तीन माह से यातायात का एक मात्र जरिया ऐसी नावें हैं, जिन पर असुरक्षित तरीके से सफर करने को मजबूर हैं हजारों लोग.
Ground Report

सवा तीन महीने लंबी बाढ़ का मुकाबला दो वक्त की खिचड़ी से

37 साल की कलावती देवी अपने घर के सामने बनी ऊंची नींव पर बैठी घास के लंबे पत्तों को तराश रही हैं. उनके पीछे एक चौकी पर उनके तीन बच्चे लुढ़के हुए हैं, थोड़े और पीछे तीन बकरियां और उनके दो बच्चे हैं. ऊपर प्लास्टिक के बोरों को जोड़कर बना एक तिरपाल जैसा कुछ टंगा है. पिछले दस दिनों से यह उनका, उनके चार बच्चों और पांच बकरियों का आशियाना है. क्योंकि उनके गांव मंगलपुर में भीषण बाढ़ आई हुई है. 

कलावती के पति रोजगार के सिलसिले में बाहर रहते हैं, इसलिए संकट के इस पूरे अंतराल में उन्होंने अपने चार बच्चों और पांच बकरियों को अकेले संभाला है. सबके लिए भोजन का इंतजाम भी किया है. 

कैसे किया? इस सवाल पर कलावती कहती हैं, “घर में चार चौकियां थीं, चारों को इस जगह ले आए. नीचे ईंट रख दिये तो चौकियां ऊंची हो गई. उसी चौंकी पर सबको बिठाकर रखते थे. एक कोने में चूल्हा रखकर खाना भी पकाते थे. जैसे-तैसे संभाल लिये. जब सब हमारे ही भरोसे है तो हमीं को संभालना होगा न?” वे इशारे से बताती हैं कि चौंकी की बैठने वाली जगह से सिर्फ दस इंच नीचे तक पानी पहुंच गया था.  

“पानी और बढ़ जाता तो क्या करते? कोई बचाने नहीं आया?”

“ऊंह, कौन आता है बचाने गरीब लोगों को. जिनको पैसा था वे दू हजार-तीन हजार देकर नाव मंगवाये और अपने पलिवार (परिवार) को बाहर निकाले, अपने घर जोगने के लिए रह गये. हमारे पास पैसा था?”

कलावती देवी ने इस बाढ़ में इसी जगह अपने चार बच्चों और पांच बकरियों की देखरेख अकेले की.
बाढ़ से डूबे इलाके में अपने दुधारू पशु के लिए चारा काटकर लाता एक किसान
संतान की लंबी उम्र के लिए मनाये जाने वाले जितिया पर्व के लिए बाढ़ के पानी में ही स्नान करती महिलाएं
चार माह के जुड़वा बच्चे, जिनकी मां बाहर से मिल्क पावडर खरीद कर उन्हें दूध पिलाती है. बच्चों के लिए दूध का कोई इंतजाम नहीं
बडहरवा के सरकारी स्कूल में बना सामुदायिक किचेन, यहां 300 से अधिक लोग रहते हैं, मगर रहने और शौच इत्यादि की कोई ढंग की व्यवस्था नहीं

बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के योगापट्टी प्रखंड का सिसवा-मंगलपुर पंचायत इस साल संभवतः अपने इतिहास की सबसे भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है. इस गांव में 26 जून, 2026 से बाढ़ का पानी है. कभी बढ़कर पानी घरों में घुस जाता है तो लोग चौंकियों पर और छतों पर शिफ्ट हो जाते हैं और पानी उतरता है तो फिर घरों में आ जाते हैं. मगर गांव के चारो तरफ पानी ही पानी नजर आता है. कहीं जाना हो तो नाव का ही सहारा है. इस आपदा में ऐसी स्थिति में अकेले अपने पूरे परिवार और पालतु पशुओं को संभालने वाली कलावती अकेली नहीं है. 

थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर एक और परिवार अपने इंदिरा आवास की छत पर इसी तरह प्लास्टिक की शेड के नीचे दिखता है. एक महिला और उसकी दो बेटियां. वे संकोच से बात नहीं करतीं. 

85 साल की चमिकया देवी कहती हैं, “गंडक किनारे गांव है तो बाढ़ तो आता ही रहता है, लेकिन ऐसा बाढ़ पहले कभी नहीं देखे बबुआ. चार महीना से परेशान कैले है.”

इस बात को विस्तार देते हुए साठ साल के लोरिक मांझी कहते हैं, “वैसे तो छठा महीना के 26 तारीख को जो पानी आया था, अभली तक हैईये है, लेकिन कहिये तो तीन बार जोर का पानी आया. 26 जून का पानी हमारे घर में भर छाती हो गया, फिर नेपाल में का हल्ला हुआ तो उसका पानी चौबीस घंटा में आ गया और भर कमर पानी हो गया और फिर इस बार पानी आया भर छाती. तीनों बार पानी दस-दस, बारह-बारह दिन घर में रहा और खूब पिराया. पानी घर से निकलता, लेकिन रस्ता-पैरा, खेत में तो रहबे करता था. समझिये, तीन-चार महीना से पानिये में हैं.”

मगर लोरिक मांझी जिस सबसे तकलीफदेह बात की तरफ इशारा करते हैं, वह यह है कि किसी बार उन्हें या सात हजार से अधिक परिवार वाले इस पूरे पंचायत के लोगों को बचाने, पानी से निकालने कोई नहीं आया.  सरकारी नाव काफी बाद में चली. गांव में चार दिन खिचड़ी बंटकर खत्म हो गया. कोई सूखा राशन नहीं मिला. 

वे कहते हैं, “हमलोग तो जहां-तहां से खा लेते थे, मगर जानवर क्या खाते. उनके लिए चारा नहीं मिला. छोटे बच्चे को दूध नहीं मिला. स्कूल चार महीना से बंद है, बच्चा सब बाढ़ के पानी में लोघराता रहता है. लेडिज लोग खाना कहां पकायें, लैटरिन कहां जाये, उसका कोई इंतजाम नहीं. सरकार इस भीषण संकट में हमलोगों से आंख फेर ली.”

आज भी सिसवा मंगलपुर से बाहर निकलने के लिए नाव ही इकलौता रास्ता है. बडहरवा के पास से नावें यहां आने के लिए चलती हैं. तीन सरकारी नावें हैं और कई प्राइवेट नावें. यह संवाददाता भी एक निजी नाव को पैसे देकर इस गांव तक पहुंचा. तीन किलोमीटर का सफर बिना मोटर वाली नाव से 45 मिनट में पूरा हुआ. छोटी सी नाव में बार-बार पानी भर आता था. जाहिर है, इस नाव और दूसरी किसी नाव में किसी के पास लाइफ जैकेट या सुरक्षा का इंतजाम नहीं था. लोग लगातार इन्हीं नावों पर सफर करके बड़हरवा बाजार आते हैं, ताकि अपने घरों के लिए राशन खरीद लायें. 

हम गंडक की सहायक धारा कलेवा नदी को पार करके मंगलपुर पहुंचते हैं. नदी तो पतली सी है, मगर उसके दोनों तरफ बाढ़ का पानी पसरा है. रास्ता खेतों से होकर गुजरता है और अक्सर गन्ने की ऊपरी ठूंठ दिख जाती है, जिससे समझ आता है कि पानी कितना है. कहीं-कहीं धान के पौधे भी दिखते हैं. 

नाविक अर्जुन निषाद कहते हैं, “सब डूब गया, बरबाद हो गया.” 

गांव के किसान हो या खेतिहर मजदूर सबका एक ही दर्द है. “इस बार तो गन्ना और धान 90 परसेंट बरबाद हो गया, अगले साल गेहूं भी नहीं होगा, काहे की पानी अभी साल भर खेत में रहेगा.”

यह कष्ट सिर्फ सिसवा मंगलपुर पंचायत का नहीं है, योगापट्टी प्रखंड के कई दूसरे गांवों का भी है. 

बाढ़ के पानी में डूबी गन्ने की फसल, इस इलाके में गन्ना मुख्य फसल है.
तीन माह से यातायात का एक मात्र जरिया ऐसी नावें हैं, जिन पर असुरक्षित तरीके से सफर करने को मजबूर हैं हजारों लोग
छत पर गृहस्थी
मुशहरों के टोले में अभी भी जमा है बाढ़ का पानी
बाढ़ के पानी में डूबी गन्ने की फसल, इस इलाके में गन्ना मुख्य फसल है.
सिसवा मंगलपुर पंचायत के मुखिया रामचंदर साह

चौमुखा पंचायत के गांव भी कमोबेश ऐसे ही संकट का सामना कर रहे हैं. मगर वहां सरकारी उपेक्षा अलग तरह की है. लोगों के आने-जाने के लिए सरकार ने एक अदद नाव तक नहीं दी है. लोग कमर भर और छाती भर पानी में रास्ता पार करते हैं. बड़हरवा के पास जहां से उस पंचायत की तरफ जाने का रास्ता है, वहां कई ऐसे लोग मिलते हैं. 

हरेंद्र यादव कहते हैं, “इस बार तो तीन दिन तक लोग भूखे रह गये. कई झोपड़ियां गिर गईं, लोग किसी किसी के छत पर जाकर रहे. अब तो पानी घटा है तो लोग पैदल आ रहे हैं. जब बाढ़ था तो गांव से निकलने का कोई रास्ता नहीं था. औरत और बच्चों का हाल बुरा था. लोग रोती-चिल्लाती थीं, मगर कोई न सुनने वाला था, न देखने वाला. हर बार हमलोग औरत और बच्चों को बाहर निकाल देते थे. इस बार तो सबको उसी में भगवान-भगवान करके रहना पड़ा. बच गये यही बहुत.”

चौमुखा की औरतों, बच्चों और बुजुर्गों को तो गांव में ही इस भीषण बाढ़ का सामना करना पड़ा, मगर सिसवा-मंगलपुर की औरतें और बच्चे पिछले एक हफ्ते से राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बड़हरवा में शरण लिये हुए हैं. वहां तीन सौ से अधिक लोग हैं. मगर वह राहत शिविर जैसा बिल्कुल नहीं है. सरकार ने अपनी तरफ से सिर्फ दो वक्त के खाने की सुविधा कर दी है और सामुदायिक रसोई का बैनर टांग दिया है. 

मगर इन लोगों के पास सोने का कोई ढंग का इंतजाम नहीं है. न बिस्तर मिला है, न चादर. ललिता देवी कहती हैं, “अपना-अपना दरी लेकर आये थे हमलोग उसी को बिछाकर सोते हैं.” पूरे स्कूल में सिर्फ चार शौचालय है, जिनमें दो पर ताला लगा है. शेष दो शौचालयों पर तीन सौ से अधिक लोग निर्भर हैं. ललिता कहती है, “बाहर जाते हैं, खेत में और क्या?” शिविर में कई छह माह से कम उम्र के शिशु हैं. उनके लिए दूध का कोई इंतजाम नहीं है.

चार महीने की अपनी जुड़वा बेटियों के साथ शिविर आईं मानती देवी ने दूध पावडर का डब्बा खरीदा है, उसी को घोल कर और थम्स अप की बोतलों में निप्पल लगाकर बच्चियों को दूध पिलाती हैं. ऐसे कई बच्चे हैं. कई ग्रामीण अपने साथ पशुओं को लेकर आये हैं, मगर उनके लिए चारे का समुचित इंतजाम नहीं है. 

सिसवा मंगलपुर पंचायत के मुखिया रामचंदर साह कहते हैं, “तीन महीने से बाढ़ आया है. इतना ही नहीं बाढ़ के साथ कटाव भी है. सिसवा का 35 घर कटाव का शिकार हो गया है. भीषण आपदा है. हमलोग सरकार के सहयोग से यहां और सिसवा में सामुदायिक रसोई चला रहे हैं. लोगों को आने-जाने में गांव में रहने में बहुत दिक्कत है.”

मूसहर टोले में बाढ़ का पानी
मूसहर टोले में बाढ़ का पानी
मूसहर टोले में बाढ़ का पानी
बाढ़ के पानी के बीच दुकानदारी

वे अपनी बात कहते कहते बिफर पड़ते हैं, “सिसवा मंगलपुर में एक आदमी को पशु चारा नहीं मिला. बच्चा लोग यहां हैं लेकिन दूध का इंतजाम नहीं है. शौचालय का इंतजाम नहीं है. तीन बार बाढ़ आया, तीन महीने से बाढ़ का पानी अटका है, हम लोगों का सात हजार में क्या होगा. लेकिन हम डिमांड ही कर सकते हैं न. मिलेगा तब न. सात हजार भी अभी नहीं मिला है. सर्वे ही हो रहा है.”

मुखिया के बयान से जाहिर है, सिसवा मंगलपुर और चौमुखा पंचायत में इस साल आई भीषण बाढ़ की कहानी सिर्फ त्रासदी की कहानी नहीं है, राहत कार्य में सरकारी उपेक्षा की भी कहानी है. 

पिछले बीस साल तक बिहार पर शासन करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते थे- राज्य के खजाने पर पहला हक आपदा पीड़ितों का है. उन्होंने आपदा प्रबंधन विभाग के साथ एक प्राधिकार भी बनाया. बाढ़ के दौरान आपदा राहत के लिए एसओपी भी तैयार कराया. साथ ही 2030 तक के लिए रोडमैप भी विकसित कराया. हर साल आपदा प्रबंधन विभाग अप्रैल महीने से ही संभावित बाढ़ के दौरान बचाव और राहत की तैयारियां करता है. जिसमें नाव, गोताखोर के साथ-साथ, रिलीफ कैंप, सूखा राहत और पुनर्वास तक की योजना होती है.

मगर दो अक्तूबर, 2026 को आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा जारी डेली फ्लड बुलेटिन के मुताबिक, राज्य के 4.93 लाख बाढ़ पीड़ितों के लिए सिर्फ दो राहत शिविर चल रहे हैं. जिनमें सिर्फ सौ लोग रह रहे हैं. इनके अलावा 242 सामुदायिक रसोई चल रही हैं. जबकि इस बार की बाढ़ का प्रसार छह जिलों की 144 ग्राम पंचायतों तक है. ऐसे में बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित इन दो पंचायतों के हिस्से में बमुश्किल दो सामुदायिक रसोई आई हैं, जहां दो वक्त की खिचड़ी भर मिलती है. 

निजी राहत कार्यों की त्रासदी अलग है. कई लोग राहत बांटने आते हैं, उनकें स्वयंसेवी संस्था के लोग भी हैं और राजनेता भी. मगर वे डगमग डोंगी पर सवार होकर गांव तक पहुंचने का हौसला नहीं कर पाते हैं. दो अक्तूबर के दिन भी कई राजनेता रिलीफ के पैकेट लेकर पहुंचे, मगर उन्होंने बड़हरवा में ही वे पैकेट बांट दिये. न सिसवा मंगलपुर जा सके, न चौमुखा. 

बाढ़ के बाद पानी से भीगे अनाज को बचाने की जद्दोजहद ताकि कुछ दिन इनका साथ मिले.
बाढ़ के बाद पानी से भीगे अनाज को बचाने की जद्दोजहद ताकि कुछ दिन इनका साथ मिले.
मूसहर टोले में बाढ़ का पानी

चंपारण में भूमि के सवाल पर लंबे समय से संघर्ष करने वाले छात्र युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़े सोशल एक्टिविस्ट पंकज कहते हैं, “इस बार साल में तीन बार बाढ़ आना ही हैरत की बात नहीं है. इतनी बड़ी संख्या में पहले कभी तटबंध नहीं टूटते थे, इस साल सिर्फ पश्चिम चंपारण में पांच जगह तटबंध टूटे हैं. इसका मतलब जल संसाधन विभाग के महकमे से भी लापरवाही हुई है. बाकी सबसे भीषण आपदा में जिन लोगों के दुख के साथ सहभागी होने की जरूरत थी, उसे सरकार ने अकेले जूझने छोड़ दिया है, यह भी त्रासद है. पहले रिलीफ कैंप लगते थे, अब खिचड़ी बांट कर काम चल रहा है. सरकार अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने की कोशिश कर रही है.” 

इस मसले पर जब न्यूजलॉन्ड्री ने जिले में बाढ़ राहत अभियान की निगरानी कर रहे पश्चिमी चंपारण के एडीएम राजीव रंजन सिंहा से पूछा तो उन्होंने कहा, “पहली बार जब उधर बाढ़ आई तो हमलोगों ने उन गांवों में सूखा राशन भिजवाया था. अभी योगापट्टी प्रखंड में 18 सामुदायिक रसोई, चार मेडिकल कैप, चार मोबाइल मेडिकल कैंप, दो पशु चिकित्सालय का संचालन हो रहा है. तीन जगह पशु चारा का वितरण किया जा रहा है. आज से उन इलाकों के बाढ़ पीड़ित परिवारों की सूची जीआर राशि (बाढ़ पीड़ितों को मिलने वाला सात हजार रुपये का एकमुश्त सरकारी मुआवजा) के लिये अपलोड की जा रही है. दस अक्तूबर को मुख्यमंत्री के हाथों यह राशि जारी की जाएगी. दो पशु चिकित्सा, तीन जगह भूसा बंट रहा है. आज से सिसवा मंगलपुर वालों के लिए भूसा बंटेगा. इसके साथ फसल क्षति का भी आकलन किया जा रहा है.” 

यह पूछने पर कि जिन गांवों में एक ही साल में तीन बार बाढ़ आई है, उनके लिए कोई विशेष योजना है क्या? इस पर वे कहते हैं, “हम सरकारी नियम के आधार पर ही कुछ कर सकते हैं. वैसे भी वे नदी के किनारे के गांव हैं, वहां बाढ़ का खतरा रहता है.” रिलीफ कैंप न होने की बात पर वे कहते हैं, “बड़हरवा स्कूल में आज से रिलीफ कैंप खोलने का मैंने आदेश दे दिया है.” 

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