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उत्तराखंड: मुस्लिम वोटरों के नाम हटाने की साजिश? ‘फर्जी’ आपत्तियों के पीछे भाजपा के एजेंट
उत्तराखंड की झबरेड़ा विधानसभा सीट पर वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट पर दर्ज 1,657 आपत्तियों में आवेदक के तौर पर जिन 35 लोगों के नाम थे, उनका कहना है कि उन्होंने ऐसी कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई और उनकी पहचान का गलत इस्तेमाल किया गया. इन आपत्तियों में जिन वोटरों को निशाना बनाया गया, उनमें से ज़्यादातर मुस्लिम थे.
18 और 19 अगस्त को हरिद्वार जिला प्रशासन को दिए गए हलफनामों में इन 35 लोगों में से हर एक ने कहा कि किसी ‘अज्ञात व्यक्ति’ ने उनके नाम, एपिक नंबर और जाली हस्ताक्षर का इस्तेमाल करके ‘फॉर्म 7’ के तहत आवेदन किया है. इन आवेदनों का इस्तेमाल वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए किया जाता है.
दिलचस्प बात ये है कि इन 35 लोगों में से 31 भाजपा के बीएलए-2 हैं. बूथ लेवल एजेंट-2 (बीएलए-2) किसी राजनीतिक पार्टी की ओर से किसी खास पोलिंग स्टेशन के लिए नियुक्त जमीनी स्तर का प्रतिनिधि होता है. यह बूथ लेवल एजेंट-1 (बीएलए-1) से अलग होता है, जिसे पूरी विधानसभा सीट के लिए चुना जाता है. बीएलए-1 और बीएलए-2 वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण के दौरान चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त बूथ लेवल अधिकारियों के साथ मिलकर काम करते हैं.
झबरेड़ा में भाजपा के 151 बीएलए-2 हैं, जिनकी अगुवाई बीएलए-1 सुशील त्यागी करते हैं. त्यागी ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और कहा, ‘यह पुराना मामला है.’
न्यूज़लॉन्ड्री ने जब इसकी पड़ताल की तो सामने आया कि यहां कुल 4,099 आपत्तियों दर्ज हुई हैं. जिसमें में 1,821 आपत्तियां यानी करीब 44 फीसदी केवल 36 लोगों के नाम से दर्ज कराई. अब इनमें से 35 लोगों का कहना है कि उन्होंने ये आवेदन किया ही नहीं.
यह मामला उत्तराखंड में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआऱ) के दौरान मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है. न्यूज़लॉन्ड्री की पिछली जांच में भी सामने आया था कि राज्य में सबसे ज्यादा फॉर्म-7 आवेदन दाखिल करने वाले लोगों की सूची में जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई थी, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की थी.
झबरेड़ा में ये आवेदन दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया के दौरान दाखिल किए गए थे, जो 13 अगस्त को खत्म हो गई. इसके बाद नोटिस की प्रक्रिया 11 सितंबर तक चलेगी और अंतिम मतदाता सूची 15 सितंबर को प्रकाशित होनी है. चुनाव आयोग ने 14 जुलाई को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की थी. इसमें 71.3 लाख मतदाता थे, जबकि इससे पहले की सूची में 79.6 लाख नाम दर्ज थे.
गौरतलब है कि झबरेड़ा अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीट है, जहां मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का लगभग 32 प्रतिशत हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस उम्मीदवार ने 8,000 से ज़्यादा वोटों के अंतर से भाजपा को हराया था.
35 लोगों ने कहा- हमने आवेदन नहीं किया
चुनाव विभाग के फॉर्म-10 रिकॉर्ड के मुताबिक, झबरेड़ा में फॉर्म-7 के तहत कुल 4,099 आपत्तियां दर्ज की गईं. इनमें से 1657 आपत्तियां केवल 35 लोगों के नाम पर थीं. लगभग सभी आपत्तियों में मतदाता का नाम हटाने की वजह ‘मौजूद नहीं’, ‘पहले ही कहीं और चले गए’ या ‘मौजूद नहीं/स्थाई स्थानांतरण’ बताई गई थी.
जिन भाजपा बीएलए-2 ने अपनी एप्लीकेशन वापस ली हैं, उनमें झबरेड़ा के नगला कुबडा बूथ के रहने वाले 56 साल के मांगेराम सिरोही भी शामिल हैं. झबरेड़ा के ईआरओ को दिए हलफनामे में सिरोही ने कहा कि फॉर्म 7 की एप्लीकेशन भरने के लिए उनके नाम, एपिक नंबर और सिग्नेचर का गलत इस्तेमाल किया गया था. उन्होंने यह भी कहा कि वे इन आपत्तियों से जुड़ी किसी भी सुनवाई में शामिल नहीं हो पाएंगे, क्योंकि उन्होंने ये आपत्तियां दर्ज नहीं की थीं.
न्यूजलॉन्ड्री से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें इन आपत्तियों के बारे में तब पता चला जब बीएलओ का फ़ोन आया. उन्होंने कहा, "बीएलओ ने मुझे फ़ोन करके बताया कि मैंने एक आपत्ति दर्ज की है. तभी मुझे इसके बारे में पता चला. मैंने बीएलओ से कहा कि मैंने कोई फॉर्म 7 नहीं भरा है और न ही किसी के नाम पर कोई आपत्ति जताई है."
उन्होंने आगे कहा, "मैं तो इन लोगों को जानता भी नहीं हूं. मैं किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आपत्ति क्यों दर्ज करूंगा जिसे मैं जानता ही नहीं? अगर मैं उन्हें जानता होता तो शायद आपत्ति कर सकता था. बीएलओ का फ़ोन आने के बाद, मैंने एक हलफनामा जमा किया जिसमें कहा गया कि मैंने कोई आपत्ति दर्ज नहीं की है."
सिरोही ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि उनके एपिक नंबर और सिग्नेचर का इस्तेमाल किसने किया. उन्होंने कहा, "लेकिन जिसने भी ऐसा किया है, वह ज़रूर मेरा कोई करीबी होगा, कोई ऐसा व्यक्ति जिसे इस तरह की जानकारी हो."
जब उनसे पूछा गया कि क्या वे अपनी पहचान के कथित गलत इस्तेमाल के बारे में कोई शिकायत दर्ज कराएंगे, तो सिरोही ने कहा कि वे ऐसा नहीं करेंगे. उन्होंने कहा, "मैंने एक हलफनामा जमा कर दिया है."
बीएलए-2 में नकली राम भी शामिल हैं, जो 75 साल के स्थानीय निवासी हैं और जिनकी एप्लीकेशन में 31 नामों पर आपत्ति जताई गई थी. नकली राम ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, "मैंने वोटर लिस्ट से किसी का नाम हटाने के लिए कभी कोई एप्लीकेशन नहीं दी. मैं बिस्तीपुर में रहता हूं, जबकि जिन लोगों के नामों पर आपत्ति जताई गई थी, वे बूथ नंबर-7 के तहत आने वाले हरजोली और अकबरपुर गांवों के रहने वाले हैं और मेरा उनसे कोई लेना-देना नहीं है. मुझे इस बारे में तब पता चला जब प्रभावित लोगों ने मेरे बड़े बेटे को फ़ोन किया. उस समय मैं बीमार था और घर पर बिस्तर पर पड़ा था. मैंने अपनी आईडी इसलिए दी थी क्योंकि उन्होंने मेरा नाम बीएलए-2 के तौर पर आगे बढ़ाया था, लेकिन मेरी जानकारी के बिना उसका गलत इस्तेमाल किया गया. बाद में, स्थानीय प्रधान ने तहसील में एक हलफ़नामा तैयार करवाया. जिसमें कहा गया था कि मेरे दस्तावेज़ों का धोखाधड़ी से इस्तेमाल किया गया है, और मैंने उस पर साइन कर दिए. मैं सच के साथ हूं. अपनी उम्र और कमज़ोर होती नज़र की वजह से मैं अब इस ज़िम्मेदारी से हट रहा हूं."
न्यूज़लॉन्ड्री ने रुड़की भाजपा ज़िला अध्यक्ष डॉ. मधु सिंह से पूछा कि भाजपा के बीएलए-2, जिन्होंने वोटर के नामों पर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, अब उन आपत्तियों से इनकार करते हुए या उन्हें वापस लेते हुए हलफ़नामे क्यों जमा कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "हो सकता है कि उन्हें डर लगा हो, इसीलिए उन्होंने हलफ़नामे जमा किए."
जब उनसे पूछा गया कि वे पहले दर्ज कराई गई आपत्तियों से इनकार क्यों करेंगे तो सिंह ने कहा, "मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. हो सकता है कि कुछ लोगों ने ऐसा किया हो."
फिर 35 लोगों में कुछ और भी हैं, जैसे हरजोली झोझा बूथ के रहने वाले 47 साल के हुसैन अहमद. अहमद के बारे में रिकॉर्ड था कि उन्होंने फ़ॉर्म 7 के ज़रिए 36 नामों पर आपत्तियां दर्ज कराई थीं. हालांकि, 18 अगस्त को उन्होंने एक हलफ़नामा जमा किया जिसमें कहा गया कि फ़ॉर्म 7 एप्लीकेशन भरने के लिए उनके नाम, एपिक नंबर और साइन का गलत इस्तेमाल किया गया था.
जब न्यूज़लॉन्ड्री ने हुसैन से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि लोग उनके पास यह पूछने आए थे कि उन्होंने वोटर लिस्ट में उनके नामों पर आपत्ति क्यों जताई थी. उन्होंने कहा, "तभी मुझे फ़ॉर्म 7 एप्लीकेशन के बारे में पता चला. मुझे चुनाव आयोग से कोई नोटिस नहीं मिला था."
18 अगस्त को हुसैन ने एक हलफ़नामा जमा किया. जिसमें कहा गया कि उन्होंने किसी के नाम पर आपत्ति नहीं जताई थी. उन्होंने कहा, "मैं किसी भी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं हूं. मेरा जन्म यहीं झबरेड़ा विधानसभा क्षेत्र में हुआ था और मुझे नहीं पता कि मेरे नाम का इस्तेमाल किसने किया है. हालांकि, मुझे एसडीएम ऑफिस से एक मैसेज मिला है, जिसमें मुझे 3 सितंबर को पेश होने के लिए कहा गया है."
कोटवाल आलमपुर बूथ के रहने वाले अशोक पंवार के नाम से फॉर्म-7 के 194 आवेदन दर्ज हैं. 18 अगस्त को हरिद्वार जिला चुनाव अधिकारी को दिए हलफनामे में पंवार ने कहा कि उन्होंने किसी भी मतदाता के नाम पर आपत्ति दर्ज नहीं की थी. उनके मुताबिक, उनके एपिक नंबर और फ़र्ज़ी हस्ताक्षर का इस्तेमाल कर ये आपत्ति की गई हैं.
इसी विधानसभा क्षेत्र के शीतलपुर बूथ के मुकर्रम के नाम से 109 मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दर्ज हैं. उन्होंने भी हलफनामा देकर कहा कि उन्होंने कोई फॉर्म-7 आवेदन जमा नहीं किया और उनके एपिक नंबर तथा हस्ताक्षर का गलत इस्तेमाल किया गया.
दीपक कुमार के नाम से 121 आपत्तियां दर्ज हैं. शुभम चौधरी और राजीव त्यागी के नाम से 118-118, जबकि सागर कुमार के नाम से 108 आपत्तियां दर्ज हैं. इन सभी ने हलफनामा देकर कहा है कि उन्होंने ये फॉर्म न तो भरे और न ही जमा किए.
मोमिन नाम के एक व्यक्ति के नाम से 60 आवेदन दर्ज किए गए. मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट के मुताबिक, ये सभी आवेदन 11 अगस्त को दाखिल हुए थे. 19 अगस्त को मोमिन ने हलफनामा देकर कहा कि उन्होंने फॉर्म-7 के जरिए किसी भी मतदाता के खिलाफ आपत्ति दर्ज नहीं कराई है. उन्होंने आरोप लगाया कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उनके नाम, एपिक और फर्जी हस्ताक्षर का इस्तेमाल करके ये आवेदन दाखिल किए.
मोमिन ने अपने हलफनामे में यह भी कहा कि इन आपत्तियों से उनका कोई संबंध नहीं है और वह इनसे जुड़ी किसी सुनवाई में शामिल नहीं होंगे. उन्होंने मांग की कि इन आपत्तियों को तुरंत रद्द किया जाए, ताकि संबंधित मतदाताओं को परेशान न होना पड़े और उनके मतदान के अधिकार पर असर न पड़े.
अंकित कुमार ने कहा- गलती से हुईं आपत्तियां
झबरेड़ा में सबसे ज्यादा आपत्तियां दर्ज कराने वालों में से एक अंकित कुमार का मामला बाकी लोगों से अलग है. उन्होंने अपने हलफनामे में माना कि फॉर्म-7 के ये आवेदन उन्होंने ही दाखिल किए थे, लेकिन इसे “अनजाने में हुई गलती” बताया.
अंकित ने कहा कि उनकी सूची में शामिल मतदाता वास्तव में उसी इलाके के निवासी हैं और उन्हें मतदाता सूची में उनके नाम बने रहने पर कोई आपत्ति नहीं है. उन्होंने अपनी सभी आपत्तियां वापस लेने की मांग की और कहा कि वह इनसे जुड़ी किसी सुनवाई में शामिल नहीं होंगे. हलफनामे में उन्होंने यह भी कहा कि वह अपनी इच्छा से यह हलफनामा दे रहे हैं और उन पर किसी तरह का दबाव, जबरदस्ती या लालच नहीं है.
अंकित कुमार ने जिन 164 मतदाताओं के नाम पर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, उनमें से अधिकांश इब्राहिमपुर देह के बूथ नंबर 82 के मतदाता हैं. इनमें 36 वर्षीय डॉ. शहादत का नाम भी शामिल है. अंकित ने शहादत के परिवार के तीन अन्य सदस्यों के नाम पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी.
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में डॉ. शहादत ने बताया कि उनका परिवार मूल रूप से उत्तराखंड का ही रहने वाला है. उन्होंने कहा, “जब मुझे पता चला कि मेरे और मेरे परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर आपत्ति दर्ज की गई है, तो हमने आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति से संपर्क किया. उसने बताया कि उससे गलती हो गई है. इसके बाद उसने एफिडेविट देकर चुनाव आयोग को इसकी जानकारी दे दी. हमें चुनाव आयोग की ओर से अभी तक कोई नोटिस नहीं मिला है.”
इसी क्षेत्र के रहने वाले 40 वर्षीय मुरसाद अली और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर भी आपत्तियां दर्ज की गई थीं. मुरसाद ने भी बताया कि आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति ने बाद में एफिडेविट देकर अपनी गलती स्वीकार कर ली.
चुनाव आयोग की ओर से नोटिस मिलने के सवाल पर मुरसाद कहते हैं, “आपत्ति देने वाले ने ही एफिडेविट लगाकर बताया है कि उससे गलती हुई है. ऐसे में हमने बीएलओ और एसआईआर का काम देख रहे तहसीलदार से संपर्क किया. उनका कहना है कि जब आपत्ति दर्ज कराने वाले ने ही उसे वापस ले लिया है, तो आपत्ति खत्म हो गई. ऐसे में हमारा नाम नहीं कटेगा. या हमें नोटिस नहीं आएगा. अभी तक तो नोटिस नहीं आया है.”
ईआरओ बोले- आपत्तियां रद्द हो चुकी हैं
इसको लेकर न्यूज़लॉन्ड्री ने झबरेड़ा के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) देवेंद्र सिंह नेगी से बात की. उन्होंने बताया कि कई लोगों ने बाद में अपनी आपत्तियां वापस लेने के लिए हलफनामे दिए हैं.
नेगी ने कहा, “पहले उन्होंने नाम हटाने के लिए आवेदन दाखिल किए और अब अपनी आपत्तियां वापस लेने के लिए हलफनामे दिए हैं. ऐसे कई हलफनामे मिले हैं. चूंकि उन्होंने अपनी आपत्तियां वापस लेने की मांग की है, इसलिए उनके द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियां रद्द कर दी गई हैं. जिन मतदाताओं के खिलाफ ये आपत्तियां दर्ज की गई थीं, उनके नाम नहीं हटाए जाएंगे.”
हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि क्या मतदाताओं के नाम और एपिक नंबर की जानकारी के कथित गलत इस्तेमाल की जांच के लिए चुनाव अधिकारियों ने कोई कदम उठाया है, तो नेगी ने कहा कि जिनको लगता है कि उनके नाम और एपिक नंबर का गलत इस्तेमाल हुआ है वो शिकायत दे सकते हैं. चुनाव आयोग इसपर कुछ नहीं करता है.’’
उन्होंने कहा, “अगर उन्हें लगता है कि उनके नाम का गलत इस्तेमाल हुआ है, तो उन्हें एफआईआर दर्ज करानी चाहिए. पुलिस मामले की जांच करेगी. चुनाव आयोग किसी जांच का आदेश नहीं देगा.”
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की राय इससे अलग है. उनका कहना है कि ऐसे मामलों में चुनाव अधिकारियों को खुद जांच करनी चाहिए.
लवासा ने कहा कि “अगर जांच में यह सामने आता है कि आपत्तियां धोखाधड़ी से दर्ज की गई थीं तो उन्हें खारिज माना जाना चाहिए और आगे की जांच के लिए पुलिस में धोखाधड़ी की आपराधिक शिकायत दर्ज होनी चाहिए.”
कांग्रेस विधायक के नाम पर भी आपत्ति
झबरेड़ा से अलग, हरिद्वार की पिरान कलियर विधानसभा सीट पर भी इसी तरह का मामला सामने आया. यहां कांग्रेस के वर्तमान विधायक फुरकान अहमद का नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए एक फॉर्म-7 आवेदन दर्ज किया गया था. आवेदन मोहम्मद फुरकान के नाम से था और इसमें नाम हटाने की वजह ‘अनुपस्थित या स्थायी रूप से कहीं और चले गए’ बताई गई थी.
फुरकान अहमद ने जब मोहम्मद फुरकान से संपर्क किया तो उन्होंने ऐसी कोई आपत्ति दर्ज कराने से इनकार किया.
विधायक ने बताया कि उन्हें फॉर्म-10 के जरिए इस आपत्ति की जानकारी मिली. उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, “मुझे चुनाव आयोग से कोई नोटिस नहीं मिला.”
इसके बाद मोहम्मद फुरकान ने हलफनामा दाखिल कर कहा कि किसी और ने उनके नाम से एसआईआऱ में आपत्ति दर्ज कराई है, जिसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने फुरकान अहमद या किसी अन्य व्यक्ति के मतदाता बने रहने के संबंध में कोई आपत्ति नहीं जताई है. उनके मुताबिक, अगर उनके नाम का इस्तेमाल करके कोई आपत्ति दर्ज की गई है तो वह अमान्य है.
यह पहली बार नहीं
मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का कथित तौर पर इस्तेमाल किए जाने का यह पहला मामला नहीं है.
पिछले साल राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि कर्नाटक के अलंद विधानसभा क्षेत्र में 6,018 मतदाताओं को एक सुनियोजित अभियान के तहत फॉर्म-7 के जरिए निशाना बनाया गया. उन्होंने कहा था कि कर्नाटक सीआईडी ने चुनाव आयोग को 18 पत्र लिखकर ऑनलाइन फॉर्म के जरिए 6,000 से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश से जुड़े मामले की जानकारी मांगी थी.
‘द हिंदू’ ने फरवरी, 2023 में रिपोर्ट किया था कि कांग्रेस उम्मीदवार बी.आर. पाटिल ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि मतदाताओं की जानकारी के बिना उनके नाम हटाने के आवेदन दाखिल किए जा रहे हैं. मामला तब सामने आया जब एक बूथ लेवल ऑफिसर को अपने भाई का वोट हटाने के लिए एक फॉर्म मिला, जो उसी गांव के एक अन्य मतदाता के नाम से दाखिल किया गया था. उस व्यक्ति ने भी आवेदन की जानकारी होने से इनकार किया था.
दिल्ली में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी ने नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में नाम हटाने के आवेदन दाखिल किए जाने का आरोप लगाया था. जनवरी में हुई सुनवाई के दौरान आपत्ति दर्ज कराने वालों के रूप में सूचीबद्ध 11 लोगों ने अपने नाम से आवेदन दाखिल करने से इनकार किया था. पार्टी ने आरोप लगाया था कि उनकी पहचान का दुरुपयोग किया गया.
नियम क्या कहते हैं?
यह स्पष्ट नहीं है कि झबरेड़ा में इन 35 आवेदकों के नाम से दर्ज आपत्तियों में शामिल कितने मतदाताओं को हलफनामे दाखिल होने से पहले नोटिस भेजे गए थे.
मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत फॉर्म-7 के जरिए आपत्ति दर्ज होने के बाद एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना है. नियम 19(1)(b)(ii) के मुताबिक, अगर आपत्ति का तुरंत निपटारा नहीं होता है तो ईआरओ को आपत्ति दर्ज कराने वाले और जिस मतदाता के नाम पर आपत्ति की गई है, दोनों को अलग-अलग नोटिस देना होता है. इन नोटिस में सुनवाई की तारीख, समय और स्थान की जानकारी होनी चाहिए.
इसके बाद नियम 20 के तहत ईआरओ को संक्षिप्त जांच करनी होती है और अपना निर्णय दर्ज करना होता है. दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अधिकार होता है. ईआरओ किसी पक्ष को व्यक्तिगत रूप से पेश होने या शपथ पर गवाही देने के लिए भी बुला सकता है.
चुनाव आयोग के 2023 के इलेक्टोरल रोल मैनुअल में भी कहा गया है कि ईआरओ दावों और आपत्तियों पर तभी विचार कर सकता है, जब संबंधित सूची को मुख्य चुनाव आयुक्त की वेबसाइट, ईआरओ और मतदान केंद्र के नोटिस बोर्ड पर प्रकाशित हुए सात पूरे दिन बीत चुके हों और जिस मतदाता का नाम हटाने का प्रस्ताव है, उसे व्यक्तिगत नोटिस दिया जा चुका हो. मौत के मामलों में यह अपवाद लागू है.
झबरेड़ा जैसे मामलों में क्या होगा, इसे लेकर नियम साफ़ नहीं हैं, ऐसा कोई नियम नहीं है जो उस व्यक्ति के बारे में हो जो पहले तो आपत्ति जताता है और बाद में दावा करता है कि उसकी पहचान की जानकारी का गलत इस्तेमाल किया गया. हालांकि, जान-बूझकर गलत जानकारी देने के मामले में स्थिति साफ़ है: फ़ॉर्म 7 के नीचे एक नोट में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति जो ऐसा बयान या घोषणा करता है "जो गलत है और जिसके बारे में वह जानता है या मानता है कि वह गलत है, या जिसे वह सच नहीं मानता", वह 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 31 के तहत सज़ा का पात्र है.
खटीमा के ईआरओ तुषार सैनी ने कहा कि अगर कोई आपत्ति दर्ज कराने वाला व्यक्ति अपनी इच्छा से फॉर्म-7 के तहत दर्ज आपत्ति वापस लेने के लिए हलफनामा देता है तो वह आपत्ति “बेअसर” हो जाती है. वहीं, जो आपत्ति दर्ज कराने वाले सुनवाई में शामिल नहीं होते, उनके बारे में उन्होंने कहा कि किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति को ‘साबित’ करने की जिम्मेदारी आपत्ति दर्ज कराने वाले की ही होती है.
लेकिन हरिद्वार के दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में हुई सुनवाइयों में तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है. वहां कई मामलों में आपत्ति दर्ज कराने वाले सुनवाई के दौरान मौजूद ही नहीं रहे.
जब सुनवाई में आपत्ति दर्ज कराने वाला ही नहीं पहुंचा
न्यूज़लॉन्ड्री को मिली जानकारी के मुताबिक, उत्तराखंड के अलग-अलग विधानसभाओं में यह देखने को मिल रहा है कि नोटिस मिलने के बावजूद आपत्तिकर्ता अपना पक्ष रखने के लिए नहीं पहुंच रहे हैं.
मंगलौर विधानसभा क्षेत्र में भी ऐसा ही देखने को मिला है. यहां के रहने वाले मसरूर, ने जिला चुनाव अधिकारी को पत्र लिखकर शुभम नाम के व्यक्ति द्वारा उनके नाम पर दर्ज कराई गई आपत्ति का विवरण मांगा था. उन्हें 17 अगस्त को सुबह 11 बजे रुड़की तहसील परिसर में सुनवाई के लिए बुलाया गया.
मसरूर ने बताया कि नोटिस देखकर वह हैरान रह गए, क्योंकि उन्होंने शुभम नाम के किसी व्यक्ति के बारे में कभी नहीं सुना था. इसके बावजूद वह सुनवाई के लिए पहुंचे. उनके मुताबिक, तहसील कार्यालय में 200 से ज्यादा लोग मौजूद थे.
जब मसरूर की बारी आई तो आपत्ति दर्ज कराने वाला शुभम वहां मौजूद नहीं था. उनके दो भाइयों के साथ भी ऐसा ही हुआ. मसरूर का कहना है कि उनके बूथ पर 50 से ज्यादा लोगों को ऐसे लोगों के नाम से आपत्तियां मिली हैं, जिन्हें वे लोग जानते तक नहीं हैं. जब ये मतदाता अपने दस्तावेज लेकर सुनवाई में पहुंचते हैं तो आपत्ति दर्ज कराने वाले अक्सर मौजूद नहीं होते.
न्यूज़लॉन्ड्री ने मंगलौर ईआरओ की ओर से शुभम और मसरूर को जारी किए गए फॉर्म-13 और फॉर्म-14 के नोटिस देखे हैं. इनमें से केवल मसरूर ही सुनवाई में पेश हुए.
हरिद्वार की बाजपुर विधानसभा सीट में भी ऐसा ही मामला सामने आया. मंगलवार को फॉर्म-7 की सुनवाई के लिए 270 से ज्यादा लोगों को बुलाया गया था. कांग्रेस नेता और नगर पंचायत अध्यक्ष रिज़वान के मुताबिक, करीब 270 मतदाता सुनवाई के लिए पहुंचे लेकिन एक भी आपत्ति दर्ज कराने वाला मौजूद नहीं था.
रिज़वान ने बताया कि उनकी पत्नी के नाम के साथ-साथ कई पार्षदों के नाम पर भी आपत्तियां दर्ज थीं. उन्होंने कहा, “हमने अपने दस्तावेज फिर से जमा कर दिए हैं और अपना पक्ष रखा है. ईआरओ ने हमें आश्वासन दिया है कि मामले की जांच की जाएगी.”
बाजपुर में भाजपा पार्षद शमशाद बी का नाम भी इस सूची में था. उनके पति परवेज़ आलम ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, “हमें नहीं पता कि मेरी पत्नी के नाम पर किसने आपत्ति जताई. लेकिन हमने अपने दस्तावेज जमा कर दिए हैं और ईआरओ के सामने अपना पक्ष रखा है.”
मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर उपलब्ध फॉर्म-10 के रिकॉर्ड के मुताबिक, शमशाद बी के खिलाफ आपत्ति लेखराज सिंह नाम के व्यक्ति के नाम से दर्ज की गई थी.
उत्तराखंड भाजपा के प्रवक्ता विनोद चमोली ने कहा कि मतदाता सूची पर आपत्तियां चुनावी प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं. उन्होंने कहा कि स्थापित सार्वजनिक हस्तियों को भी मतदाता सूची से जुड़े नोटिस का जवाब देने के लिए दस्तावेज जमा करने पड़ते हैं. चमोली ने कहा कि भाजपा सांप्रदायिक बहिष्कार की किसी नीति पर काम नहीं करती.
न्यूज़लॉन्ड्री ने इस मामले में हरिद्वार के जिला निर्वाचक अधिकारी (DEO) और उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को सवाल भेजे हैं. जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
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