उत्तराखंड सरकार की ओर से उपलब्ध करवाई गई निवेश की ग्राउंडिंग सूची में ऐसी परियोजनाएं भी दर्ज हैं, जिन पर अब तक काम शुरू नहीं हुआ है.
‘‘मैंने कहा था कि 21वीं सदी का तीसरा दशक उत्तराखंड का दशक होगा. आज यह बात धरातल पर साकार होती दिखाई दे रही है. इसके लिए मैं राज्य सरकार को बधाई देता हूं. डबल इंजन सरकार के प्रयासों से उत्तराखंड में पर्यटन, कनेक्टिविटी और निवेश का माहौल मजबूत हुआ है और राज्य निवेश के नए केंद्र के रूप में उभर रहा है.’’ 8 दिसंबर 2023 को यह बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के उद्घाटन के मौके पर कही थी.
सरकार ने बताया कि समिट में 3 लाख 56 हजार 889 करोड़ रुपये के 1779 एमओयू हुए हैं. एमओयू यानि कंपनी ने समझौता कि वो प्रदेश में निवेश करेगी.
इन्वेस्टमेंट समिट में शामिल होने और प्रदेश में निवेश करने के लिए कारोबारियों से मिलने और उन्हें राजी करने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने अधिकारियों के साथ, लंदन और दुबई में रोड शो किया. इसके अलावा भारत के बेंगलुरू, दिल्ली, अहमदाबाद, चेन्नई और मुंबई में भी रोड शो किया. इस पूरे आयोजन पर प्रदेश सरकार ने करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किए.
दो साल बाद, 2025 में धामी सरकार ने दावा किया कि 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के एमओयू में से एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की ग्राउंडिंग हो चुकी है. ग्राउंडिंग यानि जिन कंपनियों ने एमओयू किया था, उसने अपना काम या निवेश शुरू कर दिया.
न्यूज़लॉन्ड्री ने आरटीआई के जरिए इन कंपनियों की सूची हासिल की. इसमें एक चौंकाने वाली बात सामने आई. जहां समिट में 1779 एमओयू होने का दावा किया गया था, वहीं ग्राउंडिंग की सूची में 3,300 से अधिक संस्थानों और व्यक्तियों के नाम दिए गए. जिन्होंने प्रदेश में निवेश किया है.
हमने पड़ताल शुरू की तो सामने आया कि प्रदेश सरकार के निवेश की गणना करने और परिभाषित करने के तरीके बिल्कुल अलहदा हैं. सरकार ने आटा चक्की से लेकर खाद-बीज की दुकानों और गैर सरकारी संस्थाओं तक को निवेश की ग्राउंडिंग वाली सूची में शामिल किया है. इतना ही नहीं सबसे बड़े निवेशक के तौर पर तो सरकारी कंपनियां या उपक्रम ही नजर आते हैं.
गौरतलब है कि हमारी यह खोजी रिपोर्ट 'ग्राउंडेड इन्वेस्टमेंट' की सूची में शामिल सभी कंपनियों या 1 लाख करोड़ रुपये के कुल निवेश दावे का संपूर्ण ऑडिट नहीं है. इस रिपोर्ट में हमने कुछ ऐसे मामलों की जांच की, जिनमें ‘ग्राउंडेड इन्वेस्टमेंट’ का दर्जा उन व्यवसायों को भी दिया गया, जिन्हें इसकी जानकारी नहीं थी, ऐसे प्रोजेक्ट्स को शामिल किया गया जिनका काम शुरू ही नहीं हुआ था, और कुछ मामलों में सरकारी खर्च को निजी निवेश (प्राइवेट कैपिटल) के रूप में दिखाया गया.
देखिए हमारी यह खास खोजी रिपोर्ट.
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