यह कहानी उन महिला गिग वर्कर्स की है, जो सिर्फ मौसम की मार नहीं झेल रहीं बल्कि एक ऐसी व्यवस्था से लड़ रही हैं, जिसमें उनके लिए कहीं कोई रहम नहीं है.
दिल्ली की इस चिलचिलाती गर्मी में जब पारा 45 डिग्री पार करता है, तो हम अपने एसी कमरों में बैठ कर 'ऐप' पर एक क्लिक करते हैं.. कुछ ही मिनटों में दरवाजे पर घंटी बजती है- कोई आपका मनपसंद खाना लेकर आता है.. कभी पार्लर वाली दीदी या हाउस हेल्प आपकी जिंदगी आसान बनाने आ जाती है लेकिन क्या आपने कभी उस हेलमेट या दुपट्टे के पीछे छिपे चेहरे को गौर से देखा है?
हमारी यह कहानी है उन महिला गिग वर्कर्स की है, जो सिर्फ मौसम की मार नहीं झेल रहीं बल्कि एक ऐसी व्यवस्था से लड़ रही हैं, जिसमें उनके लिए कहीं कोई रहम नहीं है. पुरुषों के लिए भी ये काम आसान नहीं है लेकिन इन महिलाओं के लिए यह एक दम अलग तरह की 'बायोलॉजिकल' और 'सोशल' जंग बन जाती है..
तपती धूप में उनके साथ समय बिताने पर समझ में आया कि हम एक समाज के तौर पर कितने बेरहम हो चुके हैं… बंद दरवाजों और 'नॉट रीचेबल' कॉल्स के बीच, इन महिलाओं के पास काम से ब्रेक लेने और टॉयलेट जाने तक की कोई सुविधा नहीं है.
उनके लिए यह सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं है. यह एक मानवीय और सामाजिक संकट भी है. कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं, ग्राहक सुविधा पा रहे हैं, लेकिन क्या इस सुविधा की कीमत इन महिलाओं को अपनी सेहत और गरिमा से चुकानी चाहिए?
देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट.
नोएडा: मजदूरों की हड़ताल और हिंसा के बाद नोएडा में भारी जाम, सरकार ने मानी मांगें