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‘एनकाउंटर राज’ से ‘हिंदुत्ववादी हिंसा’ तक: अकांक्षा कुमार की पांच रिपोर्टों को प्रेम भाटिया पुरस्कार
वरिष्ठ पत्रकार आकांक्षा कुमार को साल 2026 का प्रेम भाटिया पत्रकारिता पुरस्कार मिला है. उन्हें राजनीतिक पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए इस सम्मान से नवाज़ा गया है.
आकांक्षा को यह पुरस्कार 2025 में न्यूज़लॉन्ड्री पर प्रकाशित पांच रिपोर्टों के लिए एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से मिला है. पुरस्कार समारोह मंगलवार को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित किया गया. जहां वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने प्रेम भाटिया स्मृति व्याख्यान भी दिया.
सिब्बल ने इस दौरान “लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ प्रेस और न्यायपालिका हैं, दोनों हमें विफल कर चुके हैं, क्यों?” विषय पर अपनी बात रखी.
आकांक्षा कुमार ने इन सभी रिपोर्टों के लिए महीनों तक पड़ताल की. इन रिपोर्टों के लिए उन्हें ऐसे जिलों की यात्रा भी करनी पड़ी, जो आमतौर पर राष्ट्रीय खबरों में जगह नहीं बना पाते. इनमें से किसी भी रिपोर्ट के साथ शुरुआत में यह गारंटी नहीं थी कि जांच किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुंचेगी. यही पत्रकारिता का वह हिस्सा है, जिसे विज्ञापन के जरिए फंड नहीं किया जाता और जिस पर बाकी न्यूज़रूम खर्च नहीं कर सकते. खोजी पत्रकारिता का यह दायरा अब और तेजी से सिकुड़ रहा है.
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तीन राज्य, पांच रिपोर्ट
पुरस्कार से सम्मानित पांच रिपोर्टें तीन राज्यों से जुड़ी हैं और अलग-अलग मुद्दों को सामने लाती हैं.इनमें पुलिस द्वारा कथित फर्जी मुठभेड़ में हत्याएं, सांप्रदायिक हिंसा को विदेशी साजिश साबित करने के लिए आतंकवाद विरोधी कानून के इस्तेमाल, धार्मिक अल्पसंख्यकों पर धीरे-धीरे बढ़ते कानूनी दबाव और कट्टर हिंदुत्ववादी समूहों के बेखौफ होने जैसे मुद्दे शामिल हैं.
उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ एक मां की लड़ाई
जून 2025 में प्रकाशित इस रिपोर्ट का शीर्षक था, “एनकाउंटर राज' की पड़ताल: एक जगह, तीन मुठभेड़, वही कहानी?.”
दरअसल, विजय सोनी की मौत उन हजारों मामलों में से एक थी. जहां पुलिस ने मुठभेड़ की कहानी रची थी. मालूम हो कि मार्च 2017 से सितंबर 2024 के बीच उत्तर प्रदेश पुलिस ने 12,964 मुठभेड़ का आंकड़ा पेश किया. यानि उत्तर प्रदेश पुलिस औसतन हर दिन करीब पांच मुठभेड़ कर रही थी.
विजय सोनी की मां अंजू देवी ने फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया. अदालत ने 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई.
फैसले के दस दिन बाद पुलिस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से आदेश पर स्टे हासिल कर लिया. इस खोजी रिपोर्ट में पुलिस रिकॉर्ड और कानूनी दस्तावेजों के जरिए घटनाओं की पूरी कड़ी को दोबारा तैयार किया गया. रिपोर्ट ने यह भी विस्तार से बताया कि पुलिस की कहानी किन बिंदुओं पर कमजोर पड़ती है.
कट, कॉपी, चार्ज
अप्रैल, 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट का शीर्षक था, “कट, कॉपी, चार्ज: नूंह हिंसा में हरियाणा पुलिस के कमजोर केस के अंदर की कहानी.”
दरअसल, 15 जनवरी 2024 को हरियाणा पुलिस के तीन कर्मचारियों ने छह महीने पहले हुई नूंह की सांप्रदायिक हिंसा के बारे में बयान दिए थे. इस हिंसा में दो होमगार्ड की मौत हुई थी. इस हिंसा को फरवरी, 2023 में कथित तौर पर गौ रक्षकों द्वारा नासिर हुसैन और जुनैद खान की हत्या के बदले के रूप में पेश किया गया था. तीनों पुलिसकर्मियों के बयान शब्दशः एक जैसे थे. यही एक तथ्य इस मामले की आगे की पड़ताल का आधार बना.
रिपोर्ट ने जांच की कि जुलाई, 2023 की हिंसा के पीछे विदेशी साजिश का दावा कायम रखने और यूएपीए के तहत गिरफ्तारियों को सही ठहराने के लिए किस तरह की रणनीतियां अपनाई गईं.
राजस्थान का एंटी-कन्वर्जन कानून कैसे बना
यह दो हिस्सों में प्रकाशित एक श्रृंखला थी, जिसे नवंबर, 2025 में प्रकाशित किया गया. उस समय राजस्थान अपना धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने वाला बीजेपी शासित नौवां राज्य बन चुका था. महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ भी इसी तरह के कानून पर विचार कर रहे थे. इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में ऐसे कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी.
कर्नाटक में कांग्रेस ने 2023 में सत्ता में आने के बाद इस कानून को खत्म करने का वादा किया था. लेकिन उसके बाद इस दिशा में बहुत कम कार्रवाई हुई.
सीरीज के पहले हिस्से में न्यूज़लॉन्ड्री ने धर्म परिवर्तन के आरोपों से जुड़े सात मामलों की पड़ताल की. ये मामले फरवरी, 2024 से जुलाई, 2025 के बीच भरतपुर, दौसा, झुंझुनू, जयपुर और बांसवाड़ा के अलावा पिलानी तहसील में दर्ज किए गए थे.
रिपोर्ट में दिखाया गया कि राज्य सरकार के एंटी-कन्वर्जन कानून लाने से पहले ही एक पैटर्न उभर चुका था. इन मामलों में ऐसे तीसरे पक्ष के लोगों ने शिकायतें दर्ज कराईं, जिनका संबंधित परिवारों से कोई संबंध नहीं था. पुलिस ने इन शिकायतों पर कार्रवाई की. ईसाइयों को अपने ही घरों में प्रार्थना करने के दौरान भी हमलों का सामना करना पड़ा.
दूसरे हिस्से में यह जांच की गई कि यूट्यूबर्स और मीडिया संस्थान राजस्थान में एंटी-कन्वर्जन उन्माद को कैसे बढ़ावा दे रहे थे.
वीएचपी, बजरंग दल, आरएसएस और बीजेपी नेताओं के आरोपों को यूट्यूबर्स और मीडिया संस्थानों ने आगे बढ़ाया और कई बार उन्हें स्थापित तथ्य की तरह पेश किया. इनमें से कई मामलों में न तो मुकदमे का फैसला हुआ था और कई मामलों में चार्जशीट तक दाखिल नहीं हुई थी.
यूपी के बरेली में एक जन्मदिन की पार्टी
दिसंबर, 2025 में प्रकाशित हुई रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे एक महिला की जन्मदिन पार्टी हिंदुत्ववादी भीड़ के लिए खुला न्यौता बन गई.
दरअसल, शिवांगी के नर्सिंग कोर्स के दो महीने बाकी थे. वह केशलता इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग में पढ़ रही थीं. उन्होंने अपने 22वें जन्मदिन पर अपने बैचमेट्स के साथ साल का अंत जश्न मनाकर करने का फैसला किया था. एक बजरंग दल कार्यकर्ता कैफे में पहुंचा. इसके बाद शिवांगी के मुस्लिम सहपाठियों पर ‘लव जिहाद’ के आरोप लगाए गए. शिवांगी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की गई.
इसके बजाय उनके सहपाठियों और कैफे के मालिक पर गैरकानूनी जमावड़े का मामला दर्ज कर दिया गया.
गौरतलब है कि प्रेम भाटिया पत्रकारिता पुरस्कार और व्याख्यान की शुरुआत 1995 में प्रेम भाटिया मेमोरियल ट्रस्ट ने की थी. यह पुरस्कार द ट्रिब्यून के वरिष्ठ संपादक रहे प्रेम भाटिया की स्मृति में शुरू किया गया था. 2024 में ट्रस्ट ने अपनी पूरी निधि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया को सौंप दी थी.
नोट: आकांक्षा कुमार ने बतौर स्वतंत्र पत्रकार न्यूज़लॉन्ड्री के लिए यह रिपोर्टिंग की की थीं. वर्तमान में वह द वायर के साथ काम कर रही हैं.
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