सुभाष चंद्रा: ताश के पत्तों की तरह बिखरता मीडिया मुगल का साम्राज्य

90 के दशक के मीडिया खिलाड़ी ने पिछले कुछ साल कर्ज चुकाते हुए बिताए हैं. क्या वे वापसी कर सकते हैं?

WrittenBy:तनिष्का सोढ़ी
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अहंकारी को पहचानना आसान होता है. वे खुद का वर्णन करने के लिए चापलूसी करने वाले विशेषणों का उपयोग प्रचुरता में करते हैं; वे अक्सर खुद को किसी अन्य व्यक्ति की तरह नाम लेकर संबोधित करते हैं; वे अपनी बुद्धि को दुनिया के लिए एक उपहार मानते हैं; उनके पास हुक्म बजाने वालों की सेना होती है और सबसे महत्वपूर्ण– वे मानते हैं कि ब्रह्मांड के बड़े से बड़े प्रश्नों के उत्तर उनके जीवन के अनुभवों में निहित हैं.

ज़ी समूह के प्रमुख सुभाष चंद्रा गोयनका, ये सब और इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ हैं.

72 साल के हो चुके चंद्रा को मुख्य रूप से भारत को एक ऐसी चीज से परिचित कराने के लिए जाना जाता है, जिससे नफरत करना हमें प्यारा है और प्यार करने से नफरत है - वो है कंटेंट. उन्होंने 1990 के दशक में भारत के पहले 24/7 निजी समाचार चैनल और निजी सैटेलाइट टीवी की स्थापना की, जो आगे चलकर भारत में करोड़ों का उद्योग बन गया.

वह भारत के इकलौते मीडिया मुगलों में से एक थे; न कि जैन और बिड़ला की तरह, जिनके परिवार का पहले से स्वामित्व है. इससे भी रोमांचक बात है कि चंद्रा एक स्व-निर्मित मीडिया मुगल थे- वे यह कहानी सुनाना पसंद करते हैं कि कैसे वह 17 साल की उम्र में हरियाणा के छोटे से शहर से अपनी जेब में सिर्फ 17 रुपए लेकर दिल्ली आए थे. आगे चलकर चंद्रा ने व्यापार में विविधता लाकर कई तरह के व्यवसायों में हाथ आजमाया जैसे पैकेजिंग, ट्यूब्स, मनोरंजन पार्क और इन्फ्रास्ट्रक्चर या प्रॉपर्टी.

उपरोक्त व्यवसायों में इंगित आखिरी वाला (प्रॉपर्टी) उन्हें महंगा पड़ा. इसने एस्सेल समूह को तहस-नहस कर दिया और इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह थी कि चंद्रा के अधिकांश शेयरों को, समूह की कंपनियों द्वारा लिए गए कर्जों के बदले कोलैटरल यानी गारंटी के रूप में गिरवी रखना पड़ा.

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