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मनरेगा के साथ ही मजदूरी और मजदूरों की उम्मीद भी खत्म हो रही: नरेगा संघर्ष मोर्चा
आगामी 1 जुलाई से केंद्र सरकार ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण (वीबी-जीराम जी) को पूरे देशभर में लागू करने वाली है. हालांकि, सरकार की इस नई योजना को लेकर कई तरह की चिंता जताई जा रही हैं.
वीबी-जीरामजी ड्राफ्ट रूल्स के मुताबिक, मजदूरों को 125 दिन काम की गारंटी दी जाएगी. जिसके लिए केंद्र सरकार 60 प्रतिशत और राज्य सरकार 40 प्रतिशत बजट आवंटित करेगी. जो उत्तर पूर्वी और हिमालयी राज्यों में 90 प्रतिशत और 10 प्रतिशत होगा. मालूम हो कि इस नई योजना की शुरुआत आंध्र प्रदेश से की जाएगी. इसी के साथ खेती के समय में 60 दिनों तक काम बंद रहेगा.
दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में सामाजिक कार्यकर्ता और नरेगा संघर्ष मोर्चा के सदस्य निखिल डे, ऑल इंडिया एग्रीकल्चर वर्कर्स यूनियन (एआईएडब्ल्यूयू) के जनरल सेक्रेट्री बी. वेंकट और सदस्य गुलज़ार सिंह गोरिया, राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन (आरएएमयू) की सदस्य मधुलिका यालमा समेत उत्तर प्रदेश और राजस्थान के नरेगा में काम करने वाले मजदूरों ने वीबी-जीराम जी के इन ड्राफ्ट रूल्स पर आपत्ति जताई.
इन लोगों ने कहा कि इस नई योजना का ढांचा सही नहीं है. इसमें पारदर्शिता की कमी है. मजदूरों को मजदूरी कितनी मिलेगी यह भी स्पष्ट नहीं है. भले ही अभी तक यह योजना लागू नहीं हुई है. इनका लोगों का मानना है कि एक-दो राज्य को छोड़कर बाकी राज्यों में रोजगार की संख्या में गिरावट आएगी.
इन्होंने मांग की कि सरकार को इस योजना में 125 दिन की बजाय कम से कम 200 दिन काम देने की गारंटी देनी चाहिए थी. मजदूरी को भी बढ़ाकर 700 रुपये तक कर देना चाहिए.
सामाजिक कार्यकर्ता और नरेगा संघर्ष मोर्चा के सदस्य निखिल डे बताते हैं, “सरकार वीबी-जीरामजी को लेकर जो तकनीक का इस्तेमाल करने वाली है वो भ्रष्टाचार नहीं मजदूरों को हटाने का काम करेगी.”
खेती के सीज़न के दौरान काम बंद रहने को लेकर राजस्थान के ब्यावर जिले की कमला कहती हैं, “पहले ही नरेगा में मुश्किल से काम मिलता था. ऐसे में अगर 60 दिनों तक काम नहीं मिलेगा तो वह अपने बच्चों को कैसे पालेंगी. अब तो खाना बनाने के लिए गैस सिलेंडर भी महंगा हो गया है. ऐसे में वो कैसे जी पाएंगे. इसलिए हमें वीबी-जीरामजी नहीं बल्कि नरेगा चाहिए.”
राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन में बतौर मेट काम करने वाली राजस्थान के ब्यावर जिले की ही पिंकी माली कहती हैं, “हमारा काम नहीं बंद होना चाहिए क्योंकि हमारे पास खेती नहीं हैं. हम मजदूर लोग हैं, कहां जाएंगे. नरेगा से ही हमारा गुजारा होता है. इसलिए हमें पहले वाली मनरेगा ही चाहिए.”
वहीं उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में समता किसान मजदूर संगठन से जुड़े और नरेगा में मजदूरी करने वाले जगन्नाथ बताते हैं, “मनरेगा में ज्यादातर काम करने वाले लोगों के पास जमीन नहीं है. ऐसे में अगर 60 दिन काम बंद रहेगा तो वे भुखमरी की कगार पर पहुंच जाएंगे.”
सीतापुर जिले के ही नरेगा में मजदूरी करने वाले अरविंद कुमार का कहते हैं, “मनरेगा से ही हमारी रोजी-रोटी चल रही थी. लेकिन मोदी सरकार वीबी-जीरामजी लागू करके वो भी खत्म कर देंगे. यह नई योजना सुचारू रूप से चल नहीं पाएगा.”
वहां मौजूद सदस्यों और मजदूरों ने ड्राफ्ट रूल में शामिल ई-केवाईसी, जियो-टैगिंग और ऑनलाइन हाजिरी लगाने की प्रणाली को हटाने पर जोर दिया. उनका तर्क कि गावों में लोगों को जानकारी के अभाव में ई-केवाईसी के लिए दूर जाना पड़ता है. और इसके लिए उनसे ज्यादा पैसा वसूला जाता है. वे पहले से ही नरेगा मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (एनएमएमएस) एप को लेकर दिक्कतों का सामना कर रहे हैं. जिसमें हाजिरी के लिए फेस रिकग्निशन के दौरान चेहरे का मिलान होना जरूरी है, पर कई बार चेहरे का मिलान न हो पाने की वजह से हाजिरी नहीं लगती और फिर पेमेंट मिल पाती है. इसी वजह से ज्यादातर मजदूरों की हाजिरी न लगने के कारण उन्हें निराश होकर वापस घर लौटना पड़ता है. इस एप को अपडेट करने बाद मजदूरों को कई और दिक्कतों का भी सामना करना पड़ता है.
सदस्यों ने यह भी कहा है कि अगर सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी तो वह दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का आयोजन भी करेंगे.
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