मेरी तलाश थी शोहरत और मक़बूलियत, जबकि सफ़दर को जुनून था बदलाव लाने का: नसीरुद्दीन शाह

सारांश के इस अंक में हम जानेंगे कि अपने नाटकों से सरकार और व्यवस्था की नींद उड़ा देने वाले सफ़दर हाशमी का कला के इतिहास में क्या स्थान है.

   bookmark_add
  • whatsapp
  • copy

1973, में एक नुक्कड़ नाटक समूह का जन्म हुआ, नाम था ‘जनम’, यानी जन नाट्य मंच. और इस मंच की शुरुआत की थी मज़दूर आंदोलनों के सांस्कृतिक संबल माने जाने वाले नाटककार, लेखक और शिक्षाविद सफ़दर हाशमी ने. सफ़दर हाशमी को भारत में नुक्कड़ नाटक विधा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है. अपनी पूरी ज़िन्दगी में 24 नाटकों का 4000 से भी ज़्यादा बार मंचन करने वाले सफ़दर हाशमी को कभी किसी ख़ास मंच की ज़रूरत नहीं रही. सड़कें, मज़दूरों की बस्तियां और कारखाने उनका मंच हुआ करते थे और मज़दूर वर्ग ही उनका दर्शक.

सारांश के इस अंक में हम जानेंगे कि अपने नाटकों से सरकार और व्यवस्था की नींद उड़ा देने वाले सफ़दर हाशमी का कला के इतिहास में क्या स्थान है, नुक्कड़ नाटक और राजनीति का क्या संबंध है? और आज नुक्कड़ नाटकों की क्या प्रासंगिकता है?

देखें पूरा वीडियो- 

subscription-appeal-image

Support Independent Media

क्या मीडिया सत्ता या कॉर्पोरेट हितों के बजाय जनता के हित में काम कर सकता है? बिल्कुल कर सकता है, लेकिन तभी जब वह धन के लिए सत्ता या कॉरपोरेट स्रोतों के बजाय जनता पर निर्भर हो. इसका अर्थ है कि आपको खड़े होना पड़ेगा और खबरों को आज़ाद रखने के लिए थोड़ा खर्च करना होगा. सब्सक्राइब करें.

Also see
बरेली के सरकारी स्कूल से ग्राउंड रिपोर्ट: 'ज्यादा दबाव पड़ा तो हम घर बेच कर चले जाएंगे'
दिल्ली: कौन हैं अंजलि हत्याकांड के पांचों आरोपी?
newslaundry logo

Pay to keep news free

Complaining about the media is easy and often justified. But hey, it’s the model that’s flawed.

Comments

We take comments from subscribers only!  Subscribe now to post comments! 
Already a subscriber?  Login


You may also like