Report
कैंसर से जूझता मूसा गांव, सिद्धू ने बीमारी खत्म करने का किया था वादा
गायक सिद्धू मूसेवाला के बाद से पूरी दुनिया में ‘मूसा गांव’ और ‘मानसा जिले’ को लोग जानने लगे हैं. लेकिन इससे पहले मालवा क्षेत्र के इस जिले को सबसे ज्यादा कैंसर के मामलों के लिए जाना जाता था.
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक लाख जनसंख्या पर मानसा जिले में 134.8 कैंसर मरीज है.
मानसा जिले और मूसा गांव में कैंसर की समस्या को लेकर गायक सिद्धू मूसेवाला हर साल अपने गांव में कैंसर बीमारी की जांच के लिए निशुल्क कैंप लगवाते थे, जहां दूर-दूर से लोग जांच के लिए आते हैं. यह कैंप सिद्धू की दादी की याद में लगाया जाता है.
सिद्धू कैंप लगवाने के साथ ही कैंसर के मरीजों के लिए हमेशा आगे रहते थे. उनके इसी लगाव के कारण उनकी हत्या के बाद मूसा गांव में लोग शोक जताने आ रहे हैं. हालांकि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सिद्धू मूसेवाला के नाम पर कैंसर अस्पताल खोलने का ऐलान किया.
जी पंजाबी चैनल के साथ एक इंटरव्यू में सिद्धू ने कहा था कि उन्हें अगर कोई सुपर पावर मिले तो “वह सभी कैंसर मरीजों को सही” कर दें.
लगभग 7000 की जनसंख्या वाले मूसा गांव के 26 वर्षीय सुखचैन सिंह कैंसर से हो रही मौतों को लेकर कहते हैं, “बहुत से लोगों की मौत सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि उनका कैंसर का इलाज नहीं हो पाता.” मानसा जिले में कैंसर के मरीजों की संख्या ज्यादा होने के बावजूद यहां कैंसर का कोई अस्पताल नहीं है.
पंजाब के मालवा क्षेत्र को कैंसर का बेल्ट भी कहा जाता है. क्षेत्र में कैंसर के मरीजों की स्थिति का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि बठिंडा जिले से बीकानेर जाने वाली ट्रेन ‘कैंसर ट्रेन’ के नाम से मशहूर हो गई. बाद में 2016 में, जिले में एडवांस कैंसर इंस्टीट्यूट की स्थापना पंजाब सरकार ने की लेकिन सारी सुविधाएं नहीं होने के कारण अभी भी लोगों को इलाज के लिए फरीदकोट, चंडीगढ़ या दिल्ली जाना पड़ता है.
वहीं लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री भारती पवार ने बताया कि 2020 में देश में सबसे ज्यादा कैंसर के केस पंजाब में पाए गए.
राज्यमंत्री ने बताया कि 2018 में जहां 36,888 कैंसर के मरीज थे, वहीं साल 2020 में यह बढ़कर 38,636 हो गए. यह आंकड़े आईसीएमआर के कैंसर रजिस्ट्री डेटा 2020 के हैं. पंजाब के बाद कैंसर के मामलों में हरियाणा दूसरे नंबर पर है जहां 2020 में 29,219 मरीज मिले. रिपोर्ट में बताया गया है कि 2025 तक देश में कैंसर के 15.6 लाख मरीज हो जाएंगे.
मूसा गांव में कैंसर की स्थिति
सिद्धू मूसेवाला का असली नाम शुभदीप सिंह सिद्धू है. 29 मई को मानसा जिले के जवाहरके गांव में अपनी मौसी के घर जा रहे सिद्धू की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक सिद्धू को 19 गोलियां लगी थीं.
गांव से लगाव के कारण ही सिद्धू ने अपने नाम में अपने गांव का नाम भी जोड़ लिया. सिद्धू के प्रसिद्ध होने के बाद पिछड़ा जिला होने के बावजूद लोग मानसा को जानने लगे थे. मूसा गांव के नवदीप सिंह कहते हैं, “मानसा बहुत पिछड़ा हुआ इलाका है, लेकिन अब लोग जानने लगे हैं. इससे पहले किसी को हमारे गांव के बारे में पता भी नहीं था.”
एक अन्य ग्रामीण कहते हैं, “कोविड के समय दूसरे शहर जाते वक्त जब पुलिस रोकती थी तो ‘मूसेवाला के गांव से है’ बोलने पर हमें जाने दिया जाता था.”
मानसा और इसके आसपास के जिलों में कैंसर बीमारी को लेकर पीजीआई चंड़ीगढ़ के अतिरिक्त प्रोफेसर जेएस ठाकुर कहते हैं कि पानी में आर्सेनिक और यूरेनियम की अधिक मात्रा, और हरित क्रांति के बाद कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग के कारण खाद्यान्न में रासायनिक विषैलापन बढ़ गया है. इसके अलावा शराब के सेवन और धूम्रपान से भी क्षेत्र में कैंसर के मरीज बढ़े हैं. मूसा गांव में कैंसर के अलावा टीबी जैसी बीमारियां भी हैं.
गांव में कैंसर से कितने लोगों की मौत हुई है इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है. लेकिन सुखचैन सिंह अब गांव में कैंसर मरीजों का आंकड़ा इकट्ठा कर रहे हैं. वह बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में कैंसर से 30 से ज्यादा लोगों की मौत इस गांव में हुई हैं.
ऐसी ही एक मरीज थीं मोहनजीत कौर. 50 साल की मोहनजीत को पेट का कैंसर था. खाना नहीं पचने और पेट में दर्द होने के कारण कौर ने पहली बार मानसा में अपनी जांच कराई तो पता चला कि उन्हें कैंसर है. जिसके बाद वह मूसा जिले से 120 किलोमीटर दूर फरीदकोट के गुरु गोविंद सिंह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में अपने इलाज के लिए गईं.
मोहनजीत के बेटे 40 वर्षीय बलविंदर सिंह बताते हैं, “मां ने पेट दर्द होने के बाद चाय भी पीना बंद कर दिया था, तो हम उन्हें मानसा लेकर गए जहां डॉक्टर ने जांच करने के बाद बताया कि उन्हें कैंसर है, और फरीदकोट रेफर कर दिया.”
बलविंदर एक अनुसूचित जाति से हैं. वह मजहबी सिख हैं जिनके पास खुद की कोई जमीन नहीं है. दूसरों के खेत में मजदूरी कर वह अपना परिवार चलाते है. उन्हें मजदूरी के तौर पर 300 रुपए मिलते हैं. वह कहते हैं, ”फरीदकोट में सरकारी खर्च पर इलाज हुआ लेकिन दवाइयां, आने-जाने और जांच के लिए 20 हजार और 40 हजार के दो अलग-अलग कर्ज लिए हैं.” 20 हजार का कर्ज तो बलविंदर ने चुका दिया लेकिन 40 हजार का कर्ज वह धीरे-धीरे चुका रहे हैं. इसका अलावा हुए खर्च के लिए उन्होंने अपने रिश्तेदारों से पैसे लिए थे. अपनी मां के बीमार होने से पहले बलविंदर स्कूल वैन चलाते थे लेकिन इलाज के लिए लगातार फरीदकोट जाने के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी.
बलविंदर कहते हैं, “जब वह फरीदकोट में इलाज करा रहे थे तो वहां ज्यादातर लोग मानसा और इसके आस-पास के जिलों के लोग थे.” मोहनजीत को जब तक कैंसर का पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी. फरीदकोट के सरकारी अस्पताल में उनका ऑपरेशन हुआ लेकिन उसके तीन महीनों बाद 2016 में उनकी मौत हो गई.
बलविंदर कहते हैं, “अगर मानसा में अस्पताल होता तो शायद उनकी मां बच जातीं क्योंकि तब उन्हें इलाज के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता और बहुत सारा समय फरीदकोट आने-जाने में बच जाता.”
गांव में कैंसर मरीजों की संख्या को लेकर वह कहते हैं, “हमारे गांव के आसपास थर्मल पावर प्लांट्स हैं, जिनसे राख निकलती है. सफेद कपड़े काले हो जाते हैं, कॉटन की फसल काली पड़ गई इस राख के कारण.”
बलविंदर बताते हैं, “बहुत बार शिकायत करने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई. फैक्ट्रियों से निकलने वाला गंदा पानी जमीन में जा रहा है, इसलिए पानी की गुणवत्ता भी बहुत खराब है.”
बलविंदर के फोन के कवर पर सिद्धू मूसेवाला की फोटो है. वह कहते हैं, ”वह गांव में कैंसर के मामलों को लेकर परेशान था. उसने हम सभी से वादा किया था कि वह इसे दूर कर देगा और अब वो ही चला गया है”.
इसी गांव में आधे टूटे हुए मकान में 38 साल के सेवक सिंह अपने दो छोटे बच्चों और मां के साथ रहते हैं. जून 2016 में उनके 55 साल के पिता बीरा सिंह की लिवर कैंसर से मौत हो गई. मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालने वाले सेवक सिंह, अपने पिता को बचाने के लिए मानसा से लेकर फरीदकोट तक गए लेकिन उन्हें बचा नहीं पाए.
वह कहते हैं, “जनवरी 2016 में मानसा के एक प्राइवेट अस्पातल में जांच के दौरान पता चला कि मेरे पिता को कैंसर है. इसके बाद हम उन्हें फरीदकोट लेकर गए, जहां उनका ऑपरेशन हुआ.”
मूसा गांव से फरीदकोट की दूरी ज्यादा होने के कारण और अपने पिता के स्वास्थ्य को देखते हुए, सेवक सिंह तीन महीने फरीदकोट में ही रुक गए. वह वहां एक गुरुद्वारे में रहते थे. परिवार में इकलौते कमाने वाले सेवक सिंह जब फरीदकोट गए तो घर चलाने और इलाज के लिए उन्होंने एक लाख 70 हजार जमींदार से कर्ज लिया. वह मजहबी सिख हैं.
मई 2016 में बीरा सिंह का फरीदकोट में ऑपरेशन हुआ जिसके बाद उन्हें घर लाया गया. सिंह के अनुसार, ऑपरेशन के बाद दवा खरीदने और जांच करवाने के लिए फरीदकोट जाने पर, एक बार में उनके करीब 12,000 रुपए खर्च हो जाते थे. उन्होंने कहा, “हमें कार लेनी पड़ती थी क्योंकि हम उन्हें बस या ट्रेन से ले जाने का जोखिम नहीं उठा सकते थे”.
ऑपरेशन के तीन महीनों बाद जून 2016 में बीरा सिंह की मौत हो गई. पिता के जाने का दुख झेल रहे सेवक सिंह की पत्नी की 2017 में किडनी फेल होने के कारण मौत हो गई. वहीं साल 2020 में बारिश के कारण उनका घर बर्बाद हो गया. जिसके बाद से वह धीरे-धीरे कुछ पैसे इकट्ठा करके पक्का मकान बना रहे हैं.
सेवक सिंह के दोनों बच्चे अभी स्कूल में पढ़ रहे हैं. सेवक अपने परिवार का पेट पालने के लिए जमींदार के खेत में मजदूरी करते हैं और उनकी मजदूरी में से ही जमींदार अपने कर्ज के पैसे काट लेता है. वह कहते हैं, “मुझे मिलने वाली मजदूरी में से हर महीने एक निश्चित राशि वह (जमींदार) काट लेते हैं. जब तक मैं पूरा कर्ज चुका नहीं देता मुझे उनके खेत में ही काम करना पड़ेगा.”
सिंह ने एक बार सिद्धू मूसेवाला द्वारा लगाए जाने वाले कैंसर कैंप में जांच कराई और उन्हें उस समय फरीदकोट नहीं जाना पड़ा. वह कहते हैं, “एक महीना अस्पताल के चक्कर काटने में लग गए. अगर पास में अस्पताल होता तो समय बचता और सही से इलाज करवा पाते”.
सिंह के बगल में ही 56 वर्षीय सुखदेर कौर बैठी हैं. वह मूसा के पड़ोसी गांव दलेल सिंघवाला की रहने वाली हैं. दो दिन पहले उनके भाई की भी कैंसर से मौत हो गई थी.
सुखचैन सिंह बताते हैं कि इस बीमारी से प्रभावित गांव के अन्य परिवारों के तुलना में अनुसूचित जाति के परिवारों पर ज्यादा आर्थिक असर पड़ता है. वह कहते हैं, “इन लोगों का ज्यादातर जीवन जमींदार के कर्ज को चुकाने में बीत जाता है और इसलिए वे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते.”
सेवक सिंह के घर से कूछ दूरी पर 36 वर्षीय गुरप्यार सिंह का घर है. उनके पिता लाभ सिंह की मौत 2019 में कैंसर से हो गई थी. वे खेतों में मजदूरी का काम किया करते थे. नवंबर 2018 में पेट में दर्द होने के बाद मानसा के एक प्राइवेट अस्पताल में दिखाने पर कैंसर का पता चला.
गुरप्यार सिंह भी अनुसूचित जाति के मजहबी सिख हैं. वह बेलदारी का काम करते हैं और कुछ समय खेतों में भी मजदूरी करते हैं. वह कहते हैं, ”प्राइवेट अस्पताल में जांच के बाद कैंसर का पता चला और उन्होंने बठिंडा के कैंसर अस्पताल में रेफर कर दिया. जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.”
गुरप्यार ने इलाज के लिए अपने रिश्तेदारों से डेढ़ लाख रुपए का कर्ज लिया है. उन्हें 300 रूपए मजदूरी मिलती है जिससे पांच लोगों के परिवार का खर्च चलता है. सिंह की मां की भी 20 साल पहले ब्रेस्ट कैंसर से मौत हो गई थी.
गुरप्यार के घर से कुछ दूरी पर 55 वर्षीय गुरजीत कौर का घर है. वह घर के आंगन में चारपाई पर लेटी थीं. वह बेहद कमजोर हो गई हैं इसलिए हमेशा लेटी रहती हैं. उन्हें अप्रैल 2021 में कैंसर का पता चला. वह कहती हैं, “खाने वाली नली में कैंसर होने के कारण केवल जूस, दलिया और दाल का पानी पीती हूं. खाना नहीं खा पाती.”
गुरजीत का परिवार भी अनूसूचित जाति से है. वह रामदासिया सिख हैं. कौर के परिवार में उनका बेटा कमाता है जो गैरेज पर काम करता है. कौर का ऑपरेशन लुधियाना के एक प्राइवेट अस्पातल में हुआ क्योंकि परिवार के लोग सरकारी अस्पताल में जोखिम नहीं लेना चाहते थे. दवाओं और अन्य खर्चों के लिए गुरजीत और उनकी बेटी को गहने बेचने पड़े. परिवार के पास पंजाब सरकार द्वारा चलाए जा रहे भगत पूरन सिंह बीमा योजना का कार्ड भी था लेकिन प्राइवेट अस्पताल में वह कार्ड नहीं चला.
हर महीने दो बार कौर और उनका बेटा जांच और दवाओं के लिए फरीदकोट जाते हैं. कौर अब तक एक बार कीमोथेरेपी करवा चुकी हैं. वे कहती हैं, “फरीदकोट एक बार जाने में हमें कम से कम 20,000 रुपए का खर्च आता है. अकेला सिद्धू ही था जिसने कैंसर के बारे में बोला और हमारे लिए कुछ सोचा.”
गांव में जट्ट सिख बलजीत सिंह की पत्नी भी कैंसर की मरीज हैं. 36 वर्षीय सर्वजीत कौर छह महीने से अपना इलाज करवा रही हैं. उनकी कीमोथेरेपी बठिंडा के एडवांस कैंसर इंस्टीट्यूट में चल रही है. उनके पति को उम्मीद है कि वह जल्द ही पूरी तरह से ठीक हो जाएंगी.
सर्वजीत कहती हैं, "जब मुझे पता चला कि कैंसर है तो मैं बहुत डर गई थी. क्योंकि यह बहुत खतरनाक बीमारी है और उससे हमारे गांव के ज्यादातर लोग उबर नहीं पाए हैं और उनके परिवार के लिए यह आर्थिक बोझ बन गया है.”
बलजीत सिंह कहते हैं, “गांव में कैंसर से लोगों में डर है. कैंसर कभी चुनावी मुद्दा नहीं बना. केवल सिद्धू ही थे जिन्होंने हमारे गांव में कैंसर का मुद्दा उठाया. बाकी नेता तो चुनाव से पहले गांव तक नहीं आते हैं.”
मूसा गांव में न्यूज़लॉन्ड्री ने जितने भी परिवारों से बात की, सभी का पंजाब सरकार द्वारा चलाई जा रही भगत पूरन सिंह बीमा योजना के तहत कार्ड बना हुआ था. सिर्फ सर्वजीत के पास आयुष्मान भारत कार्ड है. इस योजना की शुरूआत, तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने 2015 में की थी. इसके तहत नीले कार्ड धारकों को मुफ्त में इलाज दिया जाता है.
2019 में, राज्य सरकार ने भगत पूरन सिंह बीमा योजना को केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत ले लिया. मूसा गांव के ग्रामीण, कैंसर की समस्या को लेकर कहते हैं, “किसी भी अस्पताल में जाते हैं तो सबसे ज्यादा मानसा जिले के मरीज मिलते हैं.”
बलजीत कहते हैं, ”अगर कैंसर का अस्पताल मानसा जिले में होता तो यहां से लोगों को बठिंडा या दूसरे जिले में जाने की जरूरत नहीं पड़ती.”
बलजीत आगे कहते हैं, “हमारे जिले और गांव में मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं इसलिए जब भी कोई विधायक, सांसद या मंत्री आते हैं तो हम उनसे सड़क, बिजली और पानी की मांग करते हैं. कैंसर की समस्या को अब उठाने लगे हैं.”
सुखचैन कहते हैं, ”मूसा जिले में कई थर्मल पावर प्लांट्स लगे हैं साथ ही कई फैक्ट्रियां भी हैं. इनसे निकलने वाले प्रदूषण का भी लोगों की सेहत पर गलत असर पड़ रहा है लेकिन सरकार इस पर ध्यान ही नहीं देती.”
सिद्धू मूसेवाला ने कैंसर के मरीजों के परिवारों की भी मदद की है. उनकी मां चरणकौर मूसा गांव की सरपंच भी हैं. उनके चुनाव जीतने के बाद गांव में बंद पड़े दवाखाने को शुरू किया गया. इसके साथ ही वह गांव के विकास के लिए सड़के और नालियों का निर्माण भी करवा रही हैं.
मौजूदा मुख्यमंत्री और तत्कालीन संगरूर सांसद भगवंत मान ने कहा था कि “बतौर सांसद उन्होंने कई सौ कैंसर मरीजों की इलाज में मदद की है. इस बीमारी को जड़ से खत्म करना होगा. जो कांग्रेस और अकाली सरकार नहीं कर पाई.” अब देखना होगा की बतौर सीएम, भगवंत मान कैंसर की इस समस्या को मालवा क्षेत्र से कैसे दूर कर पाएंगे?
Also Read
-
At least 75 dead, 7 lakh displaced: The making of Assam’s annual ‘unprecedented’ flood
-
July 20 crackdown: One DCP approved pellets, another authorised firearms
-
Delhi Police owns the stone-laden truck after NL report. But their lawyer linked it to protesters in HC
-
As cops target ‘offensive’ posts, Jantar Mantar reportage and reels are disappearing
-
As DU reopens, students decode ‘thinly veiled threats’ and Jantar Mantar protests