विवादों में उत्तम नरोत्तम मिश्रा

आए दिन विवादित बयान और धमकियां जारी करने वाले मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की एक झांकी.

विवादों में उत्तम नरोत्तम मिश्रा
Shambhavi
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इस मामले में पीड़ित दतिया कांग्रेस के महामंत्री नरेंद्र यादव पूरी घटना की जानकारी देते हुए कहते हैं, "हमारे ऊपर जो शिकायत दर्ज करवाई थी वो कांग्रेस के जिलाध्यक्ष अशोक दांगी ने करवायी थी और उसके बाद जो हमारे साथ व्यवहार हुआ वो गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के कहने पर हुआ था. इस मामले की शुरुआत कलेक्ट्रेट के सामने ज्ञापन देते वक्त तब हुयी थी, जब मेरी अपने जिलाध्यक्ष से कहासुनी हो गयी थी. उसके बाद गृहमंत्री मिश्राजी का पुलिस को फ़ोन आ गया था कि हमारी गिरफ्तारी की जाए. असल में दांगी के मंत्रीजी से काफी निकट के सम्बन्ध हैं और इसीलिए हमारे साथ ये बर्ताव हुआ. यह पूरा काम गृहमंत्री की रज़ामंदी से ही हुआ था."

2013 का एक वाकया दिलचस्प है. उस साल भोपाल की एक स्थानीय पत्रिका 'जगत विजन' ने मिश्रा के ऊपर कवर स्टोरी प्रकाशित की थी. इसका शीर्षक था "नरोत्तम या नराधम". कवर स्टोरी में कथित तौर पर आरोप लगाया गया था कि मिश्रा भ्रष्टाचार, उगाही, ज़बरन कब्ज़ा, शोषण, फिरौती-अपहरण, हत्या जैसे मामलों के आरोपी हैं.

इस स्टोरी के बारे में हमने तत्कालीन जगत विजन पत्रिका की संपादक विजया पाठक से बात की. उन्होंने बताया, "मैंने वो स्टोरी सबूतों के आधार पर की थी. काफी विवादित थे नरोत्तम मिश्रा. उनके खिलाफ काफी मामले थे. इसलिए हमने सोचा था कि उनके ऊपर कवर स्टोरी की जाए. हालांकि उनके खिलाफ अधिकांश मामले दबा दिए गए थे. उन्होंने मेरे खिलाफ मानहानि का कोई दावा नहीं किया.”

जगत विजन पत्रिका

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2020 में मिश्रा का नाम एक बार फिर विवादों में तब आया था जब व्यापम घोटाले का खुलासा करने वाले डॉ आनंद राय ने मिश्रा का विधायकों की खरीद-फरोख्त वाला एक तथाकथित स्टिंग वीडियो सोशल मीडिया पर डाला था.

राय उस घटना के बारे में बताते हैं, " 2018 में जब कांग्रेस मध्य प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीती थी, तब कुछ दिनों बाद ही विधायकों की खरीद फरोख्त की कवायद तेज़ हो गयी थी. ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि कांग्रेस और भाजपा के विधायकों में सिर्फ 4-5 विधायकों का ही फर्क था. मैं उस वक़्त जयस (जय आदिवासी संघटन) का रणनीतिकार था और राहुल गांधी से चर्चा करने के बाद मेरी पहचान के चार उम्मीदवार कांग्रेस के टिकट से लड़े थे और चारों सीट जीते थे. विधायकों की खरीद फरोख्त की झंडी तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष की तरफ से मिली थी."

राय आगे बताते हैं, "उन्होंने महाराष्ट्र के एक मशहूर बिल्डर के ज़रिये इंदौर में मुझ तक बात पहुंचाई थी. इस बात को लेकर तकरीबन पांच बैठकें इंदौर में हुईं और तय हुआ कि हर विधायक को 25 करोड़ रुपए मिलेंगे. मुझसे बोला गया था कि फाइनल मीटिंग के लिए मुझे अमित शाह से दिल्ली में मिलना होगा. मैं अपने दो विधायकों के साथ जनवरी 2019 में दिल्ली पहुंचा. हम मध्य प्रदेश भवन में रुके थे. लेकिन तब तक मुझे ये मालूम नहीं था कि अमित शाह ने नरोत्तम मिश्रा को भी हमसे मीटिंग करने बुलवाया था. मतलब शाह से मीटिंग के पहले हमें मिश्रा से मीटिंग करनी थी."

राय आगे बताते हैं, "मिश्रा भी वहीं मध्य प्रदेश भवन में रुके थे और मीटिंग शुरू होने के पहले वो मुझसे मिल लिए थे. वो मुझसे कह रहे थे कि तुम समर्थन करते वक़्त यह शर्त रख देना कि समर्थन तभी मिलेगा जब नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. इसके बाद हमारी और मिश्रा की कमरे में बातचीत शुरु हुयी. तब मैंने उनका स्टिंग किया था. उनकी प्लानिंग यह थी कि राज्यपाल के सामने हमारे विधायक इस्तीफ़ा दे देंगे और समर्थन वापस लेकर सरकार गिरवा देंगे. इस पूरी बातचीत की रिकॉर्डिंग मैंने दिग्विजय सिंह और कमलनाथ को भी दी थी लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया. तब लगभग एक साल के बाद मैंने खुद उस वीडियो स्टिंग को ट्वीट किया था जिसको लेकर बवाल हो गया था."

मध्य प्रदेश भाजपा ने इस स्टिंग वीडियो को गलत बताया था और कहा था कि इसका उद्देश्य सिर्फ मिश्रा की छवि को खराब करना है. गौरतलब है कि 2020 में आनंद राय ने गलवान झड़प के बारे में ट्वीट करते वक़्त एक गलत तस्वीर लगा दी थी जिसके चलते उनके खिलाफ मुकदमा हो गया था. राय ने अदालत में अपनी याचिका में कहा है कि यह मुकदमा उन पर गृहमंत्री मिश्रा के इशारे पर किया गया है.

शुरुआत से लेकर अभी तक मिश्रा का राजनैतिक करियर विवादित रहा है, इसके बावजूद उनका कद बढ़ता ही गया. 2018 का विधानसभा चुनाव मात्र 2,656 वोट से जीतने के बावजूद मिश्रा को प्रदेश का गृहमंत्री बनाया गया. राजनैतिक हलकों में ऐसा कहा जाता है कि उनके बढ़ते हुए कद के पीछे उनके सिर पर रखा अमित शाह का हाथ है.

अमित शाह के ख़ास

मिश्रा अपने राजनैतिक जीवन के शुरूआती दौर में नगर पालिका के चुंगी के ठेके लिया करते थे. शिवपुरी, गुना, अशोक नगर जैसे जिलों में उन्होंने चुंगी के ठेके चलाये. लेकिन समय गुज़रने के साथ वह आगे बढ़ते गए और मध्य प्रदेश के ताकतवर नेताओं की फेहरिस्त में शामिल हो गए.

भोपाल में पिछले 20 सालों से राजनीति को कवर कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार गोपनीयता की शर्त पर कहते हैं, "नरोत्तम मिश्रा दतिया से चुनाव लड़ते हैं. दतिया में पीताम्बरा शक्ति पीठ है जहां इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, राजनाथ सिंह, वसुंधरा राजे, अमित शाह और कई कद्दावार नेता तांत्रिक पूजा कराने आते हैं. जब भी भाजपा के बड़े नेता वहां आते थे तो मिश्रा उनकी बहुत आवभगत सबसे आगे रहते थे. 2010 में सोहराबुद्दीन केस में नाम आने के बाद जब अमित शाह के बुरे दिन चल रहे थे तब उन्होंने भी पीताम्बरा पीठ का रुख किया था और तभी से नरोत्तम मिश्रा से उनकी नज़दीकियां बढ़ती चली गयीं. आज की तारीख में अगर मध्य प्रदेश में शाह का कोई सबसे खास है तो वो हैं नरोत्तम मिश्रा."

वह आगे कहते, "इन दोनों की नज़दीकी का एक कारण ये भी है कि दोनों ही शिवराज सिंह चौहान को नापसंद करते हैं. संघ के सरकार्यवाह भैय्या जी जोशी भी शिवराज को बहुत पसंद करते हैं और मोदी ने भी शिवराज को हटाने से मना कर दिया था इसलिए शिवराज को हटा पाने में अमित शाह कामयाब नहीं हुए."

शिवपुरी में रहने वाले स्वतंत्र पत्रकार अजय खेमरिया कहते हैं, "नरोत्तम मिश्रा मौजूदा दौर में मध्य प्रदेश के सबसे सक्रिय राजनेता हैं. वो सार्वजनिक जीवन में इतने सक्रिय हैं कि गांव-गांव की दीवारों पर उनका मोबाइल नंबर लिखा रहता है. वो एक मात्र ऐसे मंत्री है जो खुद अपना फोन उठाकर जवाब देते हैं वरना ज़्यादातर नेताओं और मंत्रियों के फ़ोन पहले उनके सचिव उठाते हैं और मीटिंग आदि के बहाने देने लगते हैं. पिछले 18 सालों से हर शनिवार और रविवार वो अपने विधानसभा क्षेत्र में होते हैं. उनके घर पर लोगों का तांता लगा रहता है और जनता उनके बेडरूम में घुसकर बैठी रहती है. ज़मीनी स्तर पर लोगों से उनका सीधा जुड़ाव है.”

खेमरिया कहते हैं, "लोग उनको यारों का यार कहते हैं. कोई भी उनके पास जाता है तो उनका व्यवहार बहुत दोस्ताना होता है और वो मदद करने की पूरी कोशिश करते हैं. उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद की नीति का इस्तेमाल कर कांग्रेस का अपने विधानसभा क्षेत्रों से सफाया कर दिया. चाहे उन पर अमित शाह का हाथ हो, चाहे वो छह बार विधायक रह चुके हों या मीडिया में बयानबाज़ी के चलते छाए हों फिर भी वह मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगे क्योंकि वह एक सवर्ण हैं."

मिश्रा पर लगे भ्रष्टाचार के मामलों के बारे में खेमरिया कहते हैं, "उन पर लगे भ्रष्टाचार के मामलों से उनके फैनबेस में कोई कमी नहीं आयी है. क्योंकि भ्रष्टाचार के इन मामलो से सीधे तौर पर उनके समर्थकों का कोई नुकसान नहीं हुआ है. इसके अलावा यह मामले ऐसे भ्रष्टाचार के नहीं थे जिसमें आम आदमी की ज़मीन पर कब्ज़ा हो गया हो या किसी को लूट लिया हो. इसके अलावा उन्होंने अपने रिश्तेदारों का नेटवर्क बना रखा है जिसका इस्तेमाल कर वह अपने मतदाताओं के काम कराते रहते हैं. इसलिए उनके भ्रष्टाचार से उनके समर्थकों में कोई कमी नहीं आयी है.”

न्यूज़लॉन्ड्री ने गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा से उनके बयानों और उन पर लगे भ्रष्टाचार के मामलों के बारे में विस्तार से बात की. वो कहते हैं, "जो बात मुझे सही लगती है मैं वही बोलता हूं. बाकि भ्रष्टाचार के मुझ पर कोई मामले नहीं हैं. पेड न्यूज़ मेरे हिसाब से भ्रष्टाचार का मामला नहीं है और मुझे उसमें सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल चुकी है. रही बात कांग्रेस को लोगों को धमकाने की तो दतिया में कांग्रेस के पदाधिकारियों पर उन्हीं के जिलाध्यक्ष ने केस दाखिल किया था ना कि किसी भाजपा वाले ने.”

"भारतीय लोकतंत्र के विकास में विधायक की भूमिका" कहने तो यह शीर्षक नरोत्तम मिश्रा की पीएचडी का विषय है लेकिन मौजूदा स्थिति में हम कह सकते हैं कि विधायक की भूमिका उनके लिए सिर्फ विवादित बयान देने तक सीमित है. वह हर मुद्दे पर बोलते हैं भले ही वह उनसे जुड़ा हो या ना हो. अटपटे बयानों की एक लंबी होती लिस्ट है जिससे आप समझ पाएंगे की, नरोत्तम मिश्रा हर फटे में अपनी टांग जरूर अड़ाते हैं.

कुछ महीने पहले इंदौर में एक चूड़ी वाले की हिंदू संगठनों ने पिटाई कर दी थी. गृहमंत्री ने कहा पीड़ित का साथ देने वालों में पीएफआई के लोग भी शामिल हैं. हांलाकि बाद में प्रदेश के डीजीपी ने उनके इस बयान को खारिज कर दिया.

इसी तरह फैशन डिजाइनर सब्यसाची के मंगलसूत्र के विज्ञापन पर विवाद खड़ा हो गया. देश भर में लोगों ने इसका विरोध किया लेकिन नरोत्तम मिश्रा ने एक कदम आगे बढ़ते हुए चेतावनी देते हुए कहा कि अगर विज्ञापन वापस नहीं हुए तो हम पुलिस भेजेंगे. इसके बाद डिजाइनर ने माफी मांग ली और अपना विज्ञापन वापस ले लिया.

• मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में वेब सीरीज आश्रम 3 की शूटिंग के दौरान बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने फिल्म के सेट पर मारपीट की और प्रकाश झा पर स्याही फेंकी. इस घटना के बाद नरोत्तम मिश्रा ने बजरंग दल के लोगों को देशभक्त कहा. साथ ही उन्होंने सवाल किया की, फ़िल्म का नाम आश्रम ही क्यों रखा गया. उन्होंने कहा जिन्होंने कल प्रकाश झा और उनकी टीम के साथ मारपीट की उन पर कार्रवाई हो रही है, लेकिन प्रकाश झा आप पर क्या कार्रवाई की जाए.

• डाबर ने दो युवतियों द्वारा आपस में करवा चौथ का व्रत खोलने का विज्ञापन आने के बाद नरोत्तम मिश्रा ने बयान दिया की विज्ञापन को तुरंत हटाए. इसके बाद डाबर ने माफी मांगी और अपना ऐड वापस ले लिया.

हार्डकोर हिंदुत्व के रास्ते पर चल रहे नरोत्तम मिश्रा ने हाल ही में एक बड़ा बयान पुलिस करवाई में इस्तेमाल होने वाले उर्दू शब्दों को लेकर दिया. उन्होंने कहा, "उत्तर प्रदेश की तर्ज पर एमपी में भी पुलिस विभाग की कार्रवाई में इस्तेमाल होने वाले उर्दू फारसी के शब्द बदले जाएंगे. गृहमंत्री ने कहा कि जो शब्द प्रचलन में नहीं हैं या जिन की उपयोगिता नहीं है उन शब्दों को बदला जाएगा."

कुछ समय पहले अयोध्या में राममंदिर के लिए धनसंग्रह के लिए हिंदूवादी संगठनों ने अलग अलग जिलों में रैलियां निकली. इस दौरान उज्जैन में हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं पर पथराव के बाद आरोपियों के घरों को जमींदोज कर दिया गया. अपनी करवाई को सही ठहराते हुए गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने साफ कहा कि जिस घर से पत्थर आएंगे, वहीं से पत्थर निकाले जाएंगे. और वहीं से पत्थर निकाले भी गए हैं.

राजनीति की शुरुआत

1960 में ग्वालियर में जन्मे मिश्रा के पिता शिवदत्त शर्मा पेशे से डॉक्टर थे. डबरा के संत कंवर राम विद्यालय से बारहवीं पास करने के बाद मिश्रा ने बीकॉम करने के लिए ग्वालियर के कॉलेज में दाखिला लिया था.

उनके बड़े भाई और जीवाजी यूनिवर्सिटी के पूर्व रजिस्ट्रार आनंद मिश्र कहते हैं, "हमारे पिताजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तारक रह चुके थे. हमारे ताऊजी महेश दत्त मिश्रा कांग्रेस के विधायक और मंत्री थे. उनके राजनीति में प्रवेश का किस्सा भी ऐतिहासिक है. साल 1977 की बात है. मैंने उस साल वृंदा सहाय कॉलेज से छात्रसंघ के अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था लेकिन एक वोट से मैं हार गया था. उस वक़्त नरोत्तम ग्वालियर में बी.कॉम कर रहा था. जब मैं चुनाव हारा था तो वो ग्वालियर से डबरा लौट कर आया और मुझसे कहा कि मैं आपको छात्रसंघ का चुनाव जीत कर दिखाऊंगा. वो सबसे ज़्यादा वोट से जीतने वाला सबसे छोटी उम्र का छात्रसंघ अध्यक्ष बना. वह उसके राजनैतिक जीवन की शुरुआत थी उसके बाद उसने दोबारा मुड़ कर कभी पीछे नहीं देखा.”

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