क्या यह बजट भद्दे व्हाट्सएप संदेशों के लिए बना है

एक मार्केटिंग की जानकार सरकार के हिसाब से देखें तो यह औसत मतदाता को उत्साहित करने के लिए काफी नहीं था.

WrittenBy:विवेक कौल
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पिछले साल के बजट भाषण को ही लीजिए, जब वित्त मंत्री के कहा, "तीन सप्ताह लंबे पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा करने के 48 घंटे के भीतर, प्रधानमंत्री ने 2.76 लाख करोड़ रुपए मूल्य की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना घोषित की. इसने 800 मिलियन (80 करोड़) लोगों के लिए मुफ्त खाद्यान्न, 80 मिलियन (8 करोड़) परिवारों को कई महीनों के लिए मुफ्त कुकिंग गैस, और 400 मिलियन (40 करोड़) से अधिक किसानों, महिलाओं, वृद्धजनों, गरीबों और जरूरतमंद लोगों के लिए सीधे नकद राशि मुहैया कराई.“

या जब उन्होंने कहा, "हम मेट्रो रेल नेटवर्क के विस्तार और सिटी बस सेवा की वृद्धि के माध्यम से सार्वजनिक परिवहन के हिस्से को बढ़ाने के लिए कार्य करेंगे. सार्वजनिक बस परिवहन सेवाओं की वृद्धि के समर्थन के लिए 18,000 करोड़ रुपए की लागत पर एक नई योजना लांच करेंगे."

इस तरह की बातें जो मीडिया की सुर्खियां बन सकती हैं और व्हाट्सएप पर फैलाई जा सकती हैं, इस साल के बजट भाषण से बिल्कुल गायब थीं.

आइए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना को देखें, जो कोविड महामारी के कारण समाज के बड़े वर्गों में व्याप्त आर्थिक संकट की वजह से बहुत लोकप्रिय रही है. यह योजना प्रत्येक व्यक्ति को पांच किलो अनाज मुफ्त देती है. अभी के लिए यह योजना 31 मार्च को समाप्त हो रही है. जबकि चुनाव उस दिन से पहले होने वाले हैं. यदि यह योजना 31 मार्च से आगे बढ़ने की घोषणा हो जाती तो निश्चित रूप से मतदाता आकर्षित होते.

तो सवाल यह है कि ऐसी सरकार जिसकी मार्केटिंग जानकारी इतनी अच्छी है, इस योजना को आगे बढ़ाने के अवसर से क्यों चूक गई? राजनैतिक के साथ-साथ इसके आर्थिक फायदे भी होते, यह देखते हुए कि अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अभी भी संकट का सामना कर रहा है.

इससे पहले कि हम इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करें, आइए 2022-23 के बजट में कुल खाद्य सब्सिडी पर एक नजर डालते हैं.

कुल खाद्य सब्सिडी का बजट 2.1 लाख करोड़ रुपए हैं. यह 2021-22 के संशोधित अनुमान के अनुसार खाद्य सब्सिडी पर लगने वाले 2.9 लाख करोड़ रुपए से काफी कम है. बजट के आंकड़ों से पता चलता है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना शायद मार्च में समाप्त हो रही है. मुफ्त में अनाज देने के लिए सरकार को भारतीय खाद्य निगम की क्षतिपूर्ति करने की जरूरत है. और अगर इसके लिए बजट ही नहीं बनाया गया है तो यह भरपाई कैसे होगी?

लेकिन यह इसे देखने का तार्किक और तथ्यात्मक नजरिया है. राजनीति हमेशा तार्किक नहीं होती. इसमें समय का भी महत्व है. और सरकार अभी भी उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीखों के करीब आते ही योजना को जारी रखने की घोषणा करके सबको आश्चर्यचकित कर सकती है, ताकि यह निर्णय लोगों के दिमाग में ताजा हो और उन्हें भारतीय जनता पार्टी को वोट देने के लिए प्रोत्साहित करे. जहां तक ​​बजट में खाद्य सब्सिडी के आंकड़ों का सवाल है, उन्हें कभी भी संशोधित किया जा सकता है.

(विवेक कौल ‘बैड मनी’ के लेखक हैं.)

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