7 मार्च, 2022: विकास के ‘काशी मॉडल’ की अग्निपरीक्षा

मतदाता बनारसी संस्कृति, धरोहर और जीवनशैली को तरजीह देते हैं या विकास की आंधी के पक्ष में खड़े हैं यह तो अब 10 मार्च को ही पता चल पाएगा.

Article image

पक्कामहाल की गलियां काशी की संस्कृतिक पहचान हैं. बनारसी मिजाज को जानने-समझने के लिए गली संस्कृति को जानना पड़ेगा. “मंदिर में घर और घर में मंदिर” का यह शहर है. धरोहर बचाने की लड़ाई में शामिल कुछ रणनीतिकार शहीद हो गए. इसमें पक्काप्पा के योद्धा पंडित केदारनाथ व्यास, जर्मनी की साध्वी गीता व मुन्ना मारवाड़ी का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है कुछ लोग विस्थापन के सदमे व दर्द को झेल नहीं सके और उनकी हृदयगति थम गई.

विकास समर्थक यह तर्क देते हैं कि बदलाव प्रकृति का नियम है. यह शाश्वत सत्य है लेकिन बुलडोजर के बल पर घरों को जमींदोज करके बदलाव की कहानी लिखने की प्रक्रिया को प्रकृति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है. धनबल की ताकत से लिखी गई पटकथा अब हम सबके सामने है. गंगाघाट के समानांतर उस पार बनी “रेत की नहर” को गंगा की धारा में बहते हुए हम देख चुके हैं. कोरोना की दूसरी लहर के दौरान गंगा में बहते शवों को भी लोगों ने देखा है. मई-जून, 2021 में प्रदूषण व काई लगने से गंगा का पानी हरे रंग का हो गया था, इसे भी हम जानते हैं.

देखने के लिए तो मीरघाट, ललिता, जलासेन और मणिकर्णिका श्मशान के सामने गंगा में बालू और मलबा डालकर धारा को पाटने का मॉडल भी देखा जा सकता है. मणिकर्णिका श्मशान के पास गंगा में गिरते सीवर की धारा भी सबने देखी है. बाबा मसाननाथ के पास गिरते सीवर को भी लोग देखते रहे.

इसके बावजूद वातावरण में खामोशी पसरी रही. बदलाव को टुकुर-टुकुर बनारसी देख रहे थे. यह बनारसी अस्मिता और पहचान को बचाने की जंग है. जनता पर हमें भरोसा है. मतदाता जो भी फैसला देंगे, उसका स्वाद भी उन्हें ही चखना पड़ेगा. समुद्र का मंथन हो रहा है, जिसमें से अमृत व विष दोनों निकलेगा. कुछ लोगों के हिस्से में अमृत आएगा और कुछ को जहर पीना पड़ेगा. शिव ने भी विषपान किया था. लेकिन अब लोग काफी समझदार हो गए हैं, कोई भी जहर नहीं पीना चाहता है.

गंगाघाटी की पक्काप्पा संस्कृति के अमृतेश्वर महादेव को भी मैंने देखा है जो जमीन की सतह से 10 फुट नीचे नीलकंठ महादेव की तरह शांत भाव से इस बदलाव के साक्षी रहे हैं. मणिकर्णिका श्मशान की मां काली भी कहीं हैं. 100 साल बाद कनाडा से अन्नपूर्णा मां भी अब विश्वनाथ धाम में आ गई हैं. देवता आ रहे हैं, देवता जा रहे हैं. समुद्र मंथन जारी है. देखते हैं कि किसके हिस्से में अमृत आता है और कौन करता है विषपान!

(साभार- जनपथ)

Also see
article imageमऊ: क्या सीएए प्रदर्शन के दौरान थोपे गए झूठे मुकदमे चुनावी मुद्दा नहीं हैं?
article imageएक और चुनावी शो: उत्तर प्रदेश- पूरब से पश्चिम तक बिना लहर की सवारी

Comments

We take comments from subscribers only!  Subscribe now to post comments! 
Already a subscriber?  Login


You may also like