आढ़ती व किसान का रिश्ता गिद्ध और चूहे का नहीं बल्कि दिल और धड़कन का है

जो जितना बड़ा आढ़ती है उसका किसानों से उतना ही गहरा रिश्ता और उतनी बड़ी उधारी. क्या सरकार के कानून में इस बात का जिक्र है?

WrittenBy:अश्वनी शर्मा
Date:
Article image
  • Share this article on whatsapp

"केंद्र सरकार ने कृषि सुधार के नाम पर तीन कानून पारित किये हैं. सरकार का दावा है कि ये कानून जादू की छड़ी हैं जो किसानों की सभी समस्याओं का समाधान कर देंगे और किसान के सबसे बड़े दुश्मन बिचौलिए/आढ़ती को समाप्त कर देंगे. इससे किसानों की आय डबल हो जायेगी किन्तु सरकार ये भूल गई है कि आढ़ती व किसान का रिश्ता गिद्ध और चूहे का नहीं हैं बल्कि ये दिल और धड़कन का रिश्ता है. यदि किसान दिल है तो उसकी धड़कन आढ़ती है जैसे दिल के बगैर धड़कन का कोई अस्तित्व नहीं हैं ठीक वैसे ही धड़कन के बिना दिल के भी कोई मायने नहीं हैं. यही बात आढ़ती व किसान के मध्य है लेकिन हमारी सरकार के इन बिलों में ये एप्रोच नहीं हैं. वे दिल और धड़कन को अलग करना चाहती है."

रोजाना की तरह आज भी प्रहलाद खोड़ा, जगदीश, छोटेलाल और बंशीधर, सुबह करीब चार बजे लाल कोठी, जयपुर मंडी में पहुंच गए हैं. प्रहलाद के पास हरी मिर्च, जगदीश के पास टमाटर, छोटेलाल के पास लोकी व बंशीधर के पास गाजर हैं. ये लोग चैनपुरा की ढाणी, जमना राम गढ़, जो की जयपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर से यहां अपना उत्पाद बेचने आते हैं.

मंडी का काम सुबह 3-4 बजे से शुरू होकर सुबह 8 बजे तक चलता है. दूर दराज ग्रामीण क्षेत्रों के दुकानदार, रेहड़ी- खोमचे वाले, कॉलोनियों के दुकानदार, होटल व टिफिन सप्लाई वाले तथा शादी विवाह वाले सभी ग्राहक सुबह आठ बजे से पहले ही अपना सामान ले जाते हैं. यदि वे मंडी से सामान देरी से लेकर जायेंगे तो अपने बिक्री स्थान पर जाकर अपना सामान कब बेचेंगे?

प्रहलाद व जगदीश के जैसे हज़ारों किसान अपना- अपना उत्पाद लेकर सुबह 3-4 बजे ही मंडी में आ जाते हैं और 8 बजे तक वहां से वापस अपने गांव ढाणी लौट जाते हैं. ऐसा नहीं हैं कि ये केवल जयपुर की मंडी में होता है बल्कि हिंदुस्तान के हर कोने में स्थित हॉलसेल की मंडी में ऐसे ही कारोबार होता है.

subscription-appeal-image

Support Independent Media

The media must be free and fair, uninfluenced by corporate or state interests. That's why you, the public, need to pay to keep news free.

Contribute
imageby :

प्रहलाद, जगदीश व बंशीधर ने आढ़ती अंकित की दुकान के सामने खाली पड़े थड़े ('थड़ा' दुकान के सामने की वो खाली जगहं होती है, जहां किसान अपने लाये उत्पाद को रखते हैं) पर अपने उत्पाद को रख दिया है. ग्राहक उन उत्पाद को जांच परखकर उसका भाव आंकते हैं. यदि किसान और ग्राहक में मूल्य को लेकर सहमति बन जाये तो सौदा हो जाता है.

प्रहलाद की कुल हरी मिर्च 55 किलो हुई हैं. जिनकी कीमत 50 रुपये प्रति किलो के हिसाब से 2750 रुपए का हुआ है. आढ़ती अंकित ने अपना चार फीसदी कमीशन/आढ़त काटकर शेष बची नकद राशि 2640 रुपये प्रहलाद को सौंप दिए हैं जबकि ये सौदा उधार में हुआ है. आढ़ती अंकित ने ग्राहक से 2750 के साथ अपना छह फीसदी खर्चा जोड़ा है. (जो हर ग्राहक से वसूला जाता है) मतलब आढ़ती को कुल 10 फीसदी कमीशन मिलेगा.

प्रहलाद की उम्र अभी 22 वर्ष है. वो अपने पिताजी लल्लू राम खोड़ा की खेती- किसानी के कार्यों में मदद करता है और साथ में जयपुर सुबोध कॉलेज से बीएससी फाइनल ईयर का छात्र है. वो उस ढाणी में सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा व्यक्ति है. कृषि सुधारों के नाम पर केंद्र सरकार ने जो तीन कानून बनाये हैं. उनको लेकर प्रहलाद अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहता है कि, "देखिये मैं हरी मिर्च लेकर आया, चार फीसदी आढ़त काटकर मुझे 2640 रुपये मिल गए इसमें से 50 रुपया किराये में चला जायेगा. कुल बचत हुई 2590 रुपये."

प्रहलाद आगे बताता है कि "मैं तो ये सोचकर आया था कि यदि मेरी हरी मिर्च 40 रुपये प्रति किलो के हिसाब से भी बिक जाएगी तो मैं तुरंत दे दूंगा लेकिन आढ़ती ने मिर्च देखकर कहा कि रेट ज्यादा लगाएंगे. आढ़ती को ज्यादा फायदा तभी होगा जब मेरी मिर्च ज्यादा महंगी बिकेगी. आढ़ती ने इसे उधार में बेचा है. मुझे इस बात से कोई वास्ता नहीं कि उसका उधार का पैसा कब आयेगा और कैसे आयेगा. टुकड़ो में आएगा या एक साथ आयेगा. मैं पिछले दो वर्षों से मंडी में आ रहा हूं. आढ़तियों के बगैर हमारा काम कैसे चलेगा?

imageby :

जगदीश पिछले 20 वर्षों से जयपुर मंडी में आ रहे हैं. जगदीश ने लॉकडाउन के समय आढ़ती से नौ हज़ार रुपये उधार लिए थे. अपने टमाटर के हर चक्कर के साथ वो 500 रुपये कटवा देता है. जगदीश हमे बताते हैं कि "आढ़ती के बिना हम चार कदम भी नहीं चल सकते. हमे जब भी आवश्यकता पड़ती है. घर मे कोई बीमार हो जाये, कोई त्यौहार हो तो हम आढ़ती के पास ही जाते हैं. आढ़ती तो हमारा बिना ब्याज का एटीएम कार्ड है. मुझे इन नौ हज़ार रुपये का कोई ब्याज नहीं देना है. थोड़ा-थोड़ा करके मैं इसे लौटा दूंगा."

जगदीश इन कानूनों को तो नहीं समझते लेकिन उनके दिमाग में एक सवाल जरूर है. जगदीश कहते हैं कि मंडी में हज़ारों किसान अपना सामान लेकर आते हैं. खुला बाजार है. सैंकड़ों आढ़ती हैं. एक के साथ न जंचे तो दूसरे, तीसरे के पास चले जाओ. यदि लाल कोठी मंडी न जंचे तो मुहाना मंडी में चले जाओ. वो ही चार फीसदी आढ़त देनी है. अब सरकार को पता नहीं कौन लोग खरीदेंगे? यदि किसी को उनके साथ नहीं जंचे तो वो किसान क्या करेगा? यदि वे हमारे हिसाब की कीमत न दें तो हम क्या करेंगे? किसके पास जायेंगे? आढ़ती डेविल है या एंजेल?

आये दिन गाये- बजाए सरकार और आम लोग ये कहते हुए मिल जायेंगे की आढ़तिया/कमीशन एजेंट किसानों से औने पौने दामों पर उसका उत्पाद खरीद लेता है और बाद में ऊंचे दामों पर बेच देता है. कुछ लोग इसी बात को जमाखोरी से जोड़ देते हैं. उनका कहना है कि आढ़ती पहले किसान से सस्ता खरीद लिया ओर उसे जमा कर लिया जिससे भाव बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था अस्थिर हो जायेगी.

दरअसल हम लोग सुनी सुनाई बातों और फर्जी दावों के प्रभाव में जल्दी आते हैं. हकीकत का इन दावों के दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. हमें हॉलसेल मंडी की कार्यप्रणाली को समझना होगा. उसके बाद हम ये समझ सकेंगे कि किसान के लिए आढ़तिया एंजेल हैं या डेविल ?

imageby :

हॉलसेल मंडी के अंदर का गणित

हॉलसेल मंडी में दुकानदारों/आढ़तियों की एक लंबी सूची रहती है. आढ़तियों का काम किसान के उत्पाद को बिकवाना हैं. इसके लिए आढ़तियों को फिक्स कमीशन/आढ़त मिलती है. एक सामान्य दुकानदार और आढ़ती में यही अंतर होता है. जहां दुकानदार केवल सामान खरीदकर उसे ग्राहक को बेच देता है वहीं आढ़ती किसानों के उत्पाद बिकवाता है. जबकि दुकानदार ये काम नहीं करता.

अधिकांश आढ़तियों के पास लाइसेंस व कुछ के पास लाइसेंस नहीं होता लेकिन वे लोग अन्य लाइसेंस के जरिये अपना काम करते हैं. आढ़ती किसान व ग्राहक के बीच की कड़ी होता है. वो दुकान किराये पर लेता है. पल्लेदार रखता है. ये पल्लेदार किसान की गाड़ी से सामान दुकान/आढ़त पर उतारने व उसे ग्राहक की गाड़ी में लादने का काम करते हैं. वो हिसाब- किताब. जमा बही, उधारी इत्यादि के लिए मुनीम रखता है. बिजली- पानी इत्यादि की व्यवस्था करता है.

आढ़ती किसान व उसके साथियों को अपने यहां ठहराता है. उनके खाने पीने का इंतज़ाम करता है. हालांकि अब किसान भवन बन गए किन्तु अभी भी किसान आढ़ती के पास ही रुकना पसंद करता है. आढ़ती किसान को नकद राशि का भगतान करता है जबकि ग्राहक उधारी में लेकर जाता है. इसमें सरकारी मार्केट कमेटी का भी कमीशन होता है. हरियाणा, गुरुग्राम में खांडसा मंडी में भी अन्य हॉलसेल की मंडियों की तरह से आढ़तियों की एक पूरी सूची है. जिसमे कुल आढ़ती 300 से ज्यादा हैं. जबकि लाइसेंस धारी आढ़तियों की संख्या 173 हैं.

गुरुग्राम खांडसा मंडी में आढ़ती पवन शर्मा हमें बताते हैं कि, "सरकार हमें किसानों का दुश्मन बनाने पर तुली हुई है. देखिये किसान आलू का ट्रक लेकर आया है. ट्रक में 400 कट्टे आलू हैं. ये सारे कट्टे एक किसान के भी हो सकते हैं और 2-3 किसानों का भी माल हो सकता है. मान लीजिये की आलू का एक कट्टा औसतन 50 किलो का है और दो रुपये प्रति किलो के हिसाब से 100 रुपये का हुआ. गाड़ी में कुल कट्टे हैं 400 इनका कुल रेट हुआ 40 हज़ार रुपये. 10 फीसदी हमारा कमीशन मतलब चार हज़ार रुपये हमें मिले. वर्ष 2018 तक मार्किट कमेटी दो फीसदी हमसें ले लेती. हमारे पास बचा आठ फीसदी. सरकार एक फीसदी लेती है हमारे पास बचता है नौ फीसदी.

imageby :

पवन आगे बताते है, "अब जरा कल्पना करो. यदि ये आलू चार रुपये प्रति किलो का बिकेगा तो एक कट्टा हुआ 200 रुपये का और 400 कट्टे हुए 80 हज़ार रुपये के. इसमें हमारा 10 फीसदी कमीशन हुआ आठ हज़ार रुपये. इसमें एक फीसदी (800) सरकार को दिये. अब ये बताइये की हम किसान के उत्पाद का रेट ज्यादा चाहेंगे या कम? जो लोग ये कहते हैं आढ़ती किसान से खरीद लेगा फिर उसे ऊंचे दाम पर बेचेगा. आप मंडी में आ जाएं. माल कैसे बिकता है? किसान अपने उत्पाद के साथ आता है. आढ़त में 90 फीसदी उत्पाद सीधे गाड़ी से बिकता है. गाड़ी से उत्पाद नीचे उतार देते हैं तो ग्राहकों को लगता है कि ये पुराना माल है. इसलिए हम गाड़ी पर अधिकांश माल बेचते हैं. ट्रक का डाला खोल दिया जाता है. वहां कांटा रख देते हैं. ग्राहक को सेम्पल के तैर पर एक-दो कट्टे बोरे को फाड़कर उस उत्पाद को दिखा देते हैं. एक तरफ खरीददार रहते हैं तो दूसरी तरफ किसान रहता है. कई बार तो तीन-तीन दिन तक माल नहीं बिक पाता क्योंकि ग्राहक और किसान में सहमति नहीं बन पाती. उसके बाद यदि किसान को पसंद न आये तो वो दूसरे आढ़ती या मंडी में जाने के लिए स्वतंत्र हैं."

खांडसा मंडी के अन्य आढ़ती राजेश कुछ दूसरे विषयों से हमें अवगत करवाते हैं. वे कहते हैं कि हम अपना 90 फ़ीसदी काम उधारी पर करते हैं. किसान तो अपनी रकम लेकर चला जाता है जबकि हमारी रकम 7 से 10 दिन के चक्कर मे घूमती हैं. कुल उधारी का 25 से 30 फ़ीसदी हिस्सा डूब जाता है. ग्राहक भाग जाते हैं. नकद केवल 10 फ़ीसदी ही बिकता है. यदि उधार नहीं दें तो काम कैसे चलायेंगे? ऐसा नहीं है कि ये केवल गुरुग्राम में है. आप दिल्ली, आजादपुर मंडी, ग़ाज़ियाबाद मंडी या फरीदाबाद सभी जगहों पर ऐसे ही होता है. राजेश आगे कहते हैं कि "किसान तो अपना सामान बेचकर चला गया. मान लीजिए उसके पास 200 कट्टे प्याज थी. सभी कट्टे एक गुणवत्ता के नहीं होते उसमें तीन-चार केटेगरी बनाई जाती हैं. जिसे हम लाट कहते हैं. अब लाट में भी जो कट्टा ग्राहक को दिखाया उसमे प्याज अच्छी थी किन्तु उस लाट के 20 कट्टे हल्के निकल गए तो अब क्या होगा? ग्राहक हमें उन 20 कट्टों की आधी या एक चौथाई रकम दी. किसान तो अपना चला गया. वो हमें ही भुगतना पड़ता है."

राजेश आगे कहते हैं कि "जब नई फसल मंडी में आती है तो हमारा काम दोगुना हो जाता है. उन्हें डबल लेबर रखनी पड़ती है. यदि नया माल दो-तीन दिन नहीं बिक सका तो उसके बोरों को खोलकर उसे हवा लगाना. उसे वापस बोरों में भरना. इस बीच वो भीग गई या किसी अन्य कारण से ख़राब हो गई तो इसका भुगतभोगी आढ़ती होता है न कि किसान. क्या नये कानून में इसको लेकर कोई बात हैं?

सरकार का कहना है कि इन तीन कानूनों के बनने से किसानों की सारी समस्यओं का समाधान हो जायेगा. ये दावा भी ठीक वैसे ही है जैसे फसल बीमा योजना और मिट्टी के स्वास्थ्य कार्ड जारी करने को लेकर सरकार ने ढोल पीटा था. उसका नतीजा क्या रहा ये हमारे सामने है. हकीकत ये है कि सरकार को अभी तक ये भी नहीं पता कि आढ़ती और किसान का रिश्ता क्या है? बिचौलिये कौन हैं? क्या आढ़ती किसान की समस्या के लिए उत्तरदायी है?

आढ़ती यूनियन के पूर्व अध्यक्ष रह चुके कृष्ण पाल गुर्जर कहते हैं कि "किसान अपनी फसल की बुआई से लेकर अपने बच्चों की शादी यहां तक कि त्योहारों पर आढ़ती ही उसका बैंक होता है. अभी अलवर की प्याज चलेगी. नवरात्रों से पंजाब का आलू शुरू हो जाता है. कुछ दिन पहले नीमच- मंदसौर से प्याज आई थी. अलीगढ़- इटावा से आलू प्याज आता है. लहसुन भी आता है. इनमे से अधिकांश किसान अपनी फसल की बुआई पर ही आढ़ती से 50 हज़ार से लेकर एक लाख तक पैसा उधारी पर ले जाते हैं.

वे इस सीजन में अपनी उधारी पूरा करेंगे. यदि इस बार मान लीजिए भाव नहीं आया तो ये उधारी अगले सीजन तक चलेगी. ये किसी एक आढ़ती के साथ नहीं बल्कि सभी आढ़तियों के साथ है. जो जितना बड़ा आढ़ती है उसका किसानों से उतना ही गहरा रिश्ता और उतनी बड़ी उधारी. क्या सरकार के कानून में इस बात का जिक्र है? किसानों को कौन उधार देगा और किन शर्तों पर उधार देगा ?

imageby :

राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रेदेश और मध्य प्रेदेश में किसान आत्महत्या नहीं करते या बहुत कम करते हैं इसके पीछे बड़ा कारण इन राज्यों के किसानों की आढ़तियों तक पहुंच है. हमें इस बात का ध्यान रखना है कि किसान को ये मदद अपनी जमीन को गिरवी रखकर नहीं मिलती जैसे बैंक करते हैं और न ही ये रकम गांवों के सूदखोरों के जैसे ऊंचे ब्याज अदायगी के सहमति पत्र पर मिलती हैं. यहां तो कोई ब्याज ही नहीं हैं.

समस्या यहीं तक सीमित नहीं है, एक अन्य बिंदु पर दृष्टि डालते हुए रमेश गुप्ता उम्र 64 वर्ष, हमें बताते हैं कि वे पिछले सात साल से मानेसर (गुरुग्राम) स्थित एक मल्टी नेशनल कम्पनी में सब्जी सप्लाई करते हैं. कम्पनी से सब्जी का बिल सामान्यत 45 से 50 दिन में क्लियर होता है क्योंकि कम्पनी का सारा काम उधारी पर चलता है. अब तक तो आढ़ती ये उधारी दे देते हैं क्योंकि उनको भी लगता है कि लगा बंधा एक ग्राहक मिल गया किन्तु जब आढ़ती नहीं रहेंगे तो फिर हमें ये उधारी कौन देगा? रमेश गुप्ता हमें आगे बताते हैं कि "मैं कोई अकेला नहीं हूं जो ये सप्लाई करता हूं और न ही ये कम्पनी कोई अकेली है जो इतने दिन बाद बिल पास करती है."

गुरुग्राम में ऐसी एक हज़ार से ज्यादा कम्पनियां हैं, जो ऐसे ही काम करती हैं. ये कैसे काम करेंगी? इनको दो महीने की उधारी कौन देगा? दिल्ली, गाज़ियाबाद, जयपुर, बैंगलोर से लेकर हिंदुस्तान की मंडियों में ऐसे ही काम होता है. हम जैसे हज़ारों लोग जो कम्पनी में सप्लाई करते हैं वो कहां जायेंगे? सरकार को चाहिए कि वे आढ़तियों को बली का बकरा बनाना बंद करें और सीधे-सीधे वे नियम बनाये जो किसानों को फायदा पहुचाएं. इन नियमों से किसान का मुनाफा डबल तो दूर रहा जिस स्थिति में वो आज हैं वहां भी नहीं ठहर सकेगा.
-----
लेखक स्कॉलर और एक्टिविस्ट है.

Also see
article imageसरकार के “तथाकथित किसान हितैषी कानूनों” से खुद “किसान” नाराज
article imageगरीब किसान की फसल बर्बाद, जिम्मेदार अफसर को मिल रहा राजनीतिक संरक्षण

You may also like