जौनपुर: दलित पत्रकार को भाजपा नेता द्वारा पीटने और धरने पर बैठने का पूरा मामला

दलित पत्रकार का आरोप है कि उन्होंने दलितों से जुड़ी एक खबर की थी जिसके बाद उन्हें भाजपा नेता और उनके सहयोगियों ने बुरी तरह पीटा, जिसमें उनकी टांग भी टूट गई.

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जौनपुर: दलित पत्रकार को भाजपा नेता द्वारा पीटने और धरने पर बैठने का पूरा मामला
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वह कहते हैं, "20 अगस्त को गांव की ही दलित महिलाओं से इनका झगड़ा हुआ था. इसके बाद इन्होंने 112 नंबर पर पुलिस को भी बुलाया था. इसकी शिकायत में भी इन्होंने मेरा नाम लिखवा दिया था. और बाद में फिर धरने पर भी बैठ गए. यह कुछ नहीं है यह सिर्फ एक चुनावी रंजिश है. गांव में कभी इससे मेरी बहस तक नहीं हुई है. इससे तो छोड़िए मेरी 32 साल की उम्र में आज तक किसी से झगड़ा नहीं हुआ है."

हमने पूछा कि संतोष कुमार की टांग कैसे टूट गई? इस सवाल पर वह कहते हैं, "इनकी एक टांग टूटी है और दोनों टांगों पर प्लास्टर है. जबकि 20 अगस्त को इनका महिलाओं से झगड़ा हुआ था. मैं उसमें कहीं हूं ही नहीं. यह सिर्फ मुझे फंसाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि मैं जेल में चला जाऊं या मेरी छवि ख़राब कर दी जाए."

वह आगे कहते हैं, "यह सब एक लाख रुपए लेने के लिए झूठे मुकदमे गढ़ते हैं. यह सभी लोग जो एससीएसटी में एक लाख रुपए पाते हैं उसी के लिए यह सब ऐसे करते हैं."

तो क्या दलितों से जुड़े मुद्दे पर जो रिपोर्ट की थी उसके बाद यह झगड़ा नहीं हुआ है? इस सवाल पर वह कहते हैं, "हां हुआ तभी से है, लेकिन मेरा इससे कोई झगड़ा नहीं हुआ है."

आपने इन पर कोई मामला दर्ज कराया है? इस पर वह कहते हैं, "मैंने इन पर कोई मामला दर्ज नहीं कराया है. इनका जिन लोगों से झगड़ा हुआ है उन्हीं ने इन पर मुकदमा दर्ज किया है."

संतोष का कहना है कि आपने अपने नौकर से मुकदमा दर्ज कराया है? इस पर वह कहते हैं, "उन पर प्रीतम ने मुकदमा दर्ज कराया है उसको मेरा नौकर बताया जा रहा है. जबकि इस मामले में मेरा कुछ लेना देना ही नहीं है."

वह आखिर में कहते हैं कि मैं गलत नहीं हूं इसलिए मुझे किसी तरह का डर भय नही हैं. वह यह भी जोड़ते हैं कि अगर ये ठीक हैं तो फिर जब से धरने पर बैठे हैं तो कोई मीडिया इन्हें कवर क्यों नहीं कर रहा है. डीएम कार्यलय पर धरना चल रहा है. इनकी खबर सिर्फ इनका ही न्यूज पोर्टल चला रहा है. या बस इनके समुदाय के लोग ही इनकी खबरें चला रहे हैं.

इस मामले में न्यूजलॉन्ड्री ने महाराजगंज के एसएचओ संतोष कुमार राय से भी बात की. वह कहते हैं, "यह कोई बड़ा मामला नहीं है. इन दोनों (संतोष और यादवेंद्र) की पत्नियां पंचायत चुनाव में उम्मीदवार रही हैं. एक जीत गईं एक हार गईं. इसके बाद से ही इनमें रंजिश चली आ रही है. हमारी स्थानीय जांच में जो सामने आया है उसमें यादवेंद्र प्रताप सिंह का कोई लेना देना नहीं है. संतोष की पत्नी का विवाद पड़ोस में रहने वाली एक महिला से हुआ था. उसका वीडियो भी हमें उपलब्ध कराया गया है."

20 अगस्त को संतोष पर कोई हमला हुआ था? इस सवाल पर वह कहते हैं, "इनपर कोई हमला नहीं हुआ है. इनकी पत्नी और पड़ोस की रहने वाली महिला से झगड़ा हुआ था."

संतोष की टांग कैसे टूटी? इस सवाल पर वह कहते हैं, "टूटी है एक टांग और दोनों टांगों पर प्लास्टर किया हुआ है. वो पुराना मामला है, और उस मामले में मुकदमा लिखा जा चुका है. इनकी मेडिकल रिपोर्ट में भी एक ही टांग टूटी है जबकि प्लास्टर दोनों टांगों पर किया हुआ है. अभी वाले मामले में किसी पुरुष का कोई रोल नहीं है. यह सिर्फ महिलाओं का झगड़ा था. इसमें ना संतोष का कोई लेना है ना ही यादवेंद्र का."

संतोष का आरोप है कि उन्होंने दलितों से जुड़ी कोई खबर की थी उसके बाद उनकी पिटाई की गई है? इस पर वह कहते हैं, "आप उस पर मत जाइए, देखिए ये एक चैनल के ब्यूरो चीफ हैं जिसका बहुजन प्रेरणा कुछ करके नाम है, अब ये उसपर कुछ भी लिख सकते हैं जब ब्यूरो चीफ हैं तो. मूल भावना चुनाव की है. दूसरी बात यहां जो भी काम होता है तो उसमें संतोष टांग अड़ाते हैं. इसलिए इनकी लोगों से नाराजगी हो जाती है. जैसे किसी को पीएम आवास योजना के तहत मकान अलॉट हुआ और वह आवास का पात्र नहीं है तो वह उनकी शिकायत कर देते हैं और आवास कटवा देते हैं. यह एक्टिविस्ट टाइप का काम भी करते हैं. जिनको गलत आवास मिलता है उनके आवास भी कटवा देते हैं ये. इसलिए भी इनका झगड़ा चलता रहता है."

वह आगे कहते हैं, "20 अगस्त को महिलाओं में झगड़ा हुआ था. और यह पुरानी रंजिश के चलते यादवेंद्र पर अभियोग पंजीकृत कराना चाहते हैं. जबकि डायल 112 तीन बार गई थी. उसकी रिपोर्ट में भी जो यह बता रहे हैं वैसी कोई बात नहीं है. देखिए आप ही बताइए ये कई दिन से धरने पर बैठे हैं तो हम मजबूर होकर क्या करेंगे आप ही बताइए? जब यह धरना शुरू किए तो मैं व्यक्तिगत रूप से तीन बार इनके पास गया और 5-5 घंटे तक इनके साथ रहा."

हालांकि यहां एसएचओ संतोष कुमार राय और यादवेंद्र की बातों में फर्क नजर आता है. यादवेंद्र कहते हैं कि यह धरना मेरे खिलाफ चल रहा है जबकि एसएचओ कहते हैं कि यह धरना यादवेंद्र के खिलाफ नहीं चल रहा है. क्योंकि यादवेंद्र उस समय वहां पर थे ही नहीं जब यह घटना हुई.

वह एक सवाल पर कहते हैं, “देखिए जैसे आप दिल्ली में हैं और आपके खिलाफ कोई यहां एफआईआर दर्ज कराने आ जाए तो हमारा फर्ज जांच करने का बनता है. मोबाइल डिटेल्स निकालनी पड़ेगी आपकी लोकेशन कहां की है. ऐसे ही यह मामला है. मान लीजिए मैं आपके खिलाफ यहां धरने पर बैठ जाऊं और मेरे खिलाफ यहां अभियोग पंजीकृत हो जाए. या कोई और बैठ जाए मेरे खिलाफ तो इससे तो जातीय असंतुलन पैदा हो जाएगा. इसमें दलित वाला कोई एंगल नहीं है. आप बताइए कि कोई साधारण पत्रकार से लड़ सकता है क्या? जबकि ये तो यहां पर ब्यूरो चीफ हैं.”

जून में जो दोनों तरफ से एफआईआर दर्ज की गई है उसकी जांच कहां तक पहुची? इस पर वह कहते हैं, "देखिए जब इनका धरना लंब चलेगा तो हमें कुछ न कुछ कार्रवाई तो करनी ही होगी. दूसरी बात इस मामले की विवेचना सीओ साहब कर रहे हैं. जो धाराएं लगाई गई हैं वह सब सात साल के मामले की हैं और सात साल के मामले में अब गिरफ्तारी नहीं कर सकते हैं."

इसके बाद हमने इस मामले में बहुजन प्रेरणा संस्थान के मालिक और संपादक मुकेश भारती से भी बात की, वह कहते हैं, संतोष एक न्यूज कवरेज के लिए एसपी कार्यलय गए थे. जब उस न्यूज को लगाया गया और जिनका उस खबर से संबंध था उन्होंने चिड़न के बाद संतोष को पीटा."

वह क्या खबर थी? इस पर वह कहते है, "किसी दलित के साथ पुलिस ने मारपीट की थी. पुलिस ने गलत सूचना पर दलित को पीटा था. उसमें बीजेपी के कुछ नेता शामिल थे जबकि वह फर्जी मामला था. इसके बाद पीड़ित ने पुलिस के खिलाफ एसपी के यहं शिकायत की. उनका कहना था कि जब हमने कोई अपराध नहीं किया तो फिर पुलिस ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया. संतोष कुमार हमारे यहां करीब 15-16 महीनों से काम कर रहे हैं. और इसी की कवरेज के लिए वह वहां गए थे”

यादवेंद्र सिंह के सवाल पर वह कहते हैं, "जो मारने वाले हैं वह इनके ही गांव के हैं. यह बात सौ प्रतिशत सही है कि खबर के बाद ही संतोष को पीटा गया है. क्योंकि उस खबर का हमने वीडियो भी लगाया था. मैंने डीएम एसपी, पीएम और सीएम, आईजी डीआईजी तक तो इसकी शिकायत की है. उस समय मेरे दवाब में इनके खिलाफ एफआईआर तो दर्ज हो गई लेकिन उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई. और बल्कि मामले को कमजोर करने के लिए काउंटर एफआईआर उल्टा संतोष पर ही दर्ज करा दी."

"वहीं कुछ दिन बाद फिर से 20 अगस्त को इनके साथ मारपीट की गई. संतोष हमारा पत्रकार है हम उसके साथ खड़े हैं. क्योंकि वो हमारे लिए काम कर रहा था इसलिए वह चोट हमे भी लगी है. क्योंकि वह अपने लिए नहीं बल्कि हमारे संस्थान के लिए काम कर रहा था. मान लीजिए अगर किसी पत्रकार पर कोई आरोप लगता है तो वह उस संस्थान पर भी आरोप लगता है." उन्होंने कहा.

चुनावी रंजिश के सवाल पर वह कहते हैं, "अगर यह चुनाव का कोई मामला होता तो वह तो पिछली बार भी चुनाव लड़े थे. तभी भी कुछ हो सकता था. क्योंकि पिछली बार भी दोनों पार्टियां चुनाव लड़ी थीं. चुनाव होने के दो महीने बाद आप उन्हें मार रहे हैं तो फिर यह चुनाव का मामला कैसे हो गया. आगर चुनावी रंजिश होती तो काउंटिग के दिन होती अब चार महीने बाद नहीं."

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