आईसीसीआर का दावा नहीं हटाई जा रही मौलाना आजाद द्वारा गिफ्ट की गईं किताबें, लेकिन क्या यह सच है?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 10 हजार किताबें और कुछ पांडुलिपियां, जो अबुल कलाम आज़ाद ने आईसीसीआर को गिफ्ट की थीं उन्हें डिजिटाइज़ेशन करके हटाया जाएगा.

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हमने उनसे पूछा कि वे आगे क्या करने वाली हैं. इस जवाब मेंं आरा कहती हैं, ‘‘मैं मंत्री से बात करूंगी. मैं पीएम साहब और गृहमंत्री से भी बात करूंगी. अगर वे देखभाल नहीं कर पा रहे हैं तो हमें दे दें.’’

एक तरफ जहां लाइब्रेरी से जुड़े एक सीनियर अधिकारी कहते हैं कि मौलाना कलाम के संग्रह में से अभी तक कुछ नहीं छुआ गया और न ही छुआ जाएगा. दूसरी ओर एक और वरिष्ठ कर्मचारी जो इस पूरे प्रक्रिया से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं, वह न्यूज़लॉन्ड्री से कहते हैं, ‘‘अभी तक तो कलाम साहब के कलेक्शन से कुछ नहीं हटाया गया है और तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक वो पूरी तरह से डिजिटाइज़ नहीं हो जाता है. वो किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी को नहीं दिया जाएगा. इसे आईजीएनसीआर जैसे संस्थान को दिया जाएगा, लेकिन अभी पूरा डिजिटाइज़ नहीं हुआ ऐसे में उन किताबों के डोनेशन के बारे में कोई कागजी कार्रवाई नहीं हुई है.’’

वो आगे कहते हैं, ‘‘डिजिटाइज़ेशन का मतलब ये नहीं कि हम किताबें फेंक रहे हैं. ऐसा करके हम किताबें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. आईसीसीआर के साथ विदेश से भी लोग जुड़े हैं, वे भी इन किताबों का फायदा उठा सकेंगे.”

डिजिटाइज़ेशन जारी, बंद हुई लाइब्रेरी

आईसीसीआर में गोशा-ए-आज़ादी के अलावा एक बड़ी लाइब्रेरी भी थी, जिसे अब बंद कर दिया गया है. यहां से किताबें अलग-अलग संस्थानों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी को दी जा रही हैं.

बंद हुई लाइब्रेरी में किताबें अस्त-व्यस्त रखी नजर आती हैं. अलमारी से किताबें हटाकर मेज़ पर रख दी गई हैं. यहां के अधिकारियों की मानें तो ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि यहां कोई पढ़ने नहीं आता था. ऐसे में संस्थान ने फैसला लिया कि जो किताबें जिस कॉलेज या संस्थान के लिए जरूरी हैं हम उन्हें दे दें.

अधिकारी न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, ‘‘हमारे यहां हर साल लाइब्रेरी के लिए किताबें खरीदी जाती थीं. यहां तो कोई पढ़ने आ नहीं रहा था. अब हमारे यहां जो अफ्रीका से जुड़ी किताबें थीं, उन्हें हमने अफ्रीकन सेंटर को दे दिया है. फाइन आर्ट से जुड़ी किताबें ललित कला अकादमी को दी गई हैं, ऐसे ही बौद्ध मत से जुड़ी किताबें सांची विश्विद्यालय को दी गई हैं. इसी तरह जहां, जिस किताब को पढ़ने लोग आते हैं उन्हें वे किताबें दी जा रही हैं. ऐसे में जो किताबें हमारे यहां ऐसे ही रखी रहती थीं वो पाठकों तक पहुंच रही हैं.’’

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