“हम श्मशान के बच्चे हैं”: वाराणसी के घाटों पर कोविड लाशों का क्रिया कर्म कर रहे मासूम

वाराणसी में कोरोना का कहर इतनी तेज़ी से फैला रहा है कि यहां के श्मशान घाट पर कोविड लाशों का ढ़ेर लगा है. यहां श्मशान घाट पर डोम जाति के बच्चे कोविड लाशों को जलाने का काम कर रहे हैं.

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स्कूल बंद होने के बाद से श्मशान पर ही समय बिताते हैं बच्चे

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“अजय चौथी कक्षा में पढ़ते हैं लेकिन लॉकडाउन के बाद से कभी स्कूल नहीं खुला जिसके चलते उनका ज़्यादातर समय हरिश्चंद्र घाट पर ही गुज़रता है. ऑनलाइन पढ़ाई समझ नहीं आ रही है. बहुत बार इंटरनेट नहीं चलता या टीचर नहीं पढ़ाता. पढाई नहीं हो रही तो क्या करें? यहां पैसे भी कमा लेते हैं. जब से कोविड की दूसरी लहर शुरू हुई है घाट पर लाशों का ढ़ेर लगा हुआ है. रोज़ 100 लाशें आती हैं," अजय ने बताया.

अगर बच्चे काम नहीं करेंगे तो स्कूल की फीस कौन भरेगा?

इन सभी बच्चों का लीडर 17 वर्षीय गौरव है. गौरव बागची झारखंड का रहने वाला है लेकिन जन्म से वाराणसी का हरिश्चंद्र घाट ही उनका घर है. वो पिछले कई सालों से घाट पर काम कर रहा है और नौवीं कक्षा में पढता है. उन्होंने बताया, “अगर बच्चे काम नहीं करेंगे तो स्कूल की फीस नहीं दे पाएंगे, डोम समाज के कई बच्चे यहां मज़दूरी करते हैं. अगर काम नहीं करेंगे तो कमाएंगे कहां से? जो पैसा मिलता है उस से स्कूल की फीस भरते हैं. जो बच जाता है उस से पढ़ाई और घर का अतिरिक्त सामान आ जाता है,"

गौरव बताते हैं, “वह और बस्ती के अन्य बच्चे पास ही बने बंगाली तोला इंटर कॉलेज में पढ़ते हैं. लेकिन लॉकडाउन के बाद से पढ़ाई इंटरनेट के माध्यम से कराई जा रही है. ऐसे में डोम समुदाय के ये बच्चे दो साल से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं.”

कौन है डोम जाति के ये लोग?

इस समुदाय के लगभग 35 परिवार शहर के मुख्य श्मशान हरिश्चंद्र श्मशान घाट के आसपास रहते हैं. शवों की बदबू और काला धुआं आसपास की हवा को भर देता है. डोम समुदाय दलितों की सबसे निचली श्रेणी के पायदान पर आते हैं. कुछ किसान और बुनकरों का काम कर लेते हैं लेकिन इनका मुख्य पेशा 'मौत की क्रिया' से जुड़ा है. ये तबका शवों को जलाकर अपनी आजीविका चलाता है. इनका दिन लाशों के साथ शुरू होता है और लाशों के बीच ही ख़त्म. वाराणसी में गंगा किनारे कई घाट बने हुए हैं. इसमें दो घाटों, हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका घाट पर सिर्फ अंतिम संस्कार किया जाता है. हालांकि कोविड के दौर में वाराणसी में कई जगह अस्थायी श्मशान घाट बना दिए गए हैं.

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हिन्दू परम्पराओं के अनुसार वाराणसी भगवान शिव ने बसाया था. यह माना जाता है कि अंतिम संस्कार करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. वाराणसी में डोम जाति के लोग ये काम करते हैं. इस जाति का हर सदस्य अंतिम संस्कार की किसी न किसी प्रक्रिया से जुड़ा है. कोई अग्नि देता है, कोई लकड़ियों का प्रबंध करता है तो कोई चिता बनाता है. इन्हें लाश जलाने के लिए 600 रुपए तक मिल जाते हैं. इनके घर की स्थिति अच्छी नहीं होती इसलिए ये लोग बचपन से ही लड़कों को लाशों के इस व्यापार में घसीट देते हैं. महिलाएं या लड़कियां ये काम नहीं करतीं हैं.

33 वर्षीय विक्रम चौधरी डोम राजा हैं. डोम राजा समुदाय के मुखिया की तरह होता है. विक्रम ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “घर में गरीबी के चलते बच्चों को कम उम्र से श्मशान के कामों में लगा दिया जाता है. कोविड की लाशों के बीच काम कर रहे ये बच्चे न तो मास्क पहनते हैं न कोई पीपीई किट. बस गमछे से मुंह ढक कर लाश को आहुति देते हैं.”

“उनके तीन बच्चे हैं. जो काम वो करते हैं, वो नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी वही काम करें. लेकिन कोविड ने उनके बच्चों की शिक्षा पर प्रहार किया है. सब पढ़ाई ऑनलाइन हो गई है. फीस के साथ इंटरनेट में पैसा जा रहा है. पढ़ाई कुछ होती नहीं है. सारा पैसा बस पानी में बह रहा है," विक्रम कहते हैं.

"हमने अपनी ज़िन्दगी में इतनी लाशें कभी नहीं देखी. 15-20 दिन तो हर मिनट लाशें आ रही थीं. हम खुद डर गए थे. लाशें इतनी थीं कि लोग कम पड़ गए थे. इतने लोग कितना काम करेंगे? ऐसे में 12 साल के बच्चों को काम पर बुलाना पड़ा. इन बच्चों को लाश जलाने लाए परिवार पैसा देते हैं," विक्रम ने बताया.

हरिश्चंद्र घाट पर 11 से 15 साल के कई बच्चे काम करते हैं. लेकिन आज तक किसी ने उन्हें मना नहीं किया है. बता दें भारत में बाल श्रम (निषेध व नियमन) अधिनियम 1986 के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से काम कराना गैरकानूनी है. बच्चों से ओवरटाइम या रात के समय काम कराना भी अपराध है.

बच्चों की सुरक्षा के मद्देनज़र इस रिपोर्ट में सभी बच्चों के नाम बदलकर लिखे गए हैं.

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