अंबेडकर की याद: एक अछूत लड़के का बारंबार इम्तहान

एक ही साल में जन्मीं दो महान हस्तियों अंबेडकर और जेम्स चैडविक के जीवन की अद्भुत समानताएं और संघर्ष

WrittenBy:आनंद रंगनाथन
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विज्ञान और ग्रन्थ- ये दोनों न सिर्फ दुनिया को बदल सकते हैं, बल्कि उसे तबाह भी कर सकते हैं. 1891 में दो ऐसे लोगों का जन्म हुआ जिन्होंने इस बात समझा और फिर अपनी आने वाली ज़िन्दगी के कठिन सफर में इसे साबित भी किया. आगे हम उन्हीं दो ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की बात करेंगे.

जेम्स चैडविक का जन्म ब्रिटेन में हुआ था और वो सामाजिक भेदभाव से काफी दुखी थे. दूसरी तरफ भीम राव अम्बेडकर का जन्म भारत में हुआ था जो अपनी जाति-प्रथा के दुष्च्कर से पीड़ित था. जेम्स चैडविक के पिता रेलवे के एक स्टोरकीपर थे, और उनकी मां लोगों के घरों में काम किया करती थी. अंबेडकर के पिता एक सूबेदार थे और उनकी माता अशिक्षित थी. इस दम्पत्ति की 13 संतानें थी.

उस वक्त भेदभाव और जाति प्रथा इंसान की तरक्की में बहुत बड़ी रुकावट थी और ये प्रथा सदियों से चली आ रही थी. लेकिन 1891 का वो साल बौद्धिक क्रान्ति के दौर वाला था. इस दौर में ऐसे विचार फले-फूले जो कि दुनिया को बदल सकते थे, लेकिन उनका अपनाया जाना मुश्किल था. समाजवाद की जड़ें मजबूत हो रही थी और उसी के साथ सम्राज्यवाद भी अपने पैर पसार रहा था. अफ्रीका में इसकी कोशिशें जारी थी. डार्विन का सिद्धांत फैल रहा था (हालांकि इसके आलोचक भी थे). उनकी किताब डीसेंट ऑफ मैन को छपे 20 साल हो चुके थे, और अब वो आलोचकों के निशाने पर थी. आम सोच ये थी कि इंसान और वानरों की वंशावली एक ही थी या किसी दूसरे इंसान से मिलती थी, जिससे इसको मानने वाले हैरान थे. विकास का ये सिद्धांत धर्म के कड़े बंधन के लिए खतरा था. क्वांटम साइंस तो अभी एक दशक दूर की बात थी. आईंस्टाइन तो और भी दूर थे. अणु यानि एटम की खोज होनी अभी बाकी थी जबकि बिजली के बल्ब का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने जा रहा था. भारत के लिए ये सभी चीज़े अभी बहुत दूर की बात थी और वो अंधेरे में था. एक ऐसे अंधेरे में जहां रोशनी नहीं थी, न ही कुदरती और न ही बनावटी, जो इस अंधेरे को भी भेद नहीं सकती थी. ये अंधेरा भेदभाव और छुआछूत का था.

पहले ब्रिटेन की बात करते हैं, जहां धीरे-धीरे दुनिया भर से लूटे हुए पैसों से समृद्धि की मीनार बनाई जा रही थी. जिनसे धन लूटा गया था, उन्हें तो ये तक समझ में नहीं आ रहा था कि उनसे क्या लूटा गया है. वो तो बस बावलों की तरह मुंह खोलकर, हैरानी से उस छोटे से द्वीप पर जो चमत्कारिक तरक्की हो रही थी, उसे देख रहे थे. ये आधुनिक दुनिया का सेन्टर था. जैसे अणु के चारों ओर इलेक्ट्रानों की दर्जनों कालोनी अणु को निस्वार्थ पोषण देती हैं, बिल्कुल वैसे ही . लेकिन इस अणु में था क्या? गरीबी.

ब्रिटेन की एक चैथाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे जी रही थी. वो लोग जो बेरोज़गार थे उन्हें उन्हें वर्कहाउसों में काम करने के लिए मज़बूर होना पड़ता था. जिससे उनके बेसहारा होने का अंदेशा था. भूख, बीमारी, बेरोज़गारी, कम तन्ख्वाह, इन्हें तो वैभव नहीं कहा जा सकता है. इस तथाकथित वैभवशाली राज को नायपाल ने वह कल्पनालोक बताया था जिससे विजेताओं को संतुष्टि मिलती थी. जबकि ये उनकी अपनी ही मातृभूमि का भद्दा चेहरा था. और ये समय उनके लिए बड़ा मुश्किल था जो समाज के सबसे निचले पायदान पर रेंग रहे थे.

चैडविक के माता-पिता उसे ग्रामर स्कूल में भी भेज पाने के काबिल नहीं थे. बाद में नौजवान चैडविक ने मैनचेस्टर की विक्टोरिया युनिवर्सिटी की स्कालरशिप हासिल की. वो इतना गरीब था कि जब वो अन्डरग्रैजुएशन में था, उस दौरान उसने तीन साल तक अपना लंच तक नहीं लिया था. ऐसे में उसका सहारा बने, उसके गुरू अर्नेस्ट रदरफोर्ड. उसके बाद तो गुरू-चेले ने एक ऐसे सफर की शुरुआत की जिसने दुनिया को बदल दिया. अब पूरी दुनिया इस कहानी को जानती है.

अब भारत की बात करते हैं, यहां नौजवान अम्बेडकर, जिनके माता-पिता 1897 में बम्बई चले गए थे, उन्होंने एक अनोखा मापदण्ड स्थापित किया. अनोखा इसलिए कि सदियों पुरानी बरर्बता ने उनमें एक नायक के गुण पैदा कर दिये थे. वो एलफिंस्टन हाईस्कूल में दाखिला लेने वाले पहले अछूत छात्र थे. पहले अछूत जिन्होंने बम्बई युनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन किया. पहले अछूत जिन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए स्कालरशिप हासिल की. ये जो पहला अछूत है न, ये समाज की दी हुई एक ऐसी उपाधि है, जिसको इस्तेमाल करने वाला ये भी नहीं जानता कि इसमें बुराई क्या है? ऐसी उपाधि, जो एक अछूत सी शर्म के साथ बंधी हुई थी.

इस दौरान चैडविक ने बर्लिन, जर्मनी के लिए स्कालरशिप हासिल कर ली. जहां वो हेंस गीगर के निर्देशन में पढ़ने वाले थे. कुछ इसी तरह अम्बेडकर अमेरिका के कोलम्बिया में जॉन डेवी के निर्देशन में पढ़ने के लिए तैयारी कर रहे थे. वो 1913 का साल था. मानव जाति के इतिहास में अगले पांच वर्ष सबसे उथल-पुथल वाले थे. जब विश्वयुद्ध शुरू हुआ, उस वक्त चैडविक जर्मनी में ही थे. उन्हें कैद कर लिया गया. अम्बेडकर उस वक्त अमेरिका में थे. छुआछूत और जातपात की जो बेड़ियां उनकी अपनी मातृभूमि पर थी उनसे अब वो आज़ाद थे. बाद में अम्बेडकर ने लिखा: “पांच साल जो मैं अमेरिका और युरोप में रहा, उसने मेरे मन से उस भावना का सफाया कर दिया कि मैं एक अछूत था.”

ध्यान दीजिए ऊपर जो बात कही गई है, उसमें एक अधूरापन है. इस बात को दो टुकड़ों में लिखा गया है, बाकि का आधा जिसमें रूलाई और निराशा है, और ये रूलाई इतनी तेज़ है कि पढ़ने वाले के कानों में गूंजती है. बाकी का आधा बाद में लिखा गया.

वापस जर्मनी चलते हैं. चैडविक ने रदरफोर्ड के साथ काम शुरू किया. पहले मैनचेस्टर में काम किया और फिर कैम्ब्रिज की मशहूर लेबोरेटरी कैनेंडिश में. आने वाला दशक निराशा और नाकामयाबियों वाला था. उन्होंने इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन पर काम किया, फिर वो दोनों अणु की पहेली को सुलझाने में लग गए. कामयाबी बस एक कदम दूर थी और ये उस एक टुकड़े से मिल सकती थी जो गायब था. 1932 में इन दोनों का साथ भाग्य ने दे ही दिया.

लेकिन अम्बेडकर इतने भाग्यशाली नहीं थे, उनके खुशी के साल (खुशी के भी केवल इसलिए क्योंकि उनसे पहली बार एक इंसान की तरह बर्ताव किया गया) पहले कोलंबिया में और उसके बाद लंदन में रहे. वह भारत लौटे और लिखा:

अपने भारत आने के बाद मैं सीधा बड़ौदा गया , मेरे वो पांच साल जिसमें मैं अमेरिका और युरोप में रहा उसने मेरे मन से यह बात मिटा दिया कि मैं एक अछूत था, और मैं जहां कहीं भी भारत में गया वहां अपने लिए और दूसरों के लिए अछूत एक समस्या थी, लेकिन जब मैं स्टेशन से बाहर आया, एक सवाल मेरे दिमाग को काफ़ी परेशान कर रहा था. “कहां जाऊं”? कौन मुझे लेकर जाएगा? मेरे अन्दर बहुत हलचल हो रही थी. वहां कई हिन्दु होटल थे जिन्हें मैं जानता था. इन्हें विशिश कहा जाता था. मैं जानता था कि वो मुझे अपने होटलों में नहीं ठहराऐंगे. उन होटलों में रहने का एक ही रास्ता था, पहचान छुपाने का. लेकिन मैं इसके लिए तैयार नहीं था, क्योंकि मुझे पूरा अंदेशा था कि अगर मेरी पहचान उजागर हो गई तो उसके परिणाम काफी गम्भीर हो सकते हैं.

अमेरिका में अंबेडकर जॉन डेवी, जेम्स शॉटवेल, एडविन सेलीमन और जेम्स हार्वे रॉबिन्सन जैसे 20वीं सदी के महान विचारकों के साथ रहे थे. लेकिन अब वो उनको छोड़कर वापस अपने वतन लौट आए थे और यहां उनका इंतजार कर रहे थे मनु.

मनु रेलवे स्टेशन पर थे, रहने-खाने वाली जगहों पर थे, रेस्टोंरेंट में थे, सड़क पर थे, पार्क में थे, बाज़ार में थे, वो सभी जगहों पर थे. वो अंबेडकर की ही तलाश रहे थे, उनका पीछा कर रहे थे, यहां तक कि उनकी परछाई के भी पीछे पड़े थे. मनु ईश्वर की तरह सभी जगह मौजूद थे. मनु एक ऐसी चेतावनी थी जिसके बारे में कोई सोच नहीं सकता था. मनु एक ऐसे हाथ की तरह था, जो अंबेडकर को छूकर बताने वाला था कि यही अंबेडकर है. वही हाथ अंबेडकर को एक गिलास पानी पकड़ाने वाला था. वही हाथ घर में अंबेडकर का स्वागत करने वाला था. अंबेडकर ने लिखा है:

“बड़ौदा में मेरे ऐसे कई दोस्त थे जो अमेरिका में पढ़ने गए थे. अगर मैं उनके पास जाऊं तो क्या वो मुझे अपनाएंगे? मैं भरोसे से कुछ नहीं कह सकता. शायद वो एक अछूत को अपने घर में पाकर असहज महसूस करें. मैं कुछ देर तक तो स्टेशन के अंदर ही खड़ा रहा, और सोच रहा था कि क्या करूं? कहां जाऊं?”

किस्मत अब अंबेडकर से विदा लेकर चैडविक के पास पहुंच चुकी थी. अब वक्त उनका था और ये वक्त फ्रेडरिक और ईरेन क्यूरी के कंधों पर सवार होकर उस तक पहुंचा था. वक्त उन्हें और भी आगे ले जाने वाला था. जैसे परिक्षण उन्होंने किये थे, बिल्कुल उसी तरह उन्होंने बेरीलियम की बौछार करने के लिए रेडियोएक्टिव पोलोनियम को हाई एनर्जी स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया. ऐसा करने से रेडिएशन हुआ जिससे पैराफिन वैक्स की बौछार हुई, चैडविक ने खोज निकाला कि जो एनर्जी पैदा हुई, उसके वैक्स से प्रोटॉन निकला जो कि अनचार्ज्ड पार्टिकल के रूप में न्यूट्रॉन था. आखिरकार अणु की खोज हो ही गई. परमाणु युग शुरू हो गया था और इसी समय के आस पास अंबेडकर की यात्रा अभी बस शुरू ही हुई थी.

इस दुनिया के जितने भी कुकर्म हैं उनमें सबसे घिनौना है, एक इंसान का दूसरे इंसान को नकारना. ये किसी के दिलो-दिमाग और उसकी आत्मा का खून करने जैसा है. जिसको इस तरह से नकारे जाने का अनुभव नहीं है उसके लिए ये कितना भयावह हो सकता है, इसकी कल्पना करना मुश्किल है. अंबेडकर ने लिखा है, “उनके लिए ये समझना काफी मुश्किल है कि गांव के बाहरी छोर पर कुछ अछूतों का बसेरा हो, जो कि हिन्दुओं की आबादी का ही एक हिस्सा है, ये रोज गांव में जाते हैं और साफ सफाई से लेकर मैला ढोने तक सारे काम करते हैं. हिन्दुओं के घर-घर जाकर खाना इकट्ठा करते हैं, हिन्दू बनिये की दुकान से एक दूरी बनाकर मसाले और तेल खरीदते हैं. गांव में ये सब काम करते हुए उन्हें इस बात का ध्यान भी रखना है कि वो गलती से भी किसी को छू न सकें, और किसी दूसरे गांव वाले के छूने से खुद को बचायें.”

क्या खुले हुए जख़्म ठीक हो सकते हैं? क्या यहां सच के बिना तालमेल बैठ सकता हैः माफी बिना हरजाने के? क्या जज के बिना इंसाफ हो सकता है?

जब अंबेडकर नौ साल के थे तो एक बार उन्हें कोरेगांव जाना था. उनके इस सफर के बारे में जानकर किसी का भी विश्वास इंसानियत पर से उठ सकता है. ये सफर हमें वहां ले जाएगा जहां लोगों के कलेजे पत्थर के बन जाते हैं.

“हमने उन्हें (स्टेशन मास्टर को) बता दिया था कि हमें कोरेगांव जाना जाना है. और ये भी कि हमें लेने हमारे पिता या उनका नौकर आने वाला है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, हम नहीं जानते थे कि हमें कोरेगांव कैसे जाना है, हमने अच्छे कपड़े पहने हुए थे. हमारे कपड़ों और बात करने के तरीके से कोई नहीं सोच सकता था कि हम अछूतों के बच्चे हैं.“

“अछूतों के बच्चे” लिखने में ये शब्द कितनी आसानी से लिखे गए. बिना तानों के, बिना किसी गुस्से के, और बिना इंसानियत की बैसाखियों के, जिसका सहारा कभी अंबेडकर ने नहीं लिया, उन्हें कोई अंदाजा नहीं था कि इस तरह के शब्दों का इस लिस्ट में जुड़ना वो रोक देगें.

उन्होंने आगे लिखा

“दरअसल स्टेशन मास्टर को पूरा यकीन था, कि हम ब्रह्मणों के बच्चे हैं और जिन हालात में उसने हमें देखा था, उसने हमें अच्छे से छूआ था. फिर जैसा कि आमतौर पर हिन्दुओं में होता है उसने हमारी पहचान के बारे में पूछ ही लिया, और बिना एक पल के सोचे विचारे मेरे मुँह से निकला “महार”. वो सन्न रह गया. उसके चेहरे के हाव-भाव बदल गए. हम देख सकते थे कि उस पर घृणा का एक अजीब सा भाव हावी हो गया था. जैसे ही उसने मेरे मुँह से वो शब्द सुना वो एक कमरे में चला गया और हम जहां खड़े थे, वहीं खड़े रह गए. पन्द्रह बीस मिनट गुजर चुके थे; सूरज डूबने वाला था. न हमारे पिताजी दिखे और न ही उन्होंने किसी नौकर को भेजा . हम काफी घबराये हुए थे. जो उत्साह और उमंग इस यात्रा के शुरू में हम पर था, वो एक गंभीर उदासी में बदल गया.“

“स्टेशन के बाहर बहुत सी बैलगाड़ियां किराये पर चलती थी. लेकिन जब हमने स्टेशन मास्टर को अपने ‘महार’ होने की बात बताई थी वह बात बाहर खड़े गाड़ीवानों को भी पता चल गई थीं, और उनमें से कोई भी एक महार के बच्चों को गाड़ी में बिठाकर अपवित्र होने और खुद को नीचा दिखाने का जोखि़म नहीं उठाना चाहता था. जब बात नहीं बनती दिखी तो हम जितना किराया होना चाहिए था उसका दुगना देने के लिए तैयार हो गए, लेकिन यहां पैसा भी काम नहीं कर रहा था. स्टेशन मास्टर जो कि हमारे वास्ते उनसे मोलभाव कर रहा था उसने भी चुप्पी साध ली उसे भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. अचानक उसके दिमाग में एक ख्याल आया और उसने ये महसूस करते हुए कि वह हमारी मुश्किल आसान कर रहा है, हमसे पूछा. “क्या तुम बैलगाड़ी खुद चला सकते हो.“ उसकी बात पर हम एक साथ चिल्लाए “हाँ हम चला सकते हैं.“ हमारी बात सुनकर वो एक बार फिर उन गाड़ीवानों से बात करने चला गया कि, हम दोगुना किराया देगें और बैलगाड़ी भी चलाऐंगें और वो पैदल-पैदल गाड़ी के साथ चलेगा. एक गाड़ीवान तैयार हो गया क्योंकि उसे दोगुना पैसा कमाने का मौका मिल रहा था और अपवित्र भी नहीं होना पड़ रहा था.

बाद में जब सोने का समय हुआ:

“बैलों को गाड़ी से अलग कर दिया गया और बैलगाड़ी को खड़ा कर दिया. हमने बैलगाड़ी के तले पर लगे फट्टों पर अपने सोने का इंतजाम किया. ये जगह थोड़ी सुरक्षित थी, और जो कुछ हुआ उसका हमें अफसोस नहीं था. लेकिन अब जो कुछ हाने जा रहा था उसके लिए हम मानसिक तौर पर तैयार नहीं थे. हमारे साथ खाने का काफी सारा सामान था, हमें भूख भी बहुत जोरों की लगी थी. इतना कुछ होते हुए भी हम बिना कुछ खाए सोने जा रहे थे. इसकी वजह थी कि हमारे पास पानी नहीं था, और हमें पानी इसलिए नहीं मिला था क्योंकि हम अछूत थे.“

किसी ने कभी उसे छुआ ही नहीं, समझा ही नहीं, और न ही किसी ने भीमराव रामजी अंबेडकर को जानने की कोशिश की.

अंबेडकर के लिए वो घटना कितना मायने रखती है, इसका पता हमें उनकी इस एक लाईन से चलता है. “उस घटना ने मेरे मन पर कभी न मिटने वाली एक छाप छोड़ी दी. “इसके बावजूद तथ्य ये है कि ऐसा पहली बार नहीं है जब जाति की पहचान ने उनकी ज़िन्दगी पर असर डाला है.“

“इस घटना से पहले भी, मैं जानता था कि हम अछूत है, और ये भी जानता था कि जो अछूत होते हैं उन्हें अपमान और भेदभाव के साये में जीना पड़ता है. उदाहरण के लिए स्कूल में मैं अपनी रैंक के हिसाब से अपने सहपाठियों के साथ नहीं बैठ सकता था बल्कि एक कोने में अकेला बैठता था. मुझे पता था कि स्कूल में मुझे अलग से एक टाट के टुकड़े पर पलथी मार कर बैठना पड़ता था और स्कूल में जो सफाई-कर्मचारी था, उसे मेरे उस टाट के टुकड़े को छूना भी मना था. मेरे लिए उस टाट को शाम को घर ले जाना और अगले दिन स्कूल वापस लाना जरूरी था.

मैं जानता था कि स्कूल में अगर गैर अछूतों को प्यास लगती थी तो बाहर नल पर जाते टोंटी खोलते और अपनी प्यास बुझा लेते, उन्हें बस टीचर की इजाजत लेते की जरूरत थी. लेकिन मेरी स्थिति अलग थी, यहां सिर्फ गुरूजी की इजाजत ही काफी नहीं थी. जब तक कोई गैर-अछूत नल को न खोले तब तक मै प्यासा ही खड़ा रहता, मैं तो नल को छू भी नहीं सकता था. इस काम में भी स्कूल के चपरासी का मौजूद होना जरूरी था, क्योंकि स्कूल में वही इकलौता ऐसा इंसान था, जिसका इस्तेमाल मास्टरजी इस काम के लिए करते थे. अगर चपरासी मौजूद न हो तो मुझे बिना पानी के ही रहना पड़ता था. इन हालात को कम से कम शब्दों में कहा जा सकता है- “चपरासी नहीं तो पानी भी नहीं”

ये कोई कहानी नहीं है. यह किसी पाठक को जगाने की कोशिश भी नहीं है, इन शब्दों के जरिये हम इस तरह का दावा भी नहीं कर रहे की इस त्रासदी के बारे में जानकर पाठक अपनी आंखें डर से मूंद लेंगें. लेकिन ये एक ऐसे इंसान की कहानी है जिसने इस तरह की ज़िन्दगी जी है. सवाल ये उठता है कि क्या इस पर कोई समानांतर साहित्य मौजूद है, तो मेरे दिमाग में मुल्क राज आनंद का उपन्यास अनटचेबल आता है. इसी तरह राल्फ एलिसन का इनविजिबल मैन जो कि अमेरिका में रोज़ा पार्क्स और डॉ. मार्टिन लूथर किंग से भी पहले के एक ‘अश्वेत’ इंसान की भयानक कहानी है, जो कि पढ़ने वाले को अन्दर तक हिला देती है. किताब की शुरुआत के अंश में कहानीकार किताब को इन शब्दों के साथ शुरू करता है, “मैं एक ऐसा इंसान हूं जो कि दिखता नहीं”. मुझसे मेरे आकाओं ने वादा किया है कि मुझे छात्रवृति दी जाएगी, मगर इसके लिए शर्त ये है कि मुझे एक दूसरे अश्वेत इंसान को जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी होगी, उसे एक शो में मुक्के मारने होंगें.

“धुंए में सांस लेना मुश्किल था, और इस घूंसेबाजी में कोई रांउड नहीं था. थकावट से उबरने के लिए तीन मिनट बाद कोई घंटी भी नहीं बजने वाली थी. मैं कमरे के बीचों-बीच था, चारों तरफ लाईटें थी, धुंआ था, चेहरों पर तनाव लिए, पसीने से लथपथ शरीर थे. मेरे नाक से मुँह तक खून बह रहा था, और उसके छींटे मेरी छाती पर पड़ रहे थे.

चारों तरफ आदमी चीख रहे थे. “काले लड़के, उसे मुक्के मारो, उसकी हिम्मत चकनाचूर कर दो.“

“मुक्के ऊपर मारो! खत्म कर दो. उस लड़के को खत्म कर दो!”

एलिसन ने जो लाईनें लिखीं हैं, वो पढ़ने में काफी भयानक हैं, लेकिन उतनी दुखद नहीं हैं जितनी अम्बेडकर की हैं. आप बेशक भारतीय हो या न हो आपको भारत और भारतीयों पर शर्म आएगी कि वो ऐसे पूर्वाग्रह और कट्टरता पर डटे हुए हैं, जिसके हर पोर से बर्बरता टपकती है . अंबेडकर ने पाठक को काफी जज्बाती बना दिया है. उसके शब्द बींधते और चोट करते हैं और जब तक झुलसाते हैं और झुलसते हैं, जब तब वो हवा में एक लम्बी सांस न ले लें. अगर आप वहां होते तो पूछ सकते थे. ये कैसे मुमकिन हो सकता है? अगर एक इंसान दूसरे इंसान को अछूत समझे तो फिर विज्ञान, संस्कृति और इंसान की तरक्की का क्या तुक है. इसके बावजूद फिर न्यूटन की उस खोज का क्या तुक है, जब एक गांव में हजारों मील दूर और कैवेन्डिश से कुछ सपनों से परे, एक 9 साल का बच्चा खुद बैलगाड़ी चलाकर ले जाता है और पूरी रात सिर्फ इसलिए प्यासा रहता है क्योंकि उसे पानी पीने की इजाजत नहीं मिलती?

इसका जवाब अंबेडकर के अलावा कोई और नहीं दे सकता. उनका अड़े रहना, डटे रहना, अपने अधिकारों के लिए उनका संघर्ष, उनका संविधान की रूपरेखा तैयार करना, उनका बर्बरता से भारत को बचाना, उनका भारत को संजीदा बनाए रखना, यही अंबेडकर के जवाब हैं. उसकी ज़िन्दगी अपने आप में एक जवाब है.

चैडविक को 1935 में नोबल पुरूस्कार मिला. वह परमाणु बम बनाने में सहायक थे और मैनहट्टन प्रोजेक्ट में ब्रिटिश टीम के नेता थे. जब विश्वयुद्ध थम गया तो उन्हें यूएन एटॉमिक एनर्जी कमीशन का अध्यक्ष बनाया गया, पर उन्हें ये पद रास नहीं आया और वो वापिस अपनी प्रयोगशाला में पहुंच गए. उन्होंने रसेल-आइंसटीन मैनिफेस्टो को भी साइन नहीं किया. उनका कहना था “अपनी इंसानियत याद रखो, बाकि सब भूल जाओ.“ उन्होंने पगवाश कॉन्फ्रेंस में भी हिस्सा नहीं लिया, जो कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर रोक के लिये बुलाया गया था. वह कितनी आसानी से पीछे हट गए. जिस इंसान ने न्यूट्रॉन की खोज की वह न्युट्रल हो गया.

लेकिन अंबेडकर नहीं हुए. उन्होंने कहा- ’’तटस्थ होने का मतलब भी किसी का पक्ष लेना ही होता है.’’

अगर इंसान की क्रूरता की बात की जाए तो, किसी इंसान में एक ही समय पर दो अलग-अलग भाव नहीं आ सकते. कोई किसी एक समय पर मानवीयता पर बात करे और उसी समय वह गुस्सा भी दिखाए. इसलिए कोई भी अंबेडकर की महानता, उनकी प्रतिभा और आधुनिक भारत के निर्माण में उसकी अभूतपूर्व भूमिका पर सवाल नहीं उठा सकता. देश ने उसे कुछ नहीं दिया, कुछ भी नहीं. प्यार भी उसे उन लोगों ने दिया जिनको खुद को कभी प्यार नहीं मिला जिन्हें भारत माता ने कभी कुछ नहीं दिया. इसलिए देश कभी उनके लिए एक मां की तरह नहीं बल्कि एक भू-भाग की तरह रहा. देश उनके लिए तभी मां हो सकता था जब देश प्यार देने के काबिल हो जाए, और ये तभी मुमकिन होता, जब उसमें रहने वाले लोग प्यार बांटने के काबिल हो जाएं. इसे चमत्कार ही कहा जाएगा कि अंबेडकर ने इस क्रूर जगह पर रहने का फैसला किया. बहुत से लोग जो भारत के लिए देशप्रेम का ढोंग करते हैं, अगर उनके साथ एक बार भी अन्याय हुआ हो या उन्हें विदेश में कमाने-खाने के बढ़िया मौके मिलें या फिर कहीं बेहतरीन जिन्दगी जीने का मौका मिले तो ऐसे लोग, इस देश को छोड़ने के लिए एक पल की देरी भी नहीं करेंगें. लेकिन अंबेडकर यहीं डटे रहे, न उन्हें प्रेम मिला, न उन्हें किसी ने छुआ, उसे किसी ने सामान्य सा स्पर्श भी नहीं किया.

10 मई 2015 को, अंबेडकर के ऐतिहासिक लेक्चर से ठीक सौ साल पहले उन्होंने कहा था, भारत में जातिवादउसका तंत्र, उसकी उत्पत्ति और विकास. इस लेक्चर को कलमबद्ध किया गया था और जो बाद में उनकी मशहूर किताब एनहिलेशन ऑफ कास्ट में शामिल भी किया गया. आज रतलाम के एक छोटे से गांव में एक दलित दूल्हा शादी करने के लिए घोड़े पर बैठकर आया था. उसके लिए इस गांव में कुछ असामान्य था. उसने दूल्हे की पगड़ी की जगह हेलमेट पहना हुआ था. क्यों ?

नहीं , अंबेडकर को समझना आसान नहीं है. अंबेडकर कोई महात्मा नहीं थे, पर एक महान इंसान जरूर थे. और यही फर्क होता है एक आत्मा और एक शरीर में, विज्ञान और धर्म में, भय में और निर्भयता में. अंबेडकर कोई गांधी नहीं थे जो किसी की आत्मा को छूए, अंबेडकर ने आत्मा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण चीज को छुआ, और वो चीज है दिमाग.

सिर्फ इसलिए कि उसने आत्मा को न छूकर दिमाग को छुआ, हम उसे समझ ही नहीं सकते. हम उसके दिखाए रास्ते पर नहीं चल सकते, बस उसकी पूजा कर सकते हैं. जैसा कि हम पत्थर के भगवानों के साथ करते हैं. हम पत्थरों पर लिखी इबारत पढ़ते हैं, अखबार में, पार्क में, सम्मेलनों में कैलेन्डरों में और किसी इमारत में लगे पत्थर पर खुदे नामों को पढ़ते हैं. लेकिन वो वहां तो नहीं रहता, वो बसता है, शब्दों में.

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