'पक्ष'कारिता: अर्ध-कुक्‍कुटी न्‍याय में फंसे अखबारों का लखीमपुर 'जागरण'!

पाठकों को झूठ से दैनिक जगाने वाले अखबार की निंदा तो ठीक है, लेकिन कभी-कभी ऐसा करने वाले ट्रिब्‍यून, जनसत्‍ता और राष्‍ट्रीय सहारा का क्‍या किया जाय?

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मठ में दरार?

अच्‍छी रिपोर्टों में अमर उजाला की एक खबर का जिक्र जरूरी होगा जिसमें लखीमपुर कांड की पृष्‍ठभूमि को टेनी और खट्टर के बयानों के आलोक में देखा गया है. इस खबर का शीर्षक है:

लखीमपुर खीरी हिंसा: 'दो मिनट लगेगा केवल' और 'ठा ल्यो लट्ठ' से तैयार हुई तांडव की पटकथा, इसे 'चूक' समझ बैठी भाजपा

अमर उजाला की ही एक और खबर महत्‍वपूर्ण है जिसमें बताया गया है कि स्‍थानीय नेताओं को अंदाजा था कि उपमुख्‍यमंत्री के कार्यक्रम में बवाल हो सकता है इसलिए वे पहुंचे ही नहीं. लखनऊ में इस आशय की चर्चा है कि सूबे के इंटेलिजेंस ने केशव मौर्य को बाकायदे आगाह किया था कि कार्यक्रम में कुछ घट सकता है, फिर भी वे टेनी के पिता के नाम पर हर साल होने वाले कुश्‍ती कार्यक्रम में हिस्‍सा लेने लखीमपुर चले गए. एक वरिष्‍ठ पत्रकार बताते हैं कि इस मामले का योगी आदित्‍यनाथ से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि जान-बूझ कर उनकी सरकार को अस्थिर करने के लिए यह कांड रचा गया. इस बात का जिक्र परोक्ष रूप से खबर में भी है:

जिला भाजपा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक सिर्फ मंत्री की जिद के चलते यह कार्यक्रम हुआ अन्यथा कार्यक्रम में बवाल की जानकारी तो सभी को थी. नाम न छापने की शर्त पर एक भाजपा नेता ने बताया कि अंदरूनी तौर पर संगठन के मनमुटाव के चलते ऐसी विषम परिस्थियां पैदा हुईं. किसी बड़ी घटना की आशंका को लेकर एलआईयू ने भी अपना इनपुट दिया था. लेकिन सबको दरकिनार कर दिया गया.

सवाल उठता है कि क्‍या दूसरे अखबारों के संवाददाताओं को इस आश्‍य की जानकारी नहीं रही होगी? अगर वे केवल यही सवाल उठा देते कि जो सरकार आंदोलनकारियों की जमीन-जायदाद कुर्की कर के कमाई करती हो, उसने 45-45 लाख के मुआवजे पर कुछ घंटों के भीतर हामी कैसे भर दी तो शायद वे समझ पाते कि महन्‍त के मठ में दरार पड़ चुकी है. उन्‍होंने यह सवाल उठाने के बजाय इस पर विपक्ष को लानतें भेजीं, झाड़ू लगा रही प्रियंका गांधी की तस्‍वीर पर मौज ली और 24 घंटे के भीतर योगी सरकार की न्‍याय-प्रक्रिया की जमकर प्रशंसा की.

उधर सुप्रीम कोर्ट के बयानों ने भी किसानों के खिलाफ प्रचार करने के लिए अखबारों को एक टेक दे दी है. आज का दैनिक जागरण देखें:

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लखीमपुर में दो एफआईआर होने की बात सुनी जा रही है. धाराएं और आरोपी अब भी स्‍पष्‍ट नहीं हैं. अखबारों के लिए 'समझौता' हो चुका है और वे गदगद हैं, लेकिन आधी मुर्गी अभी बाकी है. उसे सत्‍ता के रंग का अंडा देना है. असली कहानी यहां है. योगी आदित्‍यनाथ इस बात से वाकिफ़ हैं कि पश्चिमी यूपी उनके हाथ से निकल चुका है. चुनाव नजदीक हैं और वे मध्‍य यूपी या तराई में कोई खतरा नहीं मोल ले सकते. इसलिए अंडे की शक्‍ल एकदम साफ है. 'समझौते' में मध्‍यस्‍थता करने वाले राकेश टिकैत द्वारा महन्‍त जी की प्रशंसा और सुप्रीम कोर्ट का किसानों के प्रति रुख बता रहा है कि किसान आंदोलन के गले में शिकंजा अब कसने वाला है.

इस बीच लखीमपुर कांड में मारे गए पत्रकार रमन कश्‍यप के परिजनों की आवाज 24 घंटे में कहीं गायब हो गयी है. कश्‍यप की मौत की खबर प्रमुखता से कहीं नहीं उठायी गयी है. सूचना यह भी है कि कुछ पत्रकार वहां घायल हुए थे. इस बारे में भी खबर नदारद है. रमन के परिजन मुआवजे और एक नौकरी की मांग कर रहे थे. सूचना है कि सरकार और किसानों के 'समझौते' में उनका भी नाम शामिल है, हालांकि सरकार की ओर से इस बारे में कहीं कोई बात नहीं है कि इस पत्रकार को किसने मारा. नोएडा से जाकर लल्‍लनटॉप ने रमन के पिता से बात की और इस बातचीत में हत्‍या करने वाले की पहचान बिलकुल साफ है, लेकिन यूपी के स्‍थानीय अखबार अब भी चुप हैं.

आज उत्‍तर प्रदेश के कुछ पत्रकार संगठन शायद हरकत में आवें और रमन की हत्‍या के संदर्भ में शासन को ज्ञापन सौंपें, ऐसी खबर हैं. अखबारों को हालांकि अब न तो खबर से मतलब है, न ही पत्रकारों से. कोई जीये या मरे, बस न्‍याय तुरंत होना चाहिए. दोनों ओर बराबर होना चाहिए. बिना किसी मोह के. किसी को महानता का मौका नहीं दिया जाना चाहिए क्‍योंकि यूपी में महन्‍त हैं यानी हर किस्‍म के विपक्ष का अन्‍त है.

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