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एनएल चर्चा 214: राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश और जम्मू-कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन
एनएल चर्चा के इस अंक में राजद्रोह क़ानून के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मुख्य रूप से चर्चा हुई. इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों के नए परिसीमन की घोषणा पर चर्चा हुई.
चर्चा में इस सप्ताह बतौर मेहमान स्वतंत्र पत्रकार और शोधार्थी कुणाल पुरोहित के साथ कश्मीर टाइम्स की मुख्य संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन शामिल हुईं. न्यूज़लॉन्ड्री के सह संपादक शार्दुल कात्यायन ने भी चर्चा में भाग लिया व चर्चा का संचालन एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस ने किया.
राजद्रोह के विषय पर चर्चा की शुरुआत करते हुए मेघनाद कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि आईपीसी की राजद्रोह की धारा 124 ए के अंतर्गत कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं किया जाए. केंद्र यह सूचना राज्यों को भी दे और जो भी अभी इस धारा के अंतर्गत जेल में हैं उनको ज़मानत की सुनवाई देने में प्राथमिकता दिखाई जाए. इसके पीछे एक वजह ये भी है कि केंद्र ने अदालत में हलफनामा दाखिल कर कहा था कि सरकार आजादी के अमृत महोत्सव के चलते राजद्रोह के कानून को नया रूप देना चाहती है.
इसी विषय अपना मत रखते हुए कुणाल कहते हैं कि इसके काफी अलग-अलग पहलू हैं और उन सबको एक साथ देखना बहुत ज़रूरी है. इससे एक बहुत अच्छा संदेश गया है कि देश की शीर्ष अदालत अपने विचारों को इस तरह से रख रही है और अदालत का कहना है कि राजद्रोह का इस्तेमाल अभी जिस तरह से हो रहा है, वह उसके खिलाफ है. दूसरी बात यह है कि सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और शिक्षाविद आदि तो इसके बारे में बात करते ही हैं लेकिन अब यह मुख्यधारा की चर्चा का विषय बन गया है.
कुणाल आगे कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट के अभी के आदेश का मैं स्वागत करता हूं लेकिन उसमें कुछ चीजों को लेकर मैं आशा कर रहा था कि वे कुछ अलग हों.
इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए शार्दूल कहते हैं कि यूएपीए और राजद्रोह, यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं बल्कि यूएपीए इससे कहीं ज्यादा खतरनाक है. अगर आप इमरजेंसी के समय देखें भारत में तो सबसे लंबी जेल दो सवा दो साल की जेल राजद्रोह के अंदर हुई थी और यूएपीए के अंदर लोग तीन-तीन, चार-चार साल से पड़े हैं. अंग्रेज़ों के जमाने में बना यह क़ानून, सबसे पहले बंगाल के पत्रकार जोगेंद्र चंद्र बोस पर लागू हुआ था. वहां से लेकर दिशा रवि तक इस क़ानून की बड़ी लंबी यात्रा है. समय-समय पर सभी सत्ताधारी दलों और सरकार ने इस कानून का दुरुपयोग किया है.
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर अनुराधा कहती हैं, ‘‘यह एक औपनिवेशिक साम्राज्य की विरासत थी और जिन्होंने हम पर थोपी उन्होंने अपने देश में यह खत्म कर दी, लेकिन यहां अभी तक जारी है. एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब तक हिंसा न हो, केवल नारे के आधार पर राजद्रोह का क़ानून नहीं लागू किया जा सकता, लेकिन इसके बावजूद बार-बार यही चीज़ दोहराई गई है. बाद में बरी होने में सालों लग जाते हैं और जो प्रक्रिया है वह खुद सजा बन जाती है.
इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों के नए परिसीमन को लेकर भी चर्चा में विस्तार से बातचीत हुई. पूरी बातचीत सुनने के लिए हमारा यह पॉडकास्ट सुनें और न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करना न भूलें.
टाइमकोड
00.09 - 01:36 - इंट्रो
01:37 - 05:46 - हेडलाइंस
05:47 - 09:10 - जरूरी सूचना
09:12 - 42:24 - राजद्रोह पर रोक
42:27 - 1:07:19 - जम्मू और कश्मीर में परिसीमन
01:09:00 - 01:23:11 - ताजमहल पर याचिका और ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे
01:23:18 - सलाह और सुझाव
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पत्रकारों की राय, क्या देखा, पढ़ा और सुना जाए
कुणाल :
ऑन्द्रे ट्रश्के की किताब- औरंगज़ेब द मैन एंड द मिथ
ज्ञानेश प्रकाश की किताब - इमरजेंसी क्रोनिकल्स
अनुराधा :
आकर पटेल की किताब - प्राइस ऑफ़ मोदी इयर्स
सुमंत्रा बोस की किताब - कश्मीर एट क्रॉसरोड्स
शुभ्रा गुप्ता का लेख - इंडिगो बॉय, माय चाइल्ड- ट्रैवेलिंग विद आटिज्म
फिल्म - द ट्रायल ऑफ़ शिकागो सेवन
मेघनाद एस :
गौहर गिलानी की किताब- रेज एंड रीज़न
संसद वाच का एपिसोड - समय के साथ धर्मनिरपेक्षता का अर्थ कैसे बदला?
यूट्यूब चैनल- जिम ब्राउनिंग और किटबोगा
शार्दूल :
विधीशा कुण्टमल्ला की रिपोर्ट - तेलुगू समाचार चैनलों ने कैसे की नागराजू की हत्या पर रिपोर्टिंग?
टीवी सीरीज - वाय डिडन्ट दे आस्क एवंस
पंडित शिव कुमार शर्मा का संतूर वादन - राग शिवरंजनी
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प्रोड्यूसर- रौनक भट्ट
एडिटिंग - समरेंद्र के दास
ट्रांसक्राइब - तस्नीम फातिमा
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