‘सावरकर को हीरो बनाना देश के लिए बहुत खतरनाक होगा’

सावरकर पर दिए गए बयान के चलते गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत के खिलाफ दर्ज हो रहे एफआईआर.

WrittenBy:बसंत कुमार
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दिल्ली स्थिति गांधी पीस फाउंडेशन के अध्यक्ष और प्रखर गांधीवादी कुमार प्रशांत के खिलाफ हाल ही में ओडिशा के कंधमाल और कटक जिले में दो एफआईआर दर्ज कराई गई है. एफआईआर दर्ज कराने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस के कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कुमार प्रशांत पर हिंदूवादी नेता विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ गलत प्रचार करने और “देश के खिलाफ षडयंत्र” करने का आरोप लगाया गया है.

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कुमार प्रशांत ने भुवनेश्वर में 16 से 18 अगस्त के बीच एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था. यह कार्यक्रम गांधीजी के जन्म के 150 पूरा होने पर किया गया था, जहां उन्होंने ने गांधी, आरएसएस और सावरकर को लेकर अपने विचार रखे थे. यहां प्रशांत ने कहा था, ‘‘भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं है और अंडमान की सेल्यूलर जेल से रिहा होने के लिए सावरकर ने ब्रिटिश राज के साथ सहयोग किया था.’’

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कंधमाल जिले में भागबन मोहंती और कटक में बिस्वराजन नाम के शख्स ने कुमार प्रशांत पर एफआईआर दर्ज कराई है. दोनों पेशे से वकील हैं और आरएसएस से जुड़े हुए हैं. एफआईआर में कहा गया है, कुमार प्रशांत ने वीर सावरकर को कलंकित किया है.”

एफआईआर दर्ज होने पर आरएसएस के प्रवक्ता रविनारायण पांडा ने ‘द लीफलेट’ नाम की वेबसाइट से कहा है कि, “कुमार प्रशांत एक विद्वान व्यक्ति हैं. उन्हें आरएसएस और उससे जुड़े लोगों के बारे में लोगों को गुमराह नहीं करना चाहिए. उन्हें उन किताबों को पढ़ना चाहिए जो भारत छोड़ो आन्दोलन में आरएसएस की भूमिका के बारे में बताती है. वहीं उन्हें यह भी जानकारी होनी चाहिए की आरएसएस बनाने से पहले ही हेडगेवार एक प्रतिष्ठित कांग्रेसी नेता थे.’’

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कुमार प्रशांत 

किसी के लिए हीरो तो किसी के जीरो क्यों है सावरकर

विनायक दामोदर सावरकर जिन्हें कुछ लोग जो खासकर हिंदूवादी विचारधारा से जुड़े लोग एक हीरो के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते है. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने साल 2000 में सावरकर को भारतरत्न देने का प्रस्ताव तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायण को भेजा था जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया. अभी भी बीच-बीच में सावरकर को भारतरत्न देने की मांग उठती रहती है.

वहीं साल 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सांसद के सेंट्रल हॉल में सावरकर की तस्वीर लगवाई. सेंट्रल हॉल में भारत की तमाम महान विभूतियों की तस्वीरें लगी हुई हैं. सावरकर की तस्वीर के सामने महात्मा गांधी की तस्वीर है जिनकी हत्या में शामिल होने का आरोप सावरकर पर लगा था. बापू की हत्या के आरोप लगने के कारण सावरकर की जिंदगी का आखिरी वक़्त बेहद विवादों और उपेक्षा में बीता. अपने आखिरी दिनों में सावरकर सामाजिक जीवन से बिलकुल कटे रहे. फिर भी जो सावरकर कभी आरएसएस या जनसंघ के सदस्य तक नहीं रहे वो आज बीजेपी और तमाम हिंदूवादी संगठनों के प्रिय बने हुए है. उन्हें महान बनाने की कोशिश जारी है.

हिंदूवादी संगठन के लोग जहां सावरकर को ‘वीर’ कहकर संबोधित करते हैं. वहीं दूसरा पक्ष जिसमें ज्यादातर गांधीवादी और वामदलों से जुड़े लोग हैं, सावरकर को अंग्रेजों से माफी मांगने वाला और उनका एजेंट मानते हैं.

सत्याग्रह डॉट कॉम पर छपी एक रिपोर्ट के अनुसार सावरकर पर नासिक के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट एएमटी जैक्सन की हत्या में इस्तेमाल हुए हथियार देने का आरोप लगा था. एएमटी जैक्सन की हत्या की पीछे की वजह थी सावरकर के बड़े भाई गणेश को दी गई सज़ा. रिपोर्ट के अनुसार, इंग्लैंड में कानून की पढ़ाई के लिए रवाना होने से पहले सावरकर ‘मित्र मेला’ नाम के एक गुप्त संगठन के सदस्य थे. इसी का नाम बाद में अभिनव भारत रखा गया. इस संगठन का लक्ष्य हथियार और हिंसा के रास्ते अंग्रेजी शासन को खत्म करना था.

सावरकर के बड़े भाई गणेश उर्फ बाबाराव भी अभिनव भारत के सदस्य थे. अंग्रेज पुलिस ने छापेमारी के दौरान उनको हिरासत में लिया तो उनके पास से बमों का जखीरा बरामद हुआ था. इसके लिए उन्हें आठ जून, 1909 को कालापानी की सजा सुनाई गई.

गणेश के साथियों ने इसका बदला लेने की योजना बनाई. इन्हीं में से एक अनंत कन्हेरे ने 29 दिसंबर, 1909 को एएमटी जैक्सन को गोली मार दी. जैक्सन नासिक के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट थे और उन्हीं की अदालत में गणेश के मुकदमे की सुनवाई हुई थी. हालांकि उन्होंने गणेश को अंडमान भेजने की सजा नहीं सुनाई थी. यह फैसला दूसरे जज का था.

इस हत्याकांड के तुरंत बाद घटनास्थल से ही कन्हेरे को गिरफ्तार कर लिया गया. उनके दो और साथी इस मामले में गिरफ्तार हुए और इनके पास से सावरकर के पत्र बरामद हुए थे. सावरकर पर आरोप लगा कि उन्होंने इस हत्या में इस्तेमाल की गई ब्राऊनिंग पिस्टल और उस जैसी 20 और पिस्टल इंग्लैंड से भारत भिजवाई थीं. इसी के आधार पर टेलिग्राफ से सावरकर के नाम एक वारंट लंदन भेजा गया. सावरकर ने 13 मार्च, 1910 को आत्मसमर्पण कर दिया. फिर उन्हें भारत लाया गया.

जैक्सन की हत्या और अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह के आरोप में सावरकर को दो बार की कालापानी की सजा सुनाई गई. यानी उन्हें कुल 50 साल अंडमान की जेल में रहना था. सावरकर चार जुलाई, 1911 को पोर्ट ब्लेयर पहुंचे थे.

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तस्वीर साभार: SAVARKARSMARAK.COM

सावरकर का माफीनामा

कालापानी की सज़ा के लिए पोर्ट ब्लेयर गए सावरकर ने वहां से किसी दूसरे जेल में भेजने के लिए कई दफा अंग्रेज अधिकारियों को पत्र लिखा. कालापानी की सज़ा बेहद खतरनाक हुआ करती थी. कैदियों से तरह-तरह के अमानवीय काम कराए जाते थे. सावरकर जेल से किसी तरह निकलना चाहते थे. जेल में जाने के बाद सावरकर को भी अंग्रेज अधिकारियों ने बुरा व्यवहार किया. जिससे परेशान होकर सावरकर ने कई दफा पत्र लिखा और रियायत की मांग की.

सत्याग्रह के अपने इस लेख में एजाज अशरफ लिखते हैं, ‘‘साल 1911 में उन्होंने खुद ही सरकार के सामने दया याचिका लगा दी. इस दया याचिका में क्या लिखा गया था आज उसकी जानकारी मौजूद नहीं है लेकिन जब उन्होंने 14 नवंबर, 1913 को दूसरी याचिका भेजी तो इसमें पहली याचिका का जिक्र किया गया था. अपने ऊपर दया करने की गुहार लगाते हुए उन्होंने अंग्रेज सरकार से खुद को भारत में स्थित किसी जेल में भेजे जाने की प्रार्थना की थी. इसके बदले में उन्होंने प्रस्ताव दिया था कि जिस तरह भी संभव होगा वे सरकार के लिए काम करेंगे. सावरकर ने लिखा था कि अंग्रेज सरकार द्वारा उठाए गए सुधारात्मक कदमों से उनकी संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पैदा हुई है. ऐसा कहते हुए उन्होंने घोषणा की थी कि वे अब हिंसा में यकीन नहीं करते.’’

इसी लेख में जिक्र है कि जेल के अंदर बाकी कैदियों को सावरकर आन्दोलन के लिए भड़काते थे लेकिन खुद उसमें शामिल नहीं होते थे. लेख के अनुसार ‘‘इतिहासकार आरसी मजूमदार सावरकर के साथ जेल में रहे त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती के हवाले से लिखते हैं कि सावरकर ने उन्हें और दूसरे कैदियों को भूख-हड़ताल करने के लिए उकसाया था लेकिन खुद उन्होंने और उनके भाई ने इसमें हिस्सा नहीं लिया. वह भी तब जबकि सावरकर से ज्यादा उम्र के कैदी भूख हड़ताल कर रहे थे. सावरकर अपने फैसले को यह कहकर जायज ठहराते थे कि इसकी वजह से उन्हें कालकोठरी में डाल दिया जाएगा और भारत में पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाएगा. इन घटनाओं के आधार पर सावरकर ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं जो तब तक क्रांति का समर्थन करता है जब तक कि उसे खुद इसकी कीमत न चुकानी पड़े.’’

बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट में पत्रकार निरंजन टकले कहते हैं, ‘‘11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचे और 29 अगस्त को उन्होंने अपना पहला माफ़ीनामा लिखा, वहां पहुंचने के डेढ़ महीने के भीतर. इसके बाद 9 साल में उन्होंने 6 बार अंग्रेजों को माफ़ी पत्र दिया.’’

सावरकर की क्षमा याचना किसी रणनीति का हिस्सा

सावरकर का पक्ष लेने वाले तमाम लोग दावा करते हैं कि अंग्रेज सरकार से माफ़ी मांगना उनकी रणनीति थी. वे किसी भी तरह से जेल से निकलना चाहते थे ताकि देश के लिए काम कर सकें. बीबीसी हिंदी से ही एक बातचीत में पत्रकार और इंदिरा गांधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख राम बहादुर राय ने सावरकर के लिए ‘चतुर क्रांतिकारी’ शब्द का इस्तेमाल किया है. उनके अनुसार माफ़ी मांगने के पीछे सावरकर की कोशिश रहती थी कि भूमिगत रह करके उन्हें काम करने का जितना मौका मिले, उतना अच्छा है.

लेकिन कई लोग ऐसा नहीं मानते है. और उनका दावा है कि जेल से लौटने के बाद सावरकर ने अंग्रेज अधिकारियों की मदद की. सावरकर पर लिखी वैभव पुरंदरे की किताब ‘सावरकरः दि ट्रू स्टोरी ऑफ दि फादर ऑफ दि हिंदुत्व’ की आलोचना करते हुए पत्रकार धीरेन्द्र कुमार झा कारवां मैगज़ीन में लिखते हैं, ‘‘अपनी अंतिम याचिकाओं में सावरकर ने ब्रिटिश शासन को आश्वासन देते हुए लिखा है कि भारत से प्रेम करने वाला हर बुद्धिमान व्यक्ति भारत के हित के लिए ब्रिटिश जनता का पूरी निष्ठा और हृदय से सहयोग करेगा.” किताब में सावरकर की क्षमा याचनाओं को उसकी रणनीति बताया गया है लेकिन इतिहास गवाह है कि जेल से बाहर आने के बाद सावरकर ब्रिटिश साम्राज्य को दिए अपने वचन पर कायम रहे. न सिर्फ सावरकर अपने वचन पर कायम रहे बल्कि उसने ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने में भी मदद की. जेल से बाहर आने के बाद सावरकर ने हिंदुत्व के जिस सिद्धांत की रचना की वह मुस्लिम लीग के दो राष्ट्र के सिद्धांत का ही दूसरा रूप था.’’

बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट में निरंजन टकले सावरकर के माफीनामे को रणनीति का हिस्सा बताने वालों को जवाब देते नजर आते हैं. वे कहते हैं, ‘‘सावरकर ने वायसराय लिनलिथगो के साथ लिखित समझौता किया था कि उन दोनों का समान उद्देश्य है गांधी, कांग्रेस और मुसलमानों का विरोध करना. यहीं नहीं अंग्रेज़ उनको पेंशन दिया करते थे, साठ रुपए महीना. वो अंग्रेज़ों की कौन सी ऐसी सेवा करते थे, जिसके लिए उनको पेंशन मिलती थी? वो इस तरह की पेंशन पाने वाले अकेले शख़्स थे.”

सावरकर के माफीनामे को किसी रणनीति  का हिस्सा होने के सवाल पर कुमार प्रशांत कहते हैं, ”रणनीति अगर कायरता की बनाई जाए, रणनीति झूठ बोलने की बनाई जाए, रणनीति धोखा देने की बनाई जाए, रणनीति गुलाम बनाने वाली ताकतों के साथ तालमेल बनाने की बनाई जाए तो मैं उसको रणनीति  नहीं मानता हूं. मैं उसको देशद्रोह मानता हूं. अगर कोई सावरकर को आगे करने के लिए उनके माफीनामे को रणनीति बताता है तो ये बात बहुत हल्की बात है.”

कुमार प्रशांत आगे कहते हैं,  ”जब रणनीति में सफल हो जाते हैं तो आप फिर लौटकर अपने मूल उदेश्य की तरफ लौट जाते हैं. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जिस शर्तनामे से सावरकर छूटकर आए, जिसमें सबसे पहले ये लिखा था कि आज के बाद मैं कभी भी सम्राज्य (अंग्रेजों) के खिलाफ किसी भी मामले में हिस्सा नहीं लूंगा. उसका उन्होंने पूरी ज़िन्दगी ईमानदारी से पालन किया. और आज़ादी की लड़ाई में न खुद कभी हिस्सा लिया और ना अपने से प्रेरित किसी भी संगठन को हिस्सा लेने दिया. इसीलिए तो आज़ादी की लड़ाई का कोई भी इतिहास संघ परिवार के पास नहीं है.”

अपने ऊपर हुए एफआईआर पर कुमार प्रशांत न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं,” जो बात मैंने ओडिशा में सावरकर के संबंध में कही है वो सब पब्लिक डोमेन में है. सावरकर ने एक बार माफ़ी नहीं मांगी थी बल्कि कई दफा उन्होंने ने अंग्रेज सरकार से माफ़ी मांगी थी. जिसमें अलग-अलग तर्कों से वे अंग्रेजों को समझाने की कोशिश करते हैं कि मैं आपके साथ का आदमी हूं. गलती से गलत रास्ते पर गया था. वहां जो भी बोला वो ऐतिहासिक तथ्य है जिसमें से कुछ सावरकर ने अपनी ही किताब में लिखा है कि उन्होंने क्या किया था.”

प्रशांत बताते हैं, “मैंने ये बात भी कहा कि 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी को जो गोली मारी गई उससे पहले उन्हें मारने के पांच और प्रयास हुए थे. सफलता छठे प्रयास में मिली. ये पहले के जो पांच प्रयास थे इन पांचों प्रयास के पीछे एक ही संगठन के लोग थे और उस संगठन का एक ही प्रेरक व्यक्तित्व था, जिसका नाम सावरकर था. ये बात जितने भी तटस्थ  रूप से कही जा सकती है उतने तटस्थ रूप से, बगैर किसी भावावेश के मैंने जनता के सामने रखी है. मैं ऐसा मानता हूं कि जो मैं कह रहा हूं वो एक ऐतिहासिक तथ्य है.’’

कुमार प्रशांत ओडिशा सरकार द्वारा गांधी पर बोलने के लिए बुलाए गए थे. जहां गांधी और विभाजन विषय पर बोलते हुए उन्होंने यह सब कहा था.

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महात्मा गांधी की हत्या का आरोप और नेपथ्य में गए सावरकर

आज़ादी मिलने के एक साल पूरे होने से पहले ही कट्टर हिन्दूवादी नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी. इस मामले में आठ लोगों को आरोपी बनाया गया, जिसमें सावरकर भी थे. हालांकि निचली अदालत से सबूतों के आभाव में सावरकर को बरी कर दिया. लेकिन सावरकर पर लगा ये दाग उन्हें अंतिम दिनों में सामाजिक जीवन से अलग होने पर मजबूर कर दिया.

कई लोगों का मानना था कि सावरकर गांधीजी की हत्या में शामिल थे. इसमें से एक थे तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल. बीबीसी हिंदी के लिए लिखे अपने एक लेख में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम कहते हैं, ‘‘गांधी की हत्या में शामिल मुजरिमों के बारे में आज चाहे जितनी भी भ्रांतियां फैलाई जा रही हों, लेकिन भारत के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल का मत बहुत साफ़ था. पटेल का मानना था कि आरएसएस, विशेषकर सावरकर और हिन्दू महासभा का इस जघन्य अपराध में सीधा हाथ था.’’

वहीं निचली अदालत द्वारा बरी करार दिए गए सावरकर के खिलाफ तत्कालीन सरकार ने हाईकोर्ट में कोई अपील नहीं की. इस पर शम्सुल इस्लाम लिखते हैं, ‘‘यह बात आज तक समझ से बाहर है कि निचली अदालत ने सावरकर को दोषमुक्त किया था, इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सरकार ने हाईकोर्ट में अपील क्यों नहीं की.’’

शम्सुल इस्लाम आगे लिखते हैं, ‘‘सावरकर के गांधी हत्या में शामिल होने के बारे में न्यायाधीश कपूर आयोग ने 1969 में अपनी रिपोर्ट में साफ़ लिखा कि वे इसमें शामिल थे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सावरकर का 26 फरवरी 1966 को निधन हो चुका था.’’

सावरकर को हीरो बनाना खतरनाक

सावरकर को आज भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों के समतुल्य खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले हफ्ते भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के साथ उनकी प्रतिमा लगाई गई. संघ की छात्र इकाई एबीवीपी ने यह काम अंजाम दिया. सावरकर को लगातार हीरों बनाने की कोशिश कुछ संगठन कर रहे है. हाल ही में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा था कि जो ना करे सावरकर का सम्मान उसे मारो सरेआम.

सावरकर को हीरो बनाने की कोशिश पर कुमार प्रशांत कहते हैं,  ”सावरकर को हीरो बनाना देश के लिए बहुत ही खतरनाक होगा क्योंकि सावरकर के पास किसी को दिशा देने के लिए कुछ भी नहीं है. एक पूरा का पूरा झूठ से बना हुआ, अवसरवादिता से गढ़ा हुआ एक व्यक्तित्व नौजवानों को कैसे प्रेरित कर सकता है. ऐतिहासिक तथ्यों को छुपाकर युवाओं को जो बताया जा रहा है वो देश को एक बहुत बड़े खतरे में डालने वाला है.”

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