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एनएल चर्चा 197: डाटा सुरक्षा बिल और हरिद्वार में कट्टरपंथियों का नरसंहार का आह्वान
एनएल चर्चा के इस अंक में संसद में पास हुआ चुनाव सुधार बिल, आधार को मतदाता पत्र से जोड़ने का बिल, हरिद्वार की धर्म संसद में अल्पसंख्यकों के संहार की अपील, कर्नाटक विधानसभा में पास हुआ धर्मांतरण विरोधी विधेयक, हरियाणा में युवक की लिंचिंग, गोवा कांग्रेस में मची उथल-पुथल, पंजाब में बेअदबी और लिंचिंग, ओमीक्रॉन के बढ़ते प्रभाव और कर्नाटक में चर्च पर हुए हमले मुख्य विषय रहे.
चर्चा में इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस, सह संपादक शार्दूल कात्यायन और स्तंभकार आनंद वर्धन शामिल हुए. चर्चा का संचालन कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.
अतुल ने चर्चा की शुरुआत डेटा प्रोटेक्शन बिल से की. वह मेघनाद से सवाल करते हैं, “जो बिल अभी पास हुआ है, वह 2018 में प्रस्तावित बिल से किस तरह अलग है. उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी भी की थी. कोर्ट ने कहा था राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क नागरिकों की निजता के अधिकार से टकरा रहा है. राज्य को लोगों की निजता के मसले में बहुत सोच समझ कर कदम रखना चाहिए. अभी के बिल में किस तरह के प्रावधान है और इससे किस तरह के नुकसान हो सकते हैं?”
जवाब में हुए मेघनाद कहते हैं, "इस बिल का एक छोटा सा इतिहास है. जिसकी शुरुआत साल 2017 में हुई. तब पुट्टास्वामी मामले का फैसला आया था. जिसमें निजता को जनता का मौलिक अधिकार माना गया था. इस फैसले के बाद निजता को लेकर बातें शुरू हुई. जिसके बाद जस्टिस श्री कृष्णा की निगरानी में डेटा प्रोटेक्शन को लेकर एक कमेटी बनाई गई. साल 2019 में कमेटी ने पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल का प्रारूप पेश किया. इसके बाद एक संयुक्त संसदीय समिति ने दो साल तक इस पर काम किया. जो अब एक नया बिल लेकर आए है, उसका नाम है डेटा प्रोटेक्शन बिल.”
मेघनाद आगे कहते है, “पहले के बिल में पर्सनल डेटा को ज्यादा सुरक्षा देने की बात कही गई थी, लेकिन इस बिल में पर्सनल शब्द को ही हटा दिया गया है. नए बिल में पर्सनल, नॉन पर्सनल डेटा सभी को डेटा कहा गया है. जो की गलत है.”
चर्चा में आनंद और शार्दूल को शामिल करते हुए अतुल सवाल करते हैं, “हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां टेक्नोलॉजी हमारे जीवन में घुस गया है. यहीं से डेटा के शेयरिंग और दुरुपयोग की शुरुआत होती है. इस खतरे को लेकर राज्य को क्या रास्ता अपनाना चाहिए.”
आनंद कहते हैं, “दो दशक पहले ही बताया गया कि डेटा एक नया संसाधन है. डेटा का दायरा इतना बढ़ा है कि इसमें पर्सनल डेटा को सीमित करना होगा. अभी निजता पर काम किया जाना बाकी है क्यों कि टेक्नोलॉजी हर दिन बदल रही है ऐसे में ठोस कदम उठाने में समय लगेगा. वहीं दूसरी तरफ आम आदमी के बीच निजता को लेकर उतनी चिंताए नहीं हैं क्योंकि उसे इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता है. वह अभी इन सब चीजों से अनजान है. निजता का मामला अभी विशिष्ट लोगों के बीच का मुद्दा है.”
इस विषय पर शार्दूल कहते हैं, “नागरिक के तौर किसी अधिकार की समझ नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि जनता के ऊपर उसका असर नहीं पड़ेगा. यह सब पर असर डालेगा. संसद में मंत्री बिल पर बोलते हुए कहते है इसमें राज्य का हित है. कानून में हित राज्य का नहीं जनता का होना चाहिए. मेरी प्राइवेसी मेरा अधिकार है. सरकार उसे तब ले सकती है जब कोई अपरिहार्य जरुरत हो. सरकार कह रही हैं कि हमें आपका डेटा चाहिए अब आप बताइए कि आप क्यों नहीं देना चाहते. तो फिर इसमें जनता की सहमति कहां हुई.”
इस विषय के अलावा चुनाव सुधार बिल पर भी विस्तार से बातचीत हुई साथ में हरिद्वार में कट्टरपंथी हिंदुत्ववादियों द्वारा मुसलमानों पर हमले को लेकर की गई विवादित बयानबाजी पर भी चर्चा हुई. पूरी बातचीत सुनने के लिए हमारा यह पॉडकास्ट सुनें और न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करना न भूलें.
टाइमकोड
00-3:39 - इंट्रो
3:40-9:50 - हेडलाइंस
9:54-40:29 - डेटा प्रोटेक्शन और चुनाव सुधार बिल
40:31- 1:08:49 - हरिद्वार धर्म संसद के विवादित बयान
1:08:51 - सलाह और सुझाव
पत्रकारों की राय, क्या देखा, पढ़ा और सुना जाए.
मेघनाद एस
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प्रोड्यूसर- आदित्या वारियर
एडिटिंग - उमराव सिंह
ट्रांसक्राइब - अश्वनी कुमार सिंह
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