इस साल मलिहाबाद के पेड़ों पर लटके आमों का आकार छोटा है, फल समय से पहले टूटकर गिर रहे हैं और उत्पादन में भी गिरावट दर्ज की जा रही है. वजह है मौसम का पूरी तरह से बदल चुका मिज़ाज.
आम की दुनिया में मलिहाबाद का वही महत्व है जो दार्जिलिंग का चाय के लिए या कश्मीर का केसर के लिए माना जाता है. हजारों किसान परिवारों की आजीविका, स्थानीय व्यापार, पैकिंग, परिवहन और निर्यात की पूरी श्रृंखला इस फसल पर निर्भर करती है.
ऐसे में जब मौसम का बदलता मिज़ाज इन आम के बाग़ानों को प्रभावित करता है तो सवाल सिर्फ एक फल का नहीं, बल्कि इससे प्रभावित होती किसानों की रोज़ी-रोटी का भी हो जाता है.
मई का महीना अपने अंत पर है और अमूमन यह वह वक़्त होता है, जब बागों में आम तोड़ने की तैयारी आखिरी चरण में होती है. लेकिन इस साल मलिहाबाद के पेड़ों पर लटके आमों का आकार छोटा है, फल समय से पहले टूटकर गिर रहे हैं और कुल उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है. वजह है मौसम का पूरी तरह से बदल चुका मिज़ाज.
दिसंबर-जनवरी की लंबी ठंड से लेकर मार्च-अप्रैल में परागण के समय बिगड़े मौसमी चक्र ने इस बार दशहरी की रंगत छीन ली है.
मलिहाबाद के ग्राम अमलौली में रहने वाले किसान राजकुमार सिंह बताते हैं, “चालीस साल पहले हमारी बाग़ों में आम का उत्पादन बहुत अच्छा हो रहा था. अब यह 40 से 60 फीसदी तक घट गया है.”
इसके अलावा मौसम की मार से फसल बचाने की जद्दोजहद में मलिहाबाद के किसान अंधाधुंध कीटनाशकों और बाज़ार में धड़ल्ले से बिक रही नकली दवाओं के जाल में भी फंस चुके हैं.
केंद्रीय उपोष्ण बाग़वानी संस्थान के निदेशक डॉ. टी. दामोदरन बताते हैं कि आम में सफल परागण के लिए कम से कम 15 दिनों तक तापमान का संतुलित होना बेहद जरूरी है.
मलिहाबाद के बागों पर अगर मौसम की मार पड़ती है तो इसका असर केवल एक इलाके तक सीमित नहीं रहता बल्कि किसान से लेकर बाजार, उपभोक्ताओं और भारत की कृषि विरासत तक पहुंचता है.
चुनौती बड़ी है, लेकिन सवाल यही है कि क्या हम बदलते मौसम के साथ अपनी खेती को समय के हिसाब से ढाल पाएंगे? और क्या आने वाली पीढ़ियां भी मलिहाबाद के दशहरी की वही मिठास चख पाएंगी?
देखिए रिपोर्ट-
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