मोहम्मद अकरम: दंगा पीड़ित या दुर्घटना पीड़ित?

दिल्ली दंगों के दौरान 24 फरवरी को घायल हुए मोहम्मद अकरम का एक हाथ काटना पड़ा लेकिन पुलिस ने इसे एक्सीडेंट बताकर जांच बंद कर दी.

WrittenBy:बसंत कुमार
Date:
Article image

गाज़ियाबाद के लोनी इलाके में टूटे रास्तों और बारिश के कीचड़ से होते हुए हम बेतरतीब से बने घरों के बीच मौजूद एक छोटे से घर के सामने पहुंचते हैं. यहां हमारी मुलाकात 22 वर्षीय मोहम्मद अकरम से हुई. कमरे में एक बल्ब जल रहा था, लेकिन फिर भी रोशनी कम थी. अकरम ने बिजली के बोर्ड में पंखे का होल्डर लगाने की नाकाम कोशिश की फिर मेरी तरफ असहाय नज़रों से देखने लगा. दरअसल अकरम का दायां हाथ डॉक्टरों ने काट दिया है, वहीं बाएं हाथ की एक उंगली भी काटनी पड़ी है. घटना के छह महीने होने बाद भी उनके बाएं हाथ में प्लास्टर लगा हुआ है. अकरम का आरोप है कि पुलिस उनके ऊपर दबाव डाल रही है, उनके परिजनों को धमका रही है.

तौलिये से अपने हाथों को ढंककर बैठे अकरम बताते हैं, "24 फरवरी को दंगे के दौरान मेरा नाम जानने के बाद दंगाइयों ने मुझ पर हमला कर दिया था. इस हमले में मेरे दोनों हाथ जख्मी हो गए. दाहिना हाथ काटना पड़ा और बाएं हाथ का भी हाल आप देख लीजिए ( वे प्लास्टर लगा हाथ दिखाते हैं. जिसमें एक उंगली नहीं है.)”

अकरम अपनी कहानी जारी रखते हैं, “लेकिन पुलिस वाले कह रहे हैं कि मेरा हाथ एक्सीडेंट में बर्बाद हुआ है. मैंने जिन लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दी है उन पर ना कोई एफआईआर दर्ज हुआ और ना ही उनसे पूछताछ हुई. उल्टा मुझे और मेरे परिजनों को पुलिस वाले धमका रहे हैं."

दिल्ली दंगे में 53 लोगों की हो गई थी मौत

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके के मौजपुर में 23 फरवरी को भारतीय जनता पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने नागरिकता संशोधन कानून ( सीएए) और एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों को संबोधित करते हुए धमकीनुमा भाषण दिया था. यह भाषण पुलिस की उपस्थिति में दिया गया जिसके बाद मुस्तफाबाद, जाफराबाद, कर्दमपुरी, करावल नगर और भजनपुरा समेत कई इलाकों में दंगा शुरू हो गया.

24 फरवरी से 26 फरवरी तक चले इस दंगे में 53 लोगों को अपनी ज़िंदगी खोनी पड़ी. दंगाइयों ने कई घरों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया. हज़ारों लोगों को महीनों तक राहत शिविर में रहना पड़ा. दंगाइयों ने लोगों का बेरहमी से कत्ल किया. कई लोगों को मारकर नाले में फेंक दिया गया. मारने के बाद इसकी जानकारी व्हाट्सएप ग्रुप में दी गई.

मोहम्मद अकरम के साथ 24 फरवरी को क्या हुआ?

अपने भाई के छोटे से घर में बैठे अकरम बुलंदशहर के रहने वाले हैं. 10वीं तक पढ़ाई करने के बाद काम करने के लिए वे दिल्ली आ गए. यहां अकरम ने गांधीनगर में जींस के कारीगर के रूम में काम करना शुरू किया. बीते छह साल में ये कारीगर से जींस के मास्टर हो गए और इनकी आमदनी में 30 से 35 हज़ार महीने की हो गई थी.

24 फरवरी के दिन हुई घटना को याद करते हुए अकरम की आवाज़ लड़खड़ाने लगती है. वे कहते हैं, "24 फरवरी को हुई घटना ने तो मेरी ज़िंदगी पलटकर रख दी. पहले परिवार के लोग मेरी आमदनी पर निर्भर रहते थे. अब मैं खाने से लेकर शौचालय जाने तक दूसरों पर निर्भर हूं. अभी तो मेरी 22 साल की उम्र है."

न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए मोहम्मद अकरम बताते हैं, "मैं मुस्तफाबाद के गली नम्बर 16 में अपने चाचा के साथ रहता था. उन दिनों कसाबपुरा में इस्तेमा चल रहा था. 24 फरवरी को मैं उसी में शामिल होने के निकला था. रास्ते में माहौल सही नहीं देख हम वहां पहुंचने से पहले ही लौट गए. दोपहर के एक से दो बजे के करीब मैं मोहन नर्सिंग होम के पास पहुंचा. वहां हंगामा हो रहा था तो मैं वहीं खड़ा हो गया. मैं जिस तरफ था उस तरफ दूसरे मज़हब के लोग और पुलिसवाले मौजूद थे. मैंने अपनी टोपी निकालकर जेब में रख लिया. मैं सड़क पार कर दूसरी तरफ जाने की सोच रहा था, लेकिन लगातार चल रहे बम, गोले, पत्थर और गोली के बीच निकलने से डर लग रहा था. मैं छिपकर बैठा रहा. पुलिस के लोग दंगाइयों से कह रहे थे मारे कटुओं को. इन्हें हम आज देंगे आज़ादी. तभी कुछ लोगों की नज़र मुझ पर पड़ी. उन्होंने मेरा नाम पूछा और जैसे ही मैंने अपना नाम बताया उन्होंने मुझपर हमला कर दिया."

मोहन नर्सिंग होम की छत से गोली चलाते उपद्रवी

अकरम आगे कहते हैं, "जब उन्होंने मुझपर हमला किया तो मैं सड़क की दूसरी तरफ भागा. जिस तरफ मुसलमान थे, लेकिन उन्होंने मुझे गिरा दिया. मैं सामने की तरफ गिरा तभी मेरे हाथ पर कुछ आकर गिरा. मेरे आंखें में मिर्ची जैसा कुछ अहसास हुआ. काफी तेज आवाज़ हुई थी. फिर देखा तो मेरा हाथ खून से भरा हुआ था. उसके बाद कुछ लोग मुझे उठाकर ले गए. मैं अपना होश खो रहा था. मुझे 33 फुटा रोड के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया. मुझे अपने भाई का नम्बर याद था तो वहां मैंने किसी को उनका नम्बर बताया. भाई ने चाचा को फोन किया. थोड़ी देर में वे अस्पताल पहुंचे. उस प्राइवेट अस्पताल ने मेरा इलाज से मना कर दिया और जीटीबी ( गुरु तेगबहादुर अस्पताल) भेज दिया. उस रोज चारों तरफ बवाल हो रहा था कोई गाड़ी नहीं मिली जो मुझे अस्पताल लेकर जाए. चाचाजी अपने मोटरसाइकिल से मुझे अस्पताल लेकर पहुंचे."

अकरम का 26 मार्च तक जीटीबी अस्पताल में इलाज चला उसके बाद कोरोना को देखते हुए उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया. उनके हाथ में काफी चोट आई थी. इलाज के दौरान 25 फरवरी को डॉक्टर्स ने उनका दाहिना हाथ काटने का फैसला लिया. अकरम बताते हैं, "चोट काफी गहरा था. काफी खून निकल गया था. हाथ में खून का आना जाना रुक गया था. ऐसे में डॉक्टर्स ने हाथ को काटने का फैसला लिया."

जीटीबी अस्पताल से निकलने के दौरान जो रिलीविंग लेटर जारी किया गया है उसमें अकरम के ज़ख्म के बारे में जिक्र है. दोनों हाथों में कई फ्रैक्चर बताया गया है. जब ये अस्पताल पहुंचे तो बाएं हाथ की हड्डियां और मांशपेशियां दिख रही थी. और हाथ की सारी हड्डियों में फ्रेक्चर था. वहीं दाहिने हाथ की बात करें तो सबसे ज़्यादा असर इसी पर था. इसके सारी हड्डियों में फ्रेक्चर दिखा. जिसके कारण इसे काटना पड़ा था.

imageby :

अब तक अकरम के हाथों की चार सर्जरी हो चुकी है. जिसने 3 ऑर्थोपेडिक और एक प्लास्टिक सर्जरी हुई है. अकरम के पेट से मांस निकालकर हाथ में जोड़ा गया है. डॉक्टर्स ने आगे और सर्जरी होने की बात लिखी है.

imageby :
जीटीबी अस्पताल से जारी रिलीविंग लेटर

जीटीबी अस्पताल से निकलने के बाद अकरम अपना इलाज पास के ही एक निजी अस्पताल स्टीफेंस में करा रहे हैं. जीटीबी अस्पताल में अकरम का इलाज करने वाले डॉक्टर संदीप से हमने बात करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं हो पाई.

जब हम अकरम से बातचीत कर रहे थे उसी दौरान उनकी भाभी कहती हैं, "इनका दोनों हाथ तबाह हो गया. बर्बाद कर दिया उन लोगों ने इन्हें." इतना कहने के बाद वो अपनी रोती हुई बच्ची को लेकर वापस चली जाती है.

पुलिस का दावा: मुआवजे के लिए अकरम बोल रहा है झूठ

जैसा हमने बताया कि 26 मार्च तक अकरम का इलाज जीटीबी अस्पताल में चला. यहां भर्ती रहते हुए उन्होंने अपने चाचा के जरिए 13 मार्च को एक शिकायती पत्र दयालपुरी थाने के एसएचओ को लिखा. यह पत्र देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली के मुख्यमंत्री समेत कई उच्च अधिकारियों को भेजा गया.

इस शिकायत में अकरम 24 फरवरी को हुई घटना का विस्तार में जिक्र करते हुए बताते हैं कि कैसे मोहन नर्सिंग होम के सामने लोग जमा थे. कपिल मिश्रा ज़िंदाबाद और जगदीश प्रधान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे. पुलिस वाले दंगाइयों से कह रहे थे कि मारो कटुओं को.

इस पत्र में अकरम कुछ लोगों के नामों का जिक्र करते हैं जो उस उन पर हमले के वक़्त वहां मौजूद थे. उनके हाथों में बंदूक होने की बात कहते हैं.

13 मार्च को अकरम द्वारा दी गई शिकायत
imageby :
imageby :

अकरम की 13 मार्च की शिकायत पर मामला दर्ज करके जांच करने के बजाय पुलिस ने अकरम और उनके परिजनों को ही धमकाना शुरू कर दिया. पुलिस का कहना है कि अकरम मुआवजा हासिल करने के लिए झूठ बोल रहे हैं.

अकरम का मामला देखने वाले दयालपुरी थाने के एएसआई महिपाल सिंह साफ शब्दों में कहते हैं, "यह तो मामला ही ख़त्म हो गया. ये झूठी शिकायत दी थी. इसका शास्त्री पार्क में एक्सीडेन्ट हुआ था. जहां से सौ नम्बर कॉल की गई जिसके बाद पीसीआर की गाड़ी उसे जग प्रवेश अस्पताल लेकर गई. वहां से जीटीबी अस्पताल रेफर कर दिया गया. वहीं इसका हाथ काटा गया. इसका इलाज हुआ. और साथ ही शास्त्री पार्क में मुकदमा दर्ज हुआ."

महिपाल सिंह आगे कहते हैं, "केजरीवाल सरकार ने दंगे में घायल होने पर मुआवजा देने की घोषणा की तो इन्होंने इस घटना को मज़ार के पास का बताना शुरू किया. पैसा लेने के चक्कर में झूठी शिकायत दी. असली कहानी हमने आपको बता दी. यह मामला अब बंद कर दिया गया है."

अकरम को अपनी मोटरसाइकिल से जीटीबी अस्पताल लेकर जाने वाले उनके 42 वर्षीय चाचा जलालुद्दीन पुलिस के दावे को ग़लत बताते हुए कहते हैं, "मुझे भतीजे (अकरम के भाई) का फोन आया तो मैं भागा-भागा पास के प्राइवेट अस्पताल में गया. वहां उसका इलाज नहीं हो रहा था. मैं आधे घण्टे तक गाड़ी देखता रहा जिससे उसे अस्पताल लेकर जा सकूं. जब कोई तैयार नहीं हुआ तो मैं अपनी मोटरसाइकिल से उसे लेकर अस्पताल पहुंचा."

पुलिस के अकरम के एक्सीडेंट में हाथ खोने के दावे पर जलालुद्दीन कहते हैं, "डर और हड़बड़ाहट में कहीं गई बात को पुलिस वाले सच मान रहे हैं. ऐसी स्थिति में कोई कुछ बोल जाता है. हमने उन्हें दोबारा सच बताया, लेकिन उनको सच सुनना नहीं था. पुलिस जांच करने के बजाय अकरम और मेरे परिजनों को ही धमका रही है. मैं बीते दिनों घर से बाहर था तो मेरे घर पर पुलिस के लोग आए थे. उन्होंने में 16 साल के बच्चे को धमकाया की अकरम का पता बताओ नहीं तो तुम्हें जेल में डाल देंगे. अकरम का घर का पता और उसका फोन नम्बर सब शिकायत में उनके पास दर्ज है, लेकिन हमें जानबूझकर धमका रहे हैं."

अकरम की शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज किया गया. इस सवाल के जवाब में महिपाल सिंह कहते हैं, "जब इस मामले में पहले से ही एफआईआर दर्ज है तो फिर दोबारा क्यों एफआईआर करते हम. उस पर तो झूठी शिकायत करके परेशान करने का मामला बनता है. कभी किसी से फोन करा रहा था तो कभी किसी से. बुलाने पर थाने नहीं आ रहा था. उसने शिकायत में जिन लड़कों का नाम लिया था उन्हें हम थाने बुलाए थे. लेकिन उनका लोकेशन वहां का नहीं मिला और पहचान करने के किए शिकायतकर्ता थाने भी नहीं आया ऐसे में हम किसी को कैसे गिरफ्तार कर लेते."

पुलिस एक्सीडेंट का जिक्र क्यों कर रही है?

पुलिस इस मामले में एक्सीडेन्ट का जिक्र यूं ही नहीं कर रही है. दरअसल शास्त्री पार्क में दुर्घटना को लेकर एक एफआईआर 060/2020 दर्ज है. 24 फरवरी को एफआईआर शास्त्री पार्क थाने के सब-इंस्पेक्टर प्रवेश ने कराया है.

शास्त्री पार्क के पुलिस अधिकारी प्रवेश द्वार दर्ज कराए गए इस एफआईआर में लिखा है, "जीटीबी अस्पताल से एक्सीडेंट की ख़बर आने पर मैं (प्रवेश) वहां पहुंचा. जहां शिकायतकर्ता अकरम मिला जो काफी चोट लगने व दर्द के कारण बयान देने की हालत में नहीं था. हमने अकरम की एमएलसी हासिल की. उसके बाद घटनास्थल पर पहुंचे. जहां पर कोई एक्सीडेंट शुदा गाड़ी या गवाह नहीं मिला. जो एमएलसी से, हालात से, मौका मुलाहिजा से जुर्म यू/एस 279/337 आईपीसी का घटित होना पाया जाता है."

24 फरवरी को दर्ज हुई एफआईआर

इसी एफआईआर के आधार पर पुलिस ने अकरम की शिकायत को ग़लत बताकर जांच बंद कर दिया. पुलिस के अनुसार अकरम ने यह शिकायत मुआवजे के लिए दी है. हालांकि अस्पताल में रहने के दौरान एसडीएम की तरफ से 20 हज़ार की मुआवजा राशि अकरम को दी गई थी. यह बात अकरम हमसे बताते हैं.

अकरम से जब न्यूज़लॉन्ड्री इस एफआईआर के बारे में पूछा तो उसने बताया, "जब हम लोग अस्पताल जा रहे थे तो कुछ लोगों ने कहा कि यह मत कहना की दंगे में चोट लगी है, वरना वो लोग इलाज नहीं करेंगे. मैं अस्पताल पहुंचने पर शुरुआत में बोल गया कि एक्सीडेंट हुआ है. पर यह बात वहां के डॉक्टर मान नहीं रहे थे. फिर पुलिस वाले आए और एफआईआर दर्ज कर ले गए. मेरी हालत खराब थी तो मैं कुछ भी नहीं बोल पाया. हालांकि कुछ देर बाद डॉक्टर को मैंने सबकुछ सच-सच बता दिया. उन्होंने सब लिखा भी. जब मैं अस्पताल से लौटा तो जो मुझे कागज़ दिया गया उस पर भी लिखा है कि चोट दंगे के दौरान लगी है. मैं डर और लोगों के कहने पर उस समय एक्सीडेंट वाली बात बोला था. पुलिस के लोग तो हमें सुन ही नहीं रहे. मैंने शिकायत में लोगों के नाम दिए हैं. उन पर कार्रवाई करने के बदले पुलिस हमें ही धमका रही है. मेरी अनुपस्थिति में मेरे चाचा के लड़कों को 4 अगस्त को धमका कर गए वे लोग. मुझे अलग नम्बर से फोन करते हैं. नहीं उठाने पर घर आकर कहते हैं. भाग क्यों रहे हो. मैं आजकल तो घर से निकल भी नहीं रहा."

न्यूजलॉन्ड्री ने इस मामले की पड़ताल में पाया कि पुलिस ने इलाज न होने के डर से कही गई अकरम की एक्सिडेंट की बात को सही माना और बाद में दंगे में हाथ कटने की शिकायत की जांच नहीं की. अकरम को मुआवजे का लालची बताकर पुलिस मामला बंद कर चुकी है और उसपर ही कार्रवाई की बात कर रही है.

पुलिस जिस एफआईआर के आधार पर अकरम को मुआवजे का लालची बता रही है उसे ठीक से पढ़ें तो पता चलता है कि इसमें कोई ठोस जानकारी दर्ज नहीं है. पहली बात एफआईआर में अकरम का कोई बयान दर्ज नहीं है. दूसरी बात घटना की जगह शास्त्री पार्क, लाल बत्ती बताया गया है. पुलिस के अधिकारियों को उस रोज घटनास्थल से एक्सिडेंट का कोई सबूत भी नहीं ला सके, ना ही कोई गवाह उन्हें मिला.

शास्त्री पार्क थाने के सब-इंस्पेक्टर प्रवेश से जब न्यूज़लॉन्ड्री ने उस एफआईआर पर आगे की गई कार्रवाई के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, "शुरुआती जांच में हमें वहां कोई दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी या दुर्घटना होने की सूचना नहीं मिली. वहां कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा है. वहीं इस मामले में कोरोना की वजह से आगे जांच नहीं हो पाई जिस कारण डिटेल एक्सीडेन्ट रिपोर्ट जमा नहीं हुआ अब तक. एक सितंबर से कोर्ट खुल जाएगा उसके बाद हम इसकी रिपोर्ट दाखिल करेंगे."

प्रवेश इसके बाद दबाव के साथ कहते हैं, "मामला एक्सीडेन्ट का ही है. इसमें राइट-फाइट्स जैसा कुछ नहीं है. एमएलसी में डॉक्टर्स साहब ने यह लिख रखा है कि मरीज के अनुसार शास्त्री पार्क लाल बत्ती के पास उसका एक्सीडेन्ट हुआ था."

24 फरवरी को यह कथित एक्सीडेंट हुआ उसके एक महीने बाद कोविड के कारण देश में लॉकडाउन लगा. इस दौरान सबकुछ सामान्य रूप से चल रहा था, लेकिन पुलिस को इस एक्सीडेंट की तहकीकात करने का मौका नहीं मिला.

हालांकि अकरम को डिस्चार्ज के दौरान दिए कागज पर दंगे में चोट लगना बताया गया है. इसको लेकर हमने एक डॉक्टर से बात की तो वह बताती हैं, "यह बात डॉक्टर मरीज के कहने पर लिखते हैं. हकीकत में क्या हुआ यह पता लगाना पुलिस का काम होता है."

घटना के दिन का एक वीडियो हमें मिला है जो बताता है कि पुलिस इस मामले को निपटाने की हड़बड़ी में थी, जबकि सच्चाई कुछ और थी.

पुलिस ने अकरम के मामले में भी जल्दबाजी की. इसमें कोई दो राय नहीं की इन तमाम उलझनों के पीछे अकरम और उसके परिजनों द्वारा डर के कारण दिया गया पहला बयान है जिसमें एक्सिडेंट की बात कही गई थी. अस्पताल द्वारा दंगे में लगी चोट का इलाज नहीं करने के डर से उन्होंने ऐसा कहा और पुलिस ने उसी के आधार पर अपना फैसला सुना दिया.

ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि न्यूज़लॉन्ड्री को अकरम के साथ हुए हादसे के वक्त का एक वीडियो मिला है जो बताता है कि अकरम के हाथ में चोट किसी दुर्घटना के दौरान नहीं लगी बल्कि दंगे के दौरान लगी है.

इस वीडियो में साफ देखा और सुना जा सकता है कि अकरम को चोट दंगे के दौरान लगी है. वीडियो में अकरम के लहूलुहान हाथों को आसानी से देखा जा सकता है. वहीं वीडियो को रिकॉर्ड कर रहा लड़का रिकॉर्डिंग के दौरान कमेंट्री कर रहा है कि भजनपुरा-चांदबाग में पुलिस वाले बम मार रहे है. जो भी मुस्लिम भाई हैं वो जल्द से जल्द यहां पहुंचे. यानी यह वीडियो दंगे के दौरान की ही है.

हमने वीडियो अकरम को भी दिखाया और इसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, "मुझे मालूम नहीं की वीडियो किसने बनाया. घटना के बाद मैं अपने हाथों को देखकर कुछ सोच नहीं पा रहा था. घायल होने के बाद दंगाई मुझे छोड़ गए थे, बाद में कुछ लोगों ने मुझे अस्पताल पहुंचाया."

इस वीडियो का जिक्र जब हमने दयालपुरी थाने के एसआई और अकरम का मामला देख रहे महिपाल सिंह से किया तो उन्होंने कहा, "आप वीडियो और शिकायकर्ता को लेकर थाने आइये और हमें वीडियो दिखा दीजिए."

चोट लगने के बाद कराया गया था स्थानीय अस्पताल में भर्ती

अकरम ने हमें बताया कि चोट लगने के बाद उसे स्थानीय मेहर नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था. वहीं उसके चाचा आए और जीटीबी अस्पताल लेकर गए.

क्या चोट लगने के अकरम को मुस्तफाबाद के 33 फुटा रोड स्थित मेहर नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था. यह जानने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री मेहर नर्सिंग होम में काम करने वाले कर्मचारी से बात की. नर्सिंग होम के पुरुष नर्स शहजाद ने फोन पर बताया, "वह (अकरम) उस रोज आया था. उसके दोनों हाथ बिल्कुल ख़त्म थे. हाथ का हिस्सा उड़ा हुआ था. हमारे यहां उसका इलाज नहीं हुआ, उसे जीटीबी अस्पताल भेज दिया गया."

कितने बजे के करीब में अकरम अस्पताल पहुंचा था, इस सवाल के जवाब में शहजाद बताते हैं, "ठीक से याद नहीं क्योंकि दंगे हो रहे थे. लोग इधर से उधर भाग रहे थे. लेकिन अंदाजन बताये तो 3 से 4 बजे के करीब वो अस्पताल में आया था."

नर्सिंग होम के एक नर्स के मुताबिक अकरम उनके अस्पताल आया था. पुलिस के अनुसार उसका एक्सीडेंट शास्त्री पार्क रेड लाइट के पास हुआ था. यहां से मेहर नर्सिंग होम के बीच दूरी 3 से 4 किलोमीटर है. ऐसे में वह इतना दूर इलाज कराने क्यों आएगा?

वहीं पुलिस अधिकारी महिपाल का दावा है की शास्त्री पार्क में एक्सीडेंट के बाद सौ नम्बर पर फोन किया गया और पीसीआर की गाड़ी उसे जग प्रवेश अस्पताल में ले गई. वहां से जीटीबी रेफर किया है. यह सवालों के घेरे में आ जाता है. अगर शास्त्री पार्क से पुलिस की गाड़ी अस्पताल ले गई तो अकरम मेहर नर्सिंग होम कैसे पहुंचा?

जब हम अकरम के घर से लौटने लगे तो उन्होंने कहा, "सर, मैं मुआवजे के लिए ऐसा नहीं कर रहा. सरकार दो-तीन लाख मुआवजा देगी. उससे क्या होगा? मेरे हाथ वापस आ जाएंगे? मैं भी बस उन लोगों को कठोर सज़ा दिलाना चाहता हूं जिन्होंने मेरा यह हाल किया है. उनके सज़ा होने से भी मेरा हाथ नहीं लौटेगा लेकिन एक सुकून मिलेगा. मेरी पूरी उम्र पड़ी है, लेकिन हाथ नहीं है तो मैं आगे कुछ कर भी नहीं सकता. सरकार को मेरी मदद करनी चाहिए ताकि मैं कुछ कर सकूं."

इस पूरे मामले में जो उलझन है उसके लिए अकरम भी जिम्मेदार हैं. लेकिन उसकी जो हालात थी वैसे में डर के कारण लोगों का सुझाव मानना बहुत ही सामान्य बात है. अकरम और उसके परिजनों ने यही किया जिसका नतीजा यह निकला की आज उसे खुद को पीड़ित साबित करना पड़ रहा है.

Also see
article imageदिल्ली दंगा: दंगा सांप्रदायिक था, लेकिन मुसलमानों ने ही मुसलमान को मार दिया?
article imageदिल्ली दंगा: सोनू, बॉबी, योगी और राधे जिनका नाम हर चश्मदीद ले रहा है
subscription-appeal-image

Power NL-TNM Election Fund

General elections are around the corner, and Newslaundry and The News Minute have ambitious plans together to focus on the issues that really matter to the voter. From political funding to battleground states, media coverage to 10 years of Modi, choose a project you would like to support and power our journalism.

Ground reportage is central to public interest journalism. Only readers like you can make it possible. Will you?

Support now

Comments

We take comments from subscribers only!  Subscribe now to post comments! 
Already a subscriber?  Login


You may also like