पत्रकारों ने ग्रुप ऑफ मिनिस्टर की रिपोर्ट और बैठक से पल्ला झाड़ा

न्यूज़लॉन्ड्री ने एक मंत्री दल की "सरकारी संवाद" की रिपोर्ट में नामजद पत्रकारों से बात की, उनका यह कहना है.

पत्रकारों ने ग्रुप ऑफ मिनिस्टर की रिपोर्ट और बैठक से पल्ला झाड़ा
Shambhavi Thakur
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'भगवान ही जाने की यह रिपोर्ट किसने बनाई और यह किस बारे में है'

मंत्रियों रिजिजू और नकवी वाली बैठक से विपरीत, स्मृति ईरानी और प्रकाश जावड़ेकर के द्वारा रखी गई वीडियो कॉन्फ्रेंस को लेकर रिपोर्ट कई "जानी-मानी हस्तियों" के हवाले से कई टिप्पणियां उल्लेखित करती है. यह टिप्पणियां सरकार को मीडिया को संभालने, अपनी उपलब्धियों को कैसे प्रचारित करने और आलोचनाओं को नियंत्रित करने की सलाह देती हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 30 जून 2020 को प्रकाश जावड़ेकर से हुई बातचीत में स्वपन दासगुप्ता, एस गुरुमूर्ति, नितिन गोखले, शेखर अय्यर, सूर्य प्रकाश, अशोक टंडन, अशोक मलिक और शशि शेखर वैंपति थे. इसके अगले दिन स्मृति ईरानी ने नूपुर शर्मा, अभिजीत मजूमदार, अनंत विजय, बीबीसी के पूर्व पत्रकार सुनील रमन और वैज्ञानिक और टीवी पैनलिस्ट आनंद रंगनाथन से बात की.

अशोक मलिक और अभिजीत मजूमदार ने रिपोर्ट पर टिप्पणी करने से मना कर दिया.

रिपोर्ट में उल्लेखित एक पत्रकार का कहना है कि जावड़ेकर के साथ हुई बैठक के पीछे की मूल वजह गलवान घाटी में हुई झड़प से जुड़ी जानकारी की विश्वसनीयता पर मीडिया की शंका थी, न कि केंद्र की संवाद रणनीति बनाना.

हमने कंचन गुप्ता से भी संपर्क किया और रिपोर्ट कितनी सही है यह जानने के लिए रिपोर्ट में उल्लेखित उनके कुछ सुझाव, उन्हीं को पढ़कर सुनाए. उनमें से एक सुझाव है, "डिजिटल मीडिया और ऑनलाइन मीडिया से काफी सर गर्मी पैदा होती है जो आमतौर पर मुख्यधारा की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी पहुंच जाती है. मीडिया अब नई तकनीक को भी समझने लगा है. राजीव गांधी फाउंडेशन को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना से मिले अनुदान को भी एक कहानी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है."

कंचन ने न्यूजलॉन्ड्री से कहा, "मैंने जो भी सरकार को बताया वह विशेषाधिकार प्राप्त संवाद है. आप जिस पर मुझे टिप्पणी करने को कह रहे हैं मैं उस पर टिप्पणी नहीं करूंगा."

वायर के द्वारा की गई एक रिपोर्ट बताती है कि कंचन गुप्ता का राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़ा सुझाव ऑपइंडिया के द्वारा की गई एक रिपोर्ट के रूप में चरितार्थ हुआ, जिसे बाद में और राष्ट्रीय समाचार पत्रों में जगह मिली.

एक व्यक्ति जिनका नाम प्रकाश जावड़ेकर और स्मृति ईरानी के साथ हुई बैठकों में शामिल बताया गया है, वे अपने नाम के साथ जुड़े हुए सुझावों को सुनकर हंसने लगे. उन्होंने कहा, "भगवान ही जानता है कि यह रिपोर्ट किसने बनाई है और यह किस बारे में है. इसका तो कोई मतलब ही नहीं निकलता."

एक दूसरे व्यक्ति ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि इस मंत्री दल की रिपोर्ट में उनके नाम पर जो सुझाव लिखे गए हैं वह वाहियात और, "उन्हें कोई अंदाजा नहीं है कि सरकार में यह सब लिख कौन रहा है." इसके साथ ही यह भी कहते हैं, "या तो आपने स्पष्ट रूप से खुलकर अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया हो, वरना आप किसी और को अपने आप पर कोई दृष्टिकोण थोपने से कैसे रोक सकते हैं?"

दस्तावेज में नामित एक तीसरे व्यक्ति ने कहा कि इन बातों को बैठक के शब्दशः लेखे जोखे की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, "मीटिंग के दौरान कोई नोट्स बना रहा था और उन्होंने अपनी कल्पना का इस्तेमाल कर चीजों को मिर्च मसाला लगाकर लिखा है."

न्यूजलॉन्ड्री ने जिन तीन व्यक्तियों से बात की उनमें से एक ने भी यह नहीं कहा कि प्रकाश जावड़ेकर और स्मृति ईरानी के साथ बैठकर नहीं हुईं. परंतु अपनी पहचान छुपाकर मंत्रीदल पर संदेह करना, सरकार की हरकत पर प्रश्न उठाने का भी एक तरीका है. रिपोर्ट में उल्लेखित चीजों की गंभीरता और उससे उनकी पेशेवर विश्वसनीयता पर उठने वाले प्रश्नों को देखकर मीडिया कर्मियों से उम्मीद थी कि वह ऑन रिकॉर्ड इन बातों को खंडित करते.

रिपोर्ट यह दावा करती है की एनडीटीवी के पूर्व सुरक्षा मामलों के संपादक नितिन गोखले ने सरकार को कहा, "पत्रकारों को रंगों की श्रेणी में रखा जा सकता है, हरा- हाशिए पर बैठने वाले, काला- विरोधी और सफेद- जो समर्थक हैं. हमें अनुकूल बात करने वाले पत्रकारों का समर्थन और प्रचार करना चाहिए."

यह बात बृहस्पतिवार की कार्यवाही की रिपोर्ट में भी बताई गई थी.

गोखले ने कहा पत्रिका ने उनके हवाले से जो भाषा बताई वह उसका खंडन करते हैं, "कारवां पत्रिका की रिपोर्ट झूठी है. उन्होंने मुझसे मेरी टिप्पणी तक के लिए संपर्क नहीं किया. मैंने यह रिपोर्ट नहीं देखी है लेकिन मैं अपना उत्तर कारवां की रिपोर्ट में जो मेरे लिए कहा गया है उसके बिना पर दे रहा हूं."

कारवां पत्रिका के राजनीतिक संपादक और सरकार की इस रिपोर्ट पर उस में छपे लेख के लेखक हरतोष सिंह बल ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा कि अगर केंद्र की रिपोर्ट झूठी है तो फिर कारवां पत्रिका की भी रिपोर्ट झूठी है.

उन्होंने कहा, "हमने केवल नितिन गोखले के हवाले से जो रिपोर्ट में कहा गया है उसी को लिखा है और अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ा है जो दस्तावेजों में नहीं है."

कारवां पत्रिका ने किरण रिजिजू और मुख्तार अब्बास नकवी वाली बैठक से जुड़े वक्तव्य को लेकर जयंत घोषाल को उनकी टिप्पणी के लिए संपर्क किया, तो फिर उन्होंने नितिन गोखले से बात क्यों नहीं की?

हरतोष उत्तर देते हैं, "घोषाल वाली बैठक में बहुत सारे सुझाव एक साथ कई लोगों के समूह के हवाले से दिए गए थे, जिनमें से किसी को भी विशेष रूप से नामित नहीं किया गया था और हम जानना चाहते थे कि क्या यह सही में उनके नामों से जुड़ा हुआ है. गोखले के मामले में ऐसा कोई सामूहिक संदेह है ही नहीं. रिपोर्ट में यह सुझाव स्पष्ट रूप से उनके द्वारा दिया गया बताया है."

न्यूजलॉन्ड्री ने अपने प्रश्न मंत्रियों स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, मुख्तार अब्बास नकवी और किरण रिजिजू के कार्यालयों पर भी भेजे हैं. उनकी तरफ से जवाब आने पर रिपोर्ट में उन्हें जोड़ दिया जाएगा.

'भगवान ही जाने की यह रिपोर्ट किसने बनाई और यह किस बारे में है'

मंत्रियों रिजिजू और नकवी वाली बैठक से विपरीत, स्मृति ईरानी और प्रकाश जावड़ेकर के द्वारा रखी गई वीडियो कॉन्फ्रेंस को लेकर रिपोर्ट कई "जानी-मानी हस्तियों" के हवाले से कई टिप्पणियां उल्लेखित करती है. यह टिप्पणियां सरकार को मीडिया को संभालने, अपनी उपलब्धियों को कैसे प्रचारित करने और आलोचनाओं को नियंत्रित करने की सलाह देती हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 30 जून 2020 को प्रकाश जावड़ेकर से हुई बातचीत में स्वपन दासगुप्ता, एस गुरुमूर्ति, नितिन गोखले, शेखर अय्यर, सूर्य प्रकाश, अशोक टंडन, अशोक मलिक और शशि शेखर वैंपति थे. इसके अगले दिन स्मृति ईरानी ने नूपुर शर्मा, अभिजीत मजूमदार, अनंत विजय, बीबीसी के पूर्व पत्रकार सुनील रमन और वैज्ञानिक और टीवी पैनलिस्ट आनंद रंगनाथन से बात की.

अशोक मलिक और अभिजीत मजूमदार ने रिपोर्ट पर टिप्पणी करने से मना कर दिया.

रिपोर्ट में उल्लेखित एक पत्रकार का कहना है कि जावड़ेकर के साथ हुई बैठक के पीछे की मूल वजह गलवान घाटी में हुई झड़प से जुड़ी जानकारी की विश्वसनीयता पर मीडिया की शंका थी, न कि केंद्र की संवाद रणनीति बनाना.

हमने कंचन गुप्ता से भी संपर्क किया और रिपोर्ट कितनी सही है यह जानने के लिए रिपोर्ट में उल्लेखित उनके कुछ सुझाव, उन्हीं को पढ़कर सुनाए. उनमें से एक सुझाव है, "डिजिटल मीडिया और ऑनलाइन मीडिया से काफी सर गर्मी पैदा होती है जो आमतौर पर मुख्यधारा की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी पहुंच जाती है. मीडिया अब नई तकनीक को भी समझने लगा है. राजीव गांधी फाउंडेशन को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना से मिले अनुदान को भी एक कहानी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है."

कंचन ने न्यूजलॉन्ड्री से कहा, "मैंने जो भी सरकार को बताया वह विशेषाधिकार प्राप्त संवाद है. आप जिस पर मुझे टिप्पणी करने को कह रहे हैं मैं उस पर टिप्पणी नहीं करूंगा."

वायर के द्वारा की गई एक रिपोर्ट बताती है कि कंचन गुप्ता का राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़ा सुझाव ऑपइंडिया के द्वारा की गई एक रिपोर्ट के रूप में चरितार्थ हुआ, जिसे बाद में और राष्ट्रीय समाचार पत्रों में जगह मिली.

एक व्यक्ति जिनका नाम प्रकाश जावड़ेकर और स्मृति ईरानी के साथ हुई बैठकों में शामिल बताया गया है, वे अपने नाम के साथ जुड़े हुए सुझावों को सुनकर हंसने लगे. उन्होंने कहा, "भगवान ही जानता है कि यह रिपोर्ट किसने बनाई है और यह किस बारे में है. इसका तो कोई मतलब ही नहीं निकलता."

एक दूसरे व्यक्ति ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि इस मंत्री दल की रिपोर्ट में उनके नाम पर जो सुझाव लिखे गए हैं वह वाहियात और, "उन्हें कोई अंदाजा नहीं है कि सरकार में यह सब लिख कौन रहा है." इसके साथ ही यह भी कहते हैं, "या तो आपने स्पष्ट रूप से खुलकर अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया हो, वरना आप किसी और को अपने आप पर कोई दृष्टिकोण थोपने से कैसे रोक सकते हैं?"

दस्तावेज में नामित एक तीसरे व्यक्ति ने कहा कि इन बातों को बैठक के शब्दशः लेखे जोखे की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, "मीटिंग के दौरान कोई नोट्स बना रहा था और उन्होंने अपनी कल्पना का इस्तेमाल कर चीजों को मिर्च मसाला लगाकर लिखा है."

न्यूजलॉन्ड्री ने जिन तीन व्यक्तियों से बात की उनमें से एक ने भी यह नहीं कहा कि प्रकाश जावड़ेकर और स्मृति ईरानी के साथ बैठकर नहीं हुईं. परंतु अपनी पहचान छुपाकर मंत्रीदल पर संदेह करना, सरकार की हरकत पर प्रश्न उठाने का भी एक तरीका है. रिपोर्ट में उल्लेखित चीजों की गंभीरता और उससे उनकी पेशेवर विश्वसनीयता पर उठने वाले प्रश्नों को देखकर मीडिया कर्मियों से उम्मीद थी कि वह ऑन रिकॉर्ड इन बातों को खंडित करते.

रिपोर्ट यह दावा करती है की एनडीटीवी के पूर्व सुरक्षा मामलों के संपादक नितिन गोखले ने सरकार को कहा, "पत्रकारों को रंगों की श्रेणी में रखा जा सकता है, हरा- हाशिए पर बैठने वाले, काला- विरोधी और सफेद- जो समर्थक हैं. हमें अनुकूल बात करने वाले पत्रकारों का समर्थन और प्रचार करना चाहिए."

यह बात बृहस्पतिवार की कार्यवाही की रिपोर्ट में भी बताई गई थी.

गोखले ने कहा पत्रिका ने उनके हवाले से जो भाषा बताई वह उसका खंडन करते हैं, "कारवां पत्रिका की रिपोर्ट झूठी है. उन्होंने मुझसे मेरी टिप्पणी तक के लिए संपर्क नहीं किया. मैंने यह रिपोर्ट नहीं देखी है लेकिन मैं अपना उत्तर कारवां की रिपोर्ट में जो मेरे लिए कहा गया है उसके बिना पर दे रहा हूं."

कारवां पत्रिका के राजनीतिक संपादक और सरकार की इस रिपोर्ट पर उस में छपे लेख के लेखक हरतोष सिंह बल ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा कि अगर केंद्र की रिपोर्ट झूठी है तो फिर कारवां पत्रिका की भी रिपोर्ट झूठी है.

उन्होंने कहा, "हमने केवल नितिन गोखले के हवाले से जो रिपोर्ट में कहा गया है उसी को लिखा है और अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ा है जो दस्तावेजों में नहीं है."

कारवां पत्रिका ने किरण रिजिजू और मुख्तार अब्बास नकवी वाली बैठक से जुड़े वक्तव्य को लेकर जयंत घोषाल को उनकी टिप्पणी के लिए संपर्क किया, तो फिर उन्होंने नितिन गोखले से बात क्यों नहीं की?

हरतोष उत्तर देते हैं, "घोषाल वाली बैठक में बहुत सारे सुझाव एक साथ कई लोगों के समूह के हवाले से दिए गए थे, जिनमें से किसी को भी विशेष रूप से नामित नहीं किया गया था और हम जानना चाहते थे कि क्या यह सही में उनके नामों से जुड़ा हुआ है. गोखले के मामले में ऐसा कोई सामूहिक संदेह है ही नहीं. रिपोर्ट में यह सुझाव स्पष्ट रूप से उनके द्वारा दिया गया बताया है."

न्यूजलॉन्ड्री ने अपने प्रश्न मंत्रियों स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, मुख्तार अब्बास नकवी और किरण रिजिजू के कार्यालयों पर भी भेजे हैं. उनकी तरफ से जवाब आने पर रिपोर्ट में उन्हें जोड़ दिया जाएगा.

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