5जी टेक्नोलॉजी: संभावनाएं, आशंकाएं और सेहत से जुड़े मिथक

फिल्म अभिनेत्री जूही चावला ने देश में 5जी को लागू करने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है.

5जी टेक्नोलॉजी: संभावनाएं, आशंकाएं और सेहत से जुड़े मिथक
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त्रुटिपूर्ण आकलन पर आधारित है 5जी का डर!

साल 2000 में अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में ब्रोवार्ड काउंटी पब्लिक स्कूल ने भौतिक विज्ञानी बिल पी करी से यह अध्ययन करने को कहा कि स्कूल में वाईफाई नेटवर्क लगाने से बच्चों की सेहत को कोई खतरा तो नहीं होगा. करी ने स्कूल को दी गई रिपोर्ट में कहा कि इस टेक्नोलॉजी से “स्वास्थ्य को गंभीर खतरे” हो सकते हैं. साल 2019 में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि करी का शोध और वह ग्राफ, जिसके आधार पर उन्होंने खतरे की बात कही, वह त्रुटिपूर्ण था.

न्यूयार्क टाइम्स की इस रिपोर्ट में जीव विज्ञानियों के हवाले से दावा किया गया कि अधिक फ्रीक्वेंसी पर रेडियो तरंगें मानव शरीर के लिये सुरक्षित हो जाती हैं न कि खतरनाक क्योंकि हमारी त्वचा एक बैरियर की तरह काम करती है और मस्तिष्क समेत मानव अंगों को बचाती है. हालांकि अत्यधिक फ्रीक्वेंसी वाली तरंगें (जैसे एक्स-रे) अलग तरीके से व्यवहार करती हैं और उनका स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव होता है. जिन जानकारों ने करी की रिपोर्ट में त्रुटि खोजी उनका कहना था कि करी एक बहुत अच्छे भौतिक विज्ञानी थे लेकिन उन्हें जीवविज्ञान की समझ नहीं थी. इसलिये उन्होंने त्वचा के रक्षात्मक पहलू को अपने विश्लेषण में शामिल नहीं किया. हालांकि न्यूयॉर्क टाइम्स ने रेडिएशन के प्रति त्वचा का रक्षात्मक स्वभाव बताने के लिये जिस शोध का ज़िक्र किया है वह अब इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है.

न्यूज़लॉन्ड्री ने इस बारे में चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों से बात की जिनका कहना है कि मानव त्वचा भी शरीर के कई दूसरे ऑर्गन्स की तरह ही है और उसका मुख्य काम बाहरी ख़तरों से हमारी प्रतिरक्षा करना है. इसलिये त्वचा द्वारा रेडिएशन से रक्षा की थ्योरी बुनियादी रूप में सही है लेकिन अलग-अलग रेडिएशन की तीव्रता और कितनी देर तक एक्सपोज़र रहा यह देखना महत्वपूर्ण है. अभी तक हुये अध्ययनों के आधार पर कोई आखिरी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.

यह महत्वपूर्ण है कि जब करी ने मानव स्वास्थ्य के लिये इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड के खतरे को बताते हुये रिपोर्ट दी तब 3जी टेक्नोलॉजी भी प्रयोग में नहीं थी. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि करी से पहले 1978 में खोजी पत्रकार पॉल ब्रॉडियर ने भी एक रिपोर्ट में यह तर्क दिया था अधिक फ्रीक्वेंसी का बढ़ता इस्तेमाल इंसानी सेहत को ख़तरे में डाल सकता है.

हालांकि ब्रॉडियर की रिपोर्ट न तो करी की रिपोर्ट जितनी स्पष्ट थी और न ही उसमें इतना आत्मविश्वास था. साल 2010 में आई करी की रिपोर्ट ने सेलफोन और वाइफाइ रेडिएशन के प्रति शंका को ज़बरदस्त बढ़ावा दिया और पूरी दुनिया में सेल फोन रेडिएशन के खतरों की बात होने लगी. इसके एक साल बाद ही डब्ल्यूएचओ ने मोबाइल रेडिएशन से 2-बी श्रेणी के कैंसर रिस्क वाली रिपोर्ट जारी की जिसका ज़िक्र ऊपर किया गया है.

करी की रिपोर्ट आने के अगले दशक में उनके ग्राफ को न जाने कितने लोगों ने सेल फोन रेडिएशन के ख़तरों को सिद्ध करने के लिये इस्तेमाल किया. साल 2011 में न्यूयॉर्क की यूनिवर्सिटी ऑफ ऑल्बनी में पब्लिक हेल्थ फिजिशियन डॉ डेविड ओ कारपेंटर ने कोर्ट में दायर एक मुकदमे में अपनी दलील को मज़बूत करने के लिये बिल करी के ग्राफ का इस्तेमाल किया. यह मुकदमा एक दंपति की ओर से किया गया था जिन्हें डर था कि रेडिएशन उनके स्कूल जाने वाले बच्चों को बीमार कर सकता है.

आईटी और मेडिकल क्षेत्र के जानकारों की राय

टेलीकॉम और आईटी इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा 5जी से ख़तरों की आशंका को “कुछ लोगों द्वारा डर का व्यापार” बता रहा है.

सेल्यूलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) के एक अधिकारी ने इस रिपोर्टर से अनौपचारिक बातचीत में कहा, “हमारे देश में गणेश के दूध पीने पर विश्वास कर लिया जाता है तो 5जी पर शंका करने पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये. यह डर इसलिये भी फैलाया जा रहा है क्योंकि तथाकथित रिसर्च ने नाम पर कई संस्थान सरकारों से बड़ी फंडिंग करा सकते हैं.”

लेकिन डाटा सुरक्षा और साइबर सिक्योरिटी सलाहकार राहुल शर्मा कहते हैं, “हमारी ज़िंदगी में वायरलेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल इतना बढ़ चुका है कि हम हर वक्त तरंगों और रेडिएशन के बीच रहने के लिये बाध्य हैं. कोरोना महामारी के बाद तो हमारा काम और लाइफस्टाइल ऐसा बन चुका है कि रोज़ाना एक्सपोज़र लेवल बढ़ रहा है. ऐसे में जब हम 5जी से जुड़ी दुनिया प्रवेश कर रहे हैं, जहां कई उपकरण और सेंसर हमारे जीवन का हिस्सा बनेंगे, तो सेहत पर कम और लम्बी अवधि में क्या असर पड़ेगा यह पता लगाने के लिये स्वतंत्र और विशेषज्ञ शोध की ज़रूरत है.”

महेश उप्पल कहते हैं, “मैं उन लोगों या संस्थाओं की बात पर भरोसा करूंगा जो विश्वसनीय रिसर्च कर रहे हैं. अभी तक हमारे सामने कोई भरोसेमंद साक्ष्य नहीं है जिसके आधार पर 5जी को हानिकारक कहा जाये. आप जानते हैं कि इन (5जी) तरंगों की ऊर्जा उस रेडिएशन के मुकाबले काफी कम है जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम सेहत को संभावित ख़तरों के बारे में अपनी जानकारी अपग्रेड न करें और रिसर्च रोक दें.”

दिल्ली स्थित लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग में डायरेक्टर, प्रोफेसर डॉ किशोर सिंह कहते हैं, “हम तो (5जी की तुलना में) बहुत हैवी रेडिएशन से डील करते हैं. लेकिन हमारा रेडिएशन एक्सपोजर कुछ सेकेंडों के लिए होता है जबकि मोबाइल रेडिएशन का एक्सपोजर बहुत लंबे वक्त तक होता है. इस लगातार और लम्बे इस्तेमाल का क्या असर होगा यह कोई नहीं जानता. मोबाइल आये हुये करीब 25 साल हो गये हैं लेकिन अब तक हमें कोई ऐसा साक्ष्य नहीं मिला है कि ये रेडिएशन बीमारी पैदा कर रहे हैं.”

दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में न्यूरोलॉजी विभाग में विशेषज्ञ डॉ मंजरी त्रिपाठी कहती हैं, “दुनिया भर में 5जी के इस्तेमाल और प्रभाव को लेकर पर्याप्त अनुभव नहीं है. यह पिछले 6 महीने से एक साल के भीतर ही कुछ देशों में शुरू किया गया है. भारत में 5जी ट्रायल अभी शुरू ही हो रहे हैं और किसी उपभोक्ता को इसे नहीं झेलना पड़ा है.”

भारत में अभी 116 करोड़ से अधिक मोबाइल कनेक्शन हैं और यह अनुमान है कि 2026 तक 5जी के ही 35 करोड़ उपभोक्ता होंगे.

डॉ मंजरी कहती हैं, “हम मोबाइल फोन के साथ बहुत अधिक वक्त बिताते हैं. चाहे दोस्तों से बातें करना हो या फिर मनोरंजन के लिये. हमें जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिये और 5जी को शुरू करने से पहले स्वतंत्र अध्ययन और रिसर्च के आधार पर अधिक भरोसमंद और स्पष्ट वैज्ञानिक जानकारी हासिल करनी चाहिये.”

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