दिल्ली में हुई मौतें याद दिलाती हैं कि सरकारी योजनाओं के बावजूद हाथ से मैला ढोने का काम अब भी जारी है

दिखाई तो यही पड़ता है कि सैकड़ों लोगों के लिए हालात बहुत कम ही बदले हैं जो चंद पैसों की खातिर अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं.

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दिल्ली में हुई मौतें याद दिलाती हैं कि सरकारी योजनाओं के बावजूद हाथ से मैला ढोने का काम अब भी जारी है
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देश की राजधानी में पिछले मार्च महीने में छह मौतें हुईं, रोहिणी में चार और कोंडली में दो तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वत संज्ञान लेते हुए दिल्ली के मुख्य सचिव और दिल्ली के पुलिस आयुक्त सहित शीर्ष अधिकारियों को नोटिस जारी किया. जिसमें ऐसी दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई और मृतक के परिजनों को दी गई राहत से संबंधित रिपोर्ट मांगी गई है.

उचित उपकरण और सुरक्षा उपायों के अभाव में सीवेज से संबंधित कार्यों में मौतों की निरंतर घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, आयोग ने पाया है कि स्पष्ट रूप से, शीर्ष अदालत के निर्देशों और हस्तक्षेपों के बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा पर्याप्त तत्परता से कार्रवाई नहीं कि जा रही है.

देश भर में अन्य दुर्घटनाएं भी हुईं - लखनऊ में एक सीवर की सफाई के दौरान मरने वाले दो सफाईकर्मियों के परिवारों ने निजी कंपनियों पर कोई भी प्रोटैक्टिव गियर उपलब्ध नहीं कराने का आरोप लगाया है. वहीं राजस्थान के बीकानेर में करणी औद्योगिक क्षेत्र में एक सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान चार मजदूरों की मौत हो गई. बीते 10 मार्च को मुंबई के कांदिवली में जहरीली गैस से तीन सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई थी.

सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक और मानवाधिकार कार्यकर्ता बेजवाड़ा विल्सन ने यह समझाने की कोशिश की कि यह समस्या अब भी क्यों बरकरार है. उन्होंने कहा, “हाथ से मैला ढोने में शामिल 98 फीसदी लोग दलित समुदाय से आते हैं. और इसीलिए सरकार उन पर ध्यान नहीं दे रही है. ऐसे कई मामले हैं जिनकी रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई जाती है, और भारत जैसे देश में तो आप हर एक मामलों में रिपोर्ट दर्ज होने की उम्मीद कर भी नहीं सकते. इन परिस्थितियों की एक दुखद सच्चाई यह है कि इस समस्या से निपटने के लिए कानून और अदालती फैसले तो हैं, लेकिन हम अभी भी हाथ से मैला साफ करने वाले लगभग 2,000 लोगों की मौतें देख रहे हैं और फिर भी चुप हैं.”

हाथ से मैला साफ करने के काम का रोजगार के तौर पर निषेध और इस काम से जुड़े लोगों का पुनर्वास अधिनियम 2013 जैसे कानून, देश में हाथ से मैला साफ करने पर रोक लगाते हैं. इस अधिनियम के अनुसार, कोई भी व्यक्ति, स्थानीय प्राधिकरण या एजेंसी सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के जोखिम भरे काम में किसी भी व्यक्ति को नहीं लगा सकता, और इस कानून का किसी भी तरह से उल्लंघन करने पर दो साल की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

2014 के अपने एक ऐतिहासिक फैसले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को हाथ से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का आदेश दिया था. सीवर से होने वाली मौतों के लिए, आपातकालीन स्थितियों में भी बिना सुरक्षा गियर के सीवर लाइनों में प्रवेश करना को अपराध घोषित करना चाहिए.

लेकिन जैसा कि आंकड़े बताते हैं, यह प्रथा अब भी जारी है. केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले द्वारा लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई "दुर्घटनाओं" में 325 लोगों की मौत हुई हैं. इनमें से तमिलनाडु (43), उत्तर प्रदेश (52) के बाद 43 मौतों के साथ दिल्ली देश में तीसरे स्थान पर है. हालांकि, मंत्रीजी ने यह भी कहा कि हाथ से मैला ढोने की वजह से एक भी मौत नहीं हुई है.

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