो लोग अनुपस्थित थे, उनके लिए भी 'फॉर्म 7' तैयार करना जरूरी है. उन्होंने ऐसे मतदाताओं को चिह्नित तो कर लिया था लेकिन उनके लिए 'फॉर्म 7' के आवेदन तैयार नहीं किए गए थे. जब तक यह बात हमारे संज्ञान में आई, तब तक सुनवाई पूरी हो चुकी थी."
इसी तरह 14 अगस्त को 'फॉर्म 10' रिकॉर्ड में बीजेपी नेता चंकित हुरिया द्वारा दर्ज कराई गई 27 आपत्तियों के बारे में पूछे जाने पर शर्मा ने कहा कि केवल 13 अगस्त तक जमा किए गए फॉर्म ही स्वीकार किए गए थे और 14 अगस्त की प्रविष्टियां उस रात बाद में अपलोड की गई थीं. अधिकारियों की अपनी आपत्तियां 18 सितंबर और 28 सितंबर को दर्ज की गई थीं.
'मैं इतने सालों से वोट डालती आ रही हूं, तो मेरा नाम क्यों हटा दिया गया?'
गदरपुर के सकनिया गांव में 15x20 फुट के एक छोटे से कमरे में 40 वर्षीय संजना अकेली रहती हैं. उनके पति प्रेमपाल का लगभग दो साल पहले निधन हो गया था. वह गांव में घरों में काम करती हैं और लगभग 20 सालों से सकनिया में वोट डाल रही हैं. अंतिम मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया है, जबकि उनके पति का नाम अभी भी उसमें मौजूद है.
संजना के अनुसार, उन्होंने बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को अपने पति की मृत्यु के बारे में बता दिया था. उन्होंने उनके मृत्यु प्रमाण पत्र भी दिया था. पति की मृत्यु के कुछ समय बाद ही राशन कार्ड से उनका नाम हटा दिया गया था और परिवार को उनके नाम पर राशन मिलना बंद हो गया था. लेकिन मतदाता सूची में उनका नाम बना रहा, जबकि संजना का नाम हटा दिया गया.
उन्होंने पूछा, "मैंने उनसे कहा कि जिस व्यक्ति का नाम हटाया जाना चाहिए था, उसका नाम तो उन्होंने हटाया नहीं. इसके बजाय, उन्होंने मेरा नाम हटा दिया. मैं इतने सालों से वोट डालती आ रही हूं, तो मेरा नाम क्यों हटा दिया गया?"
'न्यूजलॉन्ड्री' की टीम के वहां पहुंचने से दो दिन पहले ही संजना को उनके नाम हटाए जाने की जानकारी मिली. जब बीएलओ ने उन्हें दिखाया कि उनका नाम सूची से हटा दिया गया है. इसके बाद बीएलओ ने उनके कागज फिर से लेकर आनलाइन आवेदन किया.
98 साल की एक वोटर का नाम भी हटाया गया
इसी तरह गदरपुर की रहने वाली 98 साल की बागो बाई का नाम भी अंतिम मतदाता सूची से गायब है. बागो बीते कई दशकों से वोट डालती आ रही हैं. उनके पास 1995 में जारी एक वोटर आईडी कार्ड है. इसके अलावा एक और कार्ड जो 2020 में जारी हुआ था. यहां तक कि 2003 की मतदाता सूची में भी उनका नाम मौजूद है. उनके परिवार के अनुसार, वह लगभग 1950 से इस इलाके में रह रही हैं और तब से लगातार चुनावों में वोट डालती आ रही हैं. एसआईआर के बाद उनका नाम हटा दिया गया, जबकि परिवार के बाकी सदस्यों के नाम मतदाता सूची में है.
जब 17 अक्टूबर को 'न्यूजलॉन्ड्री' की टीम उनके घर पहुंची, तो उनके पोते राजिंदर सिंह ने बताया कि परिवार को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि उनका नाम हटा दिया गया है.
राजिंदर ने कहा, "हमें कोई नोटिस नहीं मिला. कोई हमारे घर नहीं आया. हमें किसी भी बात की कोई सूचना नहीं दी गई."
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर मिला, फिर भी नाम हटा दिया गया
गदरपुर के कई परिवारों का इतिहास पलायन और फिर से बसने का रहा है. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भारत सरकार ने कई विस्थापित परिवारों को इस इलाके में बसाया और उन्हें जमीन आवंटित की. ऐसा ही एक परिवार रीता मंडल का है, जो मूल रूप से बांग्लादेश से आए थे.
हालांकि, रीता का जन्म और पालन-पोषण गदरपुर इलाके में ही हुआ है. वह घर पर रज़ाइयां बनाती हैं और हरेक रज़ाई के लिए उन्हें 100 से 150 रुपये मिलते हैं, जबकि उनके पति, सजल मंडल, दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर काम करते हैं. इस परिवार में चार बच्चे- मुकेश, राकेश, अर्पिता और सपना- भी हैं, और घर चलाने के लिए परिवार मुख्य रूप से सजल की कमाई पर ही निर्भर है.
परिवार के पास ऐसे कई दस्तावेज़ हैं जो गदरपुर में उनके लंबे समय से रहने की पुष्टि करते हैं. उन्होंने हमें पुराने वोटर रिकॉर्ड, वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड, बिजली के बिल और परिवार रजिस्टर दिखाया. यहां तक कि इस परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर भी मिला हुआ है.
रीता ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, "जब मैं गदरपुर तहसील कार्यालय गई, तो उन्होंने मुझे बताया कि सभी के नाम हटा दिए गए हैं. मैंने उनसे पूछा कि हमारे नाम क्यों हटाए गए हैं? अगर बच्चों के नाम हटा भी दिए गए तो हमारे नाम क्यों हटाए गए? मैं और मेरे पति पुराने वोटर हैं."
रीता ने बताया कि उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि उनका नाम क्यों हटाया गया, लेकिन उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला.
रीता ने कहा, "जब मैंने आंगनवाड़ी मैडम से पूछा कि मेरा नाम क्यों हटाया गया और मुझसे क्या गलती हुई है, तो उन्होंने बताया कि पहचान पत्र में मेरा सरनेम (उपनाम) नहीं है. मैंने उनसे कहा कि मेरा सरनेम तो शुरू से ही था. फिर उन्होंने कहा कि शायद कोई और वजह होगी, लेकिन उन्हें नहीं पता कि वह क्या है."
रीता के अनुसार, एसआईआर के दौरान मांगे गए दस्तावेज वह पहले ही जमा कर चुकी थीं. जब उनसे तहसील कार्यालय में नया 'फॉर्म 6' जमा करने के लिए कहा गया तो उन्हें बताया गया कि वे इसे कहीं और से ऑनलाइन भर दें, क्योंकि कार्यालय में ऐसी कोई सुविधा नहीं है. उन्होंने फिर से अपने आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, बिजली का बिल और परिवार रजिस्टर नया कार्ड बनाने के लिए जमा किया.
उन्होंने कहा, तहसील कार्यालय के हर चक्कर में एक दिन का काम छूट जाता है और आने-जाने पर किराया भी लगता है. उन्होंने कहा, "हम मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग हैं. हमें अपना काम छोड़कर बार-बार वहां जाना पड़ता है. अगर हम काम नहीं करेंगे, तो पैसे कहां से आएंगे?"
'मुझे समझ नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों हुआ'
गदरपुर के रामबाग गांव में प्रकाश मलिक और उनके बेटे पुरुषोत्तम ने देखा कि अंतिम मतदाता सूची से उनके नाम गायब हैं, जबकि प्रकाश की पत्नी और बहू के नाम उसमें मौजूद हैं. पुरुषोत्तम साल 2013 से वोट डाल रहे हैं. वह कहते हैं, उनके परिवार ने चुनाव अधिकारियों द्वारा मांगे गए सभी दस्तावेज जमा कर दिए थे. प्रकाश के नोटिस में "ईआरओ द्वारा दर्ज कोई अन्य कारण" बताया गया था जबकि पुरुषोत्तम के मामले में मौजूदा मतदाता सूची और पिछली एसआईआर सूची में उनके पिता के नाम में अंतर होने का हवाला दिया गया था.
कई बार दस्तावेज जमा करने के बावजूद, दोनों के नाम हटा दिए गए. बाद में बीएलओ ने उनसे कहा कि वे अपना नाम फिर से जुड़वाने के लिए 'फॉर्म 6' भरें.
पुरुषोत्तम ने पूछा, "मुझे समझ नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों हुआ, अगर हमारे दस्तावेजों में कोई कमी थी, तो हमें पहले क्यों नहीं बताया गया?"
1971 के युद्ध के बाद, जब यह परिवार तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर आया था, तो सरकार ने उन्हें इस इलाके में बसाया था. पुरुषोत्तम ने 'न्यूजलॉन्ड्री' को जमीन के दस्तावेज दिखाए, जिनसे साबित होता है कि वे दशकों से वहां रह रहे हैं.
इसी तरह 67 वर्षीय बुध राय ने भी पाया कि उनका नाम सूची से हटा दिया गया है, जबकि वे 18 साल की उम्र से ही मतदान करते आ रहे हैं. उन्होंने बताया कि उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला था और अब उनसे फिर से मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के लिए कहा जा रहा है. उन्होंने कहा, "मैं इतने सालों से वोट डाल रहा हूं. अचानक मेरा नाम हटा दिया गया है. मुझे तो यह भी नहीं पता कि ऐसा क्यों हुआ." पुरुषोत्तम के अनुसार, गांव में लगभग 40 लोगों के नाम हटा दिए गए हैं.
क्या कहती हैं ईआरओ?
गदरपुर की ईआरओ अमृता शर्मा के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनमें से ज्यादातर या तो सुनवाई के लिए नहीं आए या उन्होंने जरूरी दस्तावेज जमा नहीं किए या फिर ऐसे दस्तावेज दिए जिनसे जरूरी संबंध साबित नहीं हो सका. उन्होंने बताया कि गदरपुर में लगभग 52,000 नोटिस जारी किए गए थे और अलग-अलग बूथों पर सुनवाई के लिए 10 एईआरओ नियुक्त किए गए थे.
शर्मा ने दावा किया, "बिना नोटिस दिए एक भी नाम नहीं हटाया गया. सभी को नोटिस भेजे गए थे."
जब न्यूज़लॉन्ड्री ने संजना और 98 साल के एक वोटर के मामलों का ज़िक्र किया तो शर्मा ने कहा कि वह कोई भी टिप्पणी करने से पहले रिकॉर्ड की जांच करेंगी. उन्होंने बताया कि एसआईआर में सत्यापन की ज़िम्मेदारी बीएलओ की होती है, और अगर कोई चूक पाई जाती है, तो बीएलओ के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
जब उनसे पूछा गया कि अगर वोटरों के नाम हटाकर उनसे दोबारा आवेदन करने को कहा जा रहा है तो फिर एसआईआर का क्या मतलब था? इस पर शर्मा ने कहा कि यह प्रक्रिया सिर्फ गदरपुर तक सीमित नहीं थी.
देखिए ये खास रिपोर्ट.
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