संवाद ऐसे नहीं होता प्रिय नवीन कुमार

मुक्तिबोध के जाति-प्रसंग पर वरिष्ठ पत्रकार और लेखक प्रियदर्शन की प्रतिक्रिया.

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संवाद ऐसे नहीं होता प्रिय नवीन कुमार
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नवीन कुमार का सबसे हास्यास्पद तर्क यह है कि मैंने दिलीप मंडल के अपार अनुयायियों का समर्थन हासिल करने के लिए यह सब किया. दिलीप मंडल और मैं एक दूसरे को सोशल मीडिया पर फॉलो तक नहीं करते. एक-दूसरे के लिखे को अमूमन देख तक नहीं पाते. इस मामले में भी दिलीप या उनके अनुयायियों का कोई समर्थन मुझे मिला, इसका कोई प्रमाण नहीं है.

नवीन कुमार यह भी कहते हैं कि ‘प्रियदर्शन बहुत आगे-पीछे देखकर चलते हैं.‘ इस वाक्य का क्या मतलब है? क्या यह नहीं कि मैं अपने नफे-नुकसान की परवाह करके चलता हूं? लेकिन इस सयानेपन का भी कोई प्रमाण नहीं है. पिछले 35 वर्षों से लगातार लिख रहा हूं. लेकिन समारोहों, पुरस्कारों और आयोजनों से दूर रहा. बीते 10 साल में ले-देकर दिल्ली अकादमी का एक पत्रकारिता पुरस्कार रहा जो मेरे बाद नवीन कुमार को भी मिल चुका है. लेकिन यह पुरस्कार देने वाली हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा को भी नाराज कर बैठा, जब उनकी संचालन समिति से अलग हो गया.

12 किताबें लिखने वाले और सात-आठ किताबों का अनुवाद और संपादन करने वाले और लगभग सप्ताह में तीन टिप्पणियां लिख डालने वाले किसी दूसरे लेखक को देख जाइए तो उसके पास पुरस्कारों, सम्मानों और यात्राओं की झड़ी मिलेगी. हो सकता है कि वे बेकार किताबें, मेरा सारा लेखन बेमानी हो, लेकिन हिंदी की दुनिया किन लेखकों को किन आधारों पर कैसे पुरस्कृत करती रही है- यह मुझे मालूम रहा है. वह सब नहीं किया, क्योंकि बस लिखता रहा. और नवीन कुमार को लग रहा है कि आगे-पीछे देखकर लिखता रहा. इस आरोप के बारे में क्या कहा जाए?

तो दरअसल मेरी एक टिप्पणी को लेकर जो लोग मुझे डरपोक, लिजलिजा, धूर्त, फ्रॉड, चूतिया, बदमाश, बेईमान- सब बोल रहे हैं, जो धमका रहे हैं कि चुपके से निकल नहीं पाइएगा, जो मेरे लेखन को लेकर भ्रम फैला रहे हैं, वे चाहते हैं कि उनसे संवाद किया जाए. फिर दोहरा रहा हूं कि मुक्तिबोध पर दिलीप मंडल के एक शरारती और बेमानी वक्तव्य को इतना उछालने वाले (मंडल के फेंके तीर को कुछ और उछालने की बात अभिषेक श्रीवास्तव ने ही मानी और कहा कि मुद्दा मुक्तिबोध नहीं, दिलीप मंडल हैं) लोगों का इरादा मुक्तिबोध का बचाव करना नहीं, दिलीप मंडल पर हमला करना था और इसके लिए उन्होंने मुक्तिबोध का इस्तेमाल किया.

मुझसे चूक बस यही हुई कि अभिषेक श्रीवास्तव का यह मंतव्य समझ नहीं पाया और मान बैठा कि मुद्दा मंडल नहीं, मुक्तिबोध हैं. वैसे अभिषेक का मंतव्य विश्वदीपक भी कई दिन तक नहीं समझ पाए, मेरी ही वॉल पर उन्होंने लिखा कि मुद्दा मंडल नहीं, मुक्तिबोध ही हैं.

बहरहाल, मेरी शालीनता फिर मुझे मजबूर कर रही है कि बड़े भाई का मान देने के लिए मैं नवीन कुमार का धन्यवाद करूं- यह सलाह देने की गुस्ताखी भी कर लूं कि संवाद करना चाहते हैं तो असहमति को सम्मान देना सीखें, तर्क की सीमा बताएं, नीयत खोजने न बैठें और बरसों से लिख रहे किसी शख्स के लेखन को कुछ धीरज से पढ़ लें- कि वह कितने वर्षों से किन‌ शक्तियों और सत्ताओं के विरोध में खड़ा रहा है और किसका उसने समर्थन किया है, किनसे मदद ली है, किनका साथ देने से इनकार किया है.

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