प्रधानमंत्री विदेश जाते हैं तो स्वागत एक इवेंट बन जाता है. विदेश से लौटते हैं तो वह भी इवेंट होता है. किसी योजना की शुरुआत हो, किसी उपलब्धि का जश्न हो या कोई खास दिन सब कुछ बड़े पैमाने पर मनाया जाता है.
आंदोलनजीवी, अर्बन नक्सल, खान मार्केट गैंग, टुकड़े-टुकड़े गैंग, नाराज़ फूफा... ये कुछ ऐसे नाम हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलग-अलग मौकों पर अपने विरोधियों और आलोचकों को दिए हैं.
नामकरण करना उनका पुराना शौक है. इसबार हमने भी उन्हें नाम दिया है, इवेंटजीवी प्रधानमंत्री. क्योंकि मोदी के दौर में शायद ही कोई ऐसा मौका हो, जो इवेंट में न बदला गया हो.
इन दिनों प्रधानमंत्री मोदी का जन्मदिन मनाया जा रहा है. एक महीने के जन्मदिन का जश्न कार्यक्रम अभी चल ही रहे थे कि उनके सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर एक और बड़े अभियान की शुरुआत हो गई. यानी एक इवेंट खत्म नहीं होता कि दूसरा शुरू हो गया.
मौका कोई भी हो उसे बड़े आयोजन में बदल देना प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति की खास पहचान बन चुका है. कोरोना महामारी के दौरान भी इसकी झलक देखने को मिली. जब देश महामारी से जूझ रहा था, तब लोगों से ताली और थाली बजाने की अपील की गई. उसी समय लाखों प्रवासी मजदूर सैकड़ों किलोमीटर पैदल अपने घरों की तरफ लौट रहे थे. कारोबार ठप था, लोग नौकरियां खो रहे थे और अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ रही थी.
प्रधानमंत्री विदेश जाते हैं तो स्वागत एक इवेंट बन जाता है. विदेश से लौटते हैं तो वह भी इवेंट होता है. किसी योजना की शुरुआत हो, किसी उपलब्धि का जश्न हो या कोई खास दिन सब कुछ बड़े पैमाने पर मनाया जाता है.
लेकिन जिस देश में प्रधानमंत्री का जन्मदिन हफ्तों तक चलने वाले कार्यक्रमों के साथ मनाया जाता है, उसी देश की एक दूसरी तस्वीर भी है. कहीं खुले नाले में गिरकर बच्चों की मौत हो जाती है. कहीं बच्चों को मिड-डे मील में सब्जी की जगह पानी जैसी दाल मिलने की शिकायत होती है. कई गांवों और शहरों में महिलाओं और बच्चियों को पीने का पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. सरकारी अस्पतालों में इलाज और सुविधाओं की कमी की खबरें लगातार आती रहती हैं.
तो आइए देखते हैं, इवेंटजीवी प्रधानमंत्री के कुछ बड़े इवेंट्स.
हिमंत बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्राइड ईस्ट के विज्ञापन भुगतान में धुंआधार बढ़ोतरी
विज्ञापन पर खर्च के मामले में मोदी से आगे निकले योगी, यूपी सरकार ने 8 सालों में खर्चे 6812 करोड़ रुपये