किताबों की उम्र में चाकू-कट्टे: दिल्ली के 'नाबालिग गैंग्स' की कहानी

नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली की तंग गलियों में एक ऐसी दुनिया पल रही है, जहां कई बच्चों के हाथों में किताबों से पहले चाकू और कट्टे पहुंच रहे हैं. आखिर नाबालिग अपराध की इस दुनिया में कैसे और क्यों दाखिल हो रहे हैं?

WrittenBy:अवधेश कुमार
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नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली यानि राजधानी का वो हिस्सा, जहां तंग गलियों और भीड़भाड़ के पीछे एक और दुनिया पल रही है. नाबालिगों का अंडरवर्ल्ड. यहां उम्र छोटी है, लेकिन हाथों में हथियार बड़े. यहां चाकू और कट्टों के साथ ये बच्चे सिर्फ डर नहीं बल्कि मौत भी बांट रहे हैं. कई महीनों तक हमने इस इलाके की खाक छानी. दिन हो या रात उन गलियों से लेकर उन ठिकानों तक पहुंचे. जहां से खौफ की ये कहानियां जन्म लेती हैं. हर वारदात के पीछे छिपे पैटर्न को समझने की कोशिश की और उन चेहरों तक पहुंचे जो इस अंडरवर्ल्ड का हिस्सा बन चुके हैं.

दरअसल, यह उत्तर-पूर्वी दिल्ली की वो गलियां हैं, जिनके भीतर एक ऐसी दुनिया सांस लेती है, जिसे बहुत कम लोग करीब से देख पाते हैं. एक ऐसा अंधेरा संसार जहां कई नाबालिगों के हाथों तक किताबों से पहले हथियार पहुंच जाते हैं. यहां गैंग का हिस्सा बनना और अपराध की दुनिया में कदम रखना कई युवाओं के लिए असामान्य नहीं बल्कि एक कड़वी हकीकत बन चुका है. अक्सर, ये घटनाएं अखबार की सुर्खियां ही बनकर रह जाती हैं. आखिर ये बच्चे अपराध की दुनिया में क्यों बढ़ रहे हैं? क्या आसपास का माहौल इन्हें इस दिशा में ले जाता है? क्या गरीबी, बेरोजगारी और टूटता सामाजिक ढांचा इसकी बजह है? या फिर व्यवस्था इन्हें दूसरा रास्ता ही नहीं देती?

अपराध की दुनिया का हिस्सा बन चुके ये बच्चे हमें बताते हैं कि ये खुला घूमते हैं, सिगरेट पीते हैं. हथियारों का शोक है. ये कहते हैं, "चाकू कट्टे-पिस्टल ये सब हमें हमारे ‘बड़े भाइयों’ से मिल जाता है." हालांकि, वे उन ‘बड़े भाइयों’ का नाम नहीं बताते हैं. हमने अपनी पड़ताल में पाया कि इनके पीछे कुछ बड़े गैंगस्टर काम करते हैं. इनमें कुछ जेल में हैं और कुछ जेल के बाहर हैं. वही इन्हें हथियार और बाकी असलहा भी इन्हीं लोगों से मिलते हैं. इसके बदले इन्हें कुछ सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं.    

इस बारे में हमने वर्तमान और पूर्व पुलिस अधिकारियों से बात की. नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में करीब 14-15 सालों तक क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल का हिस्सा रहे विनय त्यागी कहते हैं कि दिल्ली पुलिस में जिसने जमना पार में नौकरी कर ली, उसने समझो पूरी दिल्ली में कर ली. वह इतना मैच्योर हो जाता है कि अपराधियों के काम करने का तरीका सब समझ लेता है. वहां छोटे से लेकर बड़े से बड़ा अपराध होता है.

अपराध की दुनिया में एंट्री कैसे होती है? इस सवाल पर वह कहते हैं, “इन बच्चों को एक तो रुपये बहुत आसानी से मिल जाते हैं और जो बड़े-बड़े गैंगस्टर्स हैं या जो जेल में हैं. वो इन बच्चों का यूज करते हैं क्योंकि जुवेनाइल एक्ट में प्रावधान है कि तीन साल से ज्यादा की सजा नहीं है. चाहे मर्डर हो या रेप. बड़े-बड़े गैंग्स इन्हें हायर करते हैं. बच्चों को अपनी जरूरतें पूरी करनी होती हैं, उन्हें अपना टारगेट पूरा करना होता है.”

इस डॉक्यूमेंट्री के लिए हमने इन बच्चों, पीड़ित परिवारों, पुलिस, साइकोलॉजिस्ट और क्रिमिनोलॉजिस्ट से बात की है. अपराध करने से लेकर इस अपराध की दुनिया में एंट्री करने के पीछे के पैटर्न को समझने की कोशिश की है. 

देखिए पूरी वीडियो-

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