बनारस के खंडहरों के बीच, विजय-चिह्न दिखाता हुआ एक बुलडोज़र दर्शाने वाला एक चित्र.
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महादेव के शहर में बुलडोजर के निशान

इस साल 9 जनवरी को हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक बनारस के मणिकर्णिका घाट पर एक बुलडोजर पहुंचा. इसे नदी के रास्ते, एक पटरा-नाव के जरिए यहां तक लाया गया, क्योंकि गलियां इतनी संकरी हैं कि किसी और रास्ते से अंदर आना मुमकिन नहीं था.

ये बुलडोजर उन पत्थर की सीढ़ियों को हटाने आया था, जिन्हें सबसे पहले 700 साल पहले सन 1302 ईस्वी में बनवाया गया था. यह उन दो गोलाकार पत्थर के चबूतरों के लिए आया था, जिन्हें 'मढ़ी' कहा जाता है; इनका ज़िक्र 1,500 साल पहले, 5वीं सदी के एक गुप्तकालीन शिलालेख में मिलता है. जब इन दोनों को कर्णभेदी आवाज़ वाले 'पाइल ड्राइवर' से तोड़कर गिरा दिया गया, तो बुलडोजर ने उनका मलबा इकट्ठा किया; इस दौरान वहां मौजूद लोग लगातार बढ़ती बेचैनी के साथ यह सब देखते रहे, इस सब की वीडियो बनाते रहे और इसे लाइव स्ट्रीम करते रहे. जब काम पूरा हो गया, तो वो टीम नदी के जिस रास्ते से आई थी उसी रास्ते से वापस चली गई, और अपने साथ सारा मलबा भी ले गई.

दस दिन बाद जब मैंने उस जगह को देखा तो पाया कि नीले रंग के बैरिकेड्स ने मिट्टी और धूल से भरे ज़मीन के एक खाली टुकड़े को घेर रखा था, जहां अब पहरा देने लायक कुछ भी बचा ही नहीं था. सरकार के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम को आधिकारिक तौर पर परिभाषित करने वाला शब्द है- 'विकास'.

चाहे वह ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट हो, जिसे हाल ही में मंजूरी मिली है; या अरावली की पहाड़ियां, जिनके संरक्षण स्तर को खनन शुरू करने के लिए ढीला कर दिया गया है; या दिल्ली का सेंट्रल विस्टा, जहां सरकार ने 100 एकड़ की मूल्यवान सार्वजनिक जमीन पर ढांचा खड़ा कर दिया है; या ओडिशा का 'कोल-टू-केमिकल' सुंदरगढ़; या मुंबई के मैंग्रोव; या अयोध्या का मुख्य शहर; या देहरादून का रिस्पना बिंदल एलिवेटेड कॉरिडोर, मतलब चाहे वह कोई विरासत हो, पर्यावरण का हिस्सा हो, प्राचीन शहरी बस्तियां हों, या आदिवासी आवास– दो बातें इन सभी को परिभाषित करती हैं.

एक- इनकी बेशकीमती अहमियत, और इनका हमेशा के लिए खत्म हो जाना. 

दूसरा- ये सदियों में बनकर खड़े हुए पर कुछ ही दिनों में इंसानी लालच की भेंट चढ़ गए.

अक्सर कहा जाता है कि मणिकर्णिका खुद बनारस से भी पुराना है. बनारस के मूल निवासियों के सीधे-सादे शब्दों में कहें तो ‘यह धरोहर है’– एक विरासत, एक अमानत, जिसे पीढ़ियों तक आगे बढ़ाया जाना है. लेकिन इसके बजाय, यह इस भयावह सूची में शामिल होने वाला सबसे नया नाम है.

उत्तर प्रदेश में बुलडोजर को अपना विध्वंसक पंजा चलाते देखना कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि मुख्यमंत्री खुद अपने मशहूर उपनाम ‘बुलडोजर बाबा’ का आनंद लेते हैं– जो कथित राष्ट्र-विरोधी ‘अपराधियों’ को गिरफ्तार करने के बाद उनके ‘अवैध’ घरों को गिराकर सज़ा देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर न्याय’ को ‘सामूहिक दंड’ का एक रूप माना है, और इसलिए इसे असंवैधानिक करार दिया है; पर फिर भी यह चलन पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है. इस तरह से 'सजा पाने वालों' में मुसलमानों और अन्य हाशिए पर पड़े समूहों की संख्या बहुत ज्यादा रही है.

लेकिन ये उम्मीद किसी को नहीं थी कि ये विकराल मशीनें किसी प्राचीन हिंदू पवित्र स्थल पर चलाई जाएंगी. ये हैरानी जल्द ही सदमे में बदल गई, जब वहां की मढ़ियां और सीढ़ियां गायब हो गईं– ताकि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर (केवीसी) प्रोजेक्ट के चल रहे विस्तार के तहत एक आधुनिक विद्युत श्मशान घाट के लिए जगह बनाई जा सके.

बनारस के 84 घाटों में से सबसे पवित्र घाटों में गिने जाने वाले मणिकर्णिका में पैदा हुआ यह खालीपन, प्रबंधन और न्यास में भरोसे की एक सशक्त कहानी कहता है.

और इसकी मुख्य अवधारणा से जुड़ा सवाल पूरे शहर में गूंजता है: अगर धरोहर ही सुरक्षित नहीं है, तो क्या शहर के रखवालों पर भरोसा किया जा सकता है?

विकास एक 'गंदा शब्द' कैसे बन गया

हमेशा की तरह, इमारतों को गिराने की आधिकारिक वजह 'विकास' बताई गई.

यहां हर मौसम में गंगा में भयंकर बाढ़ आती है, सालों से उपेक्षित पड़ी इन जर्जर इमारतों की हालत बेहद खराब है, और मणिकर्णिका घाट पर चौबीसों घंटे चलने वाले दाह-संस्कारों से फैली अव्यवस्था को सचमुच एक सख्त सुधार की ज़रूरत है. ये एक हकीकत है.

समस्या ये है कि बनारस में अब कोई भी 'विकास' को उस नज़र से नहीं देखता.

हैरानी की बात ये है कि मणिकर्णिका में तोड़-फोड़ के दौरान, सरकार इस सुलगती, अंदरूनी स्थानीय भावना से अनजान रही. खुलेआम की गई तोड़-फोड़ से ऐसा लगा कि किसी भी तरह के जन-असंतोष की उम्मीद नहीं थी.

यह नियामक बाधाओं के प्रति भी उतनी ही उदासीन बनी रही. घाट के 200 मीटर के दायरे में किसी भी तरह के बदलाव की मनाही है, फिर भी शहर के नगर निगम अधिकारियों ने 700 साल पुरानी एक जगह को नष्ट करने की मंज़ूरी दे दी. विरासत, कानून और समुदाय- तीनों की ही अवहेलना की गई, और वह भी बिना किसी कानूनी कार्रवाई के डर के.

इस बेहिचक आत्मविश्वास के पीछे क्या वजह थी?

प्राचीन संकट मोचन मंदिर के महंत और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (आईआईटी-बीएचयू) में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग के वरिष्ठ प्रोफेसर, विशंभर नाथ मिश्र कहते हैं, 'उन्होंने यह मान लिया था कि मणिकर्णिका में भी ठीक वैसा ही होगा, जैसा काशी विश्वनाथ में हुआ था.'

महंत का इशारा उस नज़रअंदाज़ की जा रही समस्या की ओर है, जो मणिकर्णिका के तोड़े गए इलाके से 100 मीटर से भी कम दूरी पर मौजूद है- वह विशाल 'काशी विश्वनाथ कॉरिडोर', जो बनारस की गलियों और घाटों के ऊपर किसी अजीब से अंतरिक्ष-यान की तरह बेमेल सा खड़ा है. जब बनारस के लोगों से इसके बारे में पूछा जाता है, तो वे चुप हो जाते हैं.

2022 में, कोविड महामारी के दौरान, सरकार ने तेज़ी से कदम उठाते हुए बनारस की धड़कन, काशी विश्वनाथ मंदिर के चारों ओर एक कॉरिडोर बनाने का काम शुरू कर दिया. सरकार ने लॉकडाउन का फायदा उठाकर विरोध-प्रदर्शनों, विपक्षी आवाज़ों और कानूनी चुनौतियों को दबा दिया. लोगों के इस बात को ठीक से समझ पाने से पहले ही, ये कॉरिडोर बनकर तैयार हो गया. इसके लिए किसी से भी सहमति नहीं ली गई थी.

इस लंबे और समतल कॉरिडोर को बनाने के लिए सैकड़ों घरों, 200 साल पुराने कई पीपल के पेड़ों, और गलियों के उस जटिल जाल को जिसमें '143 पौराणिक मंदिर' भी शामिल थे, पूरी तरह से ढहा दिया गया. इस तरह, बनारस के मुख्य विरासत क्षेत्र में 5.5 एकड़ का एक विशाल और समतल कॉरिडोर तैयार किया गया, जिसके तीन तरफ ऊंची दीवारें खड़ी कर दी गईं.

'उस समय, लोग समझ ही नहीं पाए कि इतना सब कुछ होगा- इसलिए कॉरिडोर बस ऐसे ही बन गया. हमने सोचा था कि कुछ आकर्षक बनेगा,' महंत कहते हैं.

हैरान-परेशान बनारस वासी अभी भी लॉकडाउन से उबर ही रहे थे कि उन्हें आधिकारिक मुआवजा देकर दूर-दराज के इलाकों में बसा दिया गया.

तरक्की के बजाय नुकसान

यह नया काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ही वह पल था, जब 'विकास' का असली मतलब स्पष्ट हो गया.

लोगों ने 'विकास' शब्द को तरक्की के बजाय नुकसान समझना शुरू कर दिया – इसका सब कुछ जलाकर राख कर देने वाला, सब कुछ समतल कर देने वाला विध्वंस अपने साथ हर कीमती चीज़ को बहा ले गया: मोहल्ले, लोग, शिवलिंग, और अपनेपन का वो गहरा एहसास जो लोगों को बेहद प्यारा था. वो सदमा अभी भी शहर से गया नहीं है.

चार साल बाद, जब मणिकर्णिका घाट की बात आती है, तो इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि धरती बस राख और धूल का एक बेतरतीब, अस्त-व्यस्त ढेर है; कि आवारा कुत्ते और भेड़ें उन टूटी सीढ़ियों पर सोते हैं, जहां मृतकों को ले जाया जाता है; या कि गंगा हर साल इमारतों के दो मालों को बार-बार डुबो देती है.

लोग नहीं चाहते कि उनकी 'धरोहर'- एक ऐसा शब्द जिसका बार-बार इस्तेमाल होता है- नष्ट हो जाए.

‘बनारसी बना चपरासी’

पर फिर भी, सरकार इस नुकसान को नहीं समझती, इसे कीमती नहीं मानती, बातचीत से बचती है, और एक और ऐसी जगह पर तोड़-फोड़ का काम आगे बढ़ाती है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती. इस पूरी स्थिति में एक दुखद-हास्यास्पद सा भाव छाया हुआ है.

अधिकारियों का मानना ​​है कि उनके नए-चमकीले कॉरिडोर ने उन्हें मणिकर्णिका योजना को आगे बढ़ाने के लिए एक निर्विवाद वैधता और जनता की मंजूरी दे दी है– जिस पर 2023 से काम चल रहा है. वे इसे तोड़-फोड़ नहीं कहते. वे इसे 'सौंदर्यीकरण का काम' कहते हैं.

लेकिन सरकार जिस चीज़ को बड़े संतोष के साथ ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ मानती है, वो असल में एक ऐसा गहरा ज़ख्म है, जिसे बनारस वासियों को हर बार वहीं से गुजरते हुए बार-बार महसूस करना पड़ता है और उसके साथ जीना पड़ता है. अब 'विकास' पूरी तरह से 'बलिदान' से जुड़ गया है– और वह भी सिर्फ नागरिकों के लिए. इसका फायदा कोई और उठाता है.

एक स्थानीय दुकानदार के शब्दों में, 'बनारसी बना चपरासी'.

सरकार के इरादों और जनता की भावनाओं के बीच की इस खाई का मणिकर्णिका में हुई तोड़-फोड़ के दौरान न तो कोई अंदाजा लगाया गया था, और न ही कोई हिसाब-किताब. काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बाद जैसी हैरान-परेशान करने वाली प्रतिक्रिया और अंत में लोगों की हार मान लेने की उम्मीद करते हुए, चोरी-छिपे काम करने वाले इन ‘मास्टर्स’ ने इस बार चोरी-छिपे काम करने की भी ज़हमत भी नहीं उठाई.

मां गंगा और मां अहिल्या की तराशी हुई मूर्तियों वाली छोटी-छोटी मढ़ियों को तोड़ने का काम पूरी जनता के सामने किया गया. सदियों पुराने पत्थर के चबूतरों और देवियों को छेदकर उन्हें मलबे में बदलते हुए, हड्डियों तक को कंपा देने वाली न्यूमैटिक ड्रिलिंग के उस दृश्य को इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक पर हज़ारों ‘रील्स’ के जरिए देखा गया. सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं सोचा कि ये दृश्य उनके लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं.

एक अप्रत्याशित प्रतिक्रिया का उभरना

पर एक अलग ही नतीजा सामने आया. और ये प्रतिक्रिया उस आबादी की ओर से थी, जो चार साल पहले, 'विकास' की चमकदार पैकेजिंग में लिपटे काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर 'सरप्राइज़' से बुरी तरह झुलस चुकी थी.

तत्कालीन इंदौर रियासत की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने गरीबों को अपने मृतकों का अंतिम संस्कार करने में मदद करने के लिए मणिकर्णिका का जीर्णोद्धार करवाया था. उन्होंने 1669 में औरंगजेब द्वारा इसके विध्वंस के ठीक 111 साल बाद, 1780 में, काशी के धड़कते दिल विश्वनाथ मंदिर का भी पुनर्निर्माण करवाया. कृतज्ञता और सम्मान के प्रतीक के रूप में उन्हें बनारस की 'मां' के रूप में पूजा जाता है.

जैसे ही सोशल मीडिया पर तस्वीरें गईं, और हैरानी और अविश्वास से भरी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई, इंदौर के पूर्व राजघरानों द्वारा संचालित खासगी (अहिल्याबाई होल्कर) ट्रस्ट ने खतरे की घंटी बजा दी; उन्होंने 'इस शर्मनाक और अपमानजनक कृत्य' की निंदा की और इस बात पर गहरा रोष व्यक्त किया कि 'देवी अहिल्याबाई की पवित्र प्रतिमाएं... अब इस बेतरतीब विकास के मलबे में पड़ी हैं'.

ट्रस्ट के अध्यक्ष युवराज यशवंतराव होल्कर 14 जनवरी को उन मूर्तियों को सुरक्षित कब्जे में लेने के लिए पहुंचे, जो संभवतः बच गई हों.

तभी जाकर नुकसान की भरपाई करने की होड़ सही में शुरू हुई.

एक देर से शुरू किए गए, और टीवी पर दिखाए गए 'बचाव' अभियान में, जिलाधिकारी ने बड़े ही आदर के साथ सिर झुकाया और दो मूर्तियों को माला पहनाई- वही मूर्तियां, जो कुछ ही दिन पहले एक न्यूमैटिक ड्रिल की मार झेल रही थीं और उस ड्रिल का आदेश उन्हीं जिलाधिकारी ने दिया था.

इसके बाद, खासगी ट्रस्ट को चार में से दो मूर्तियों की कस्टडी 'वापस सौंप दी गई', जो सफेद चादरों से ढकी हुई थीं. दो अन्य मूर्तियां और एक लापता शिवलिंग या तो इतने ज्यादा क्षतिग्रस्त हो चुके थे कि उन्हें सही-सलामत वापस नहीं किया जा सकता था, या फिर वे मलबे में मिल ही नहीं पाईं.

निजी तौर पर दिया गया आश्वासन बनाम सार्वजनिक गिरफ्तारियां

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री दौड़े-दौड़े बनारस आए- लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि वे मणिकर्णिका घाट पर नहीं आए. घाट पर मौजूद पंडे या पुजारी दावा करते हैं कि उन्होंने निजी तौर पर उन्हें भरोसा दिलाया कि तोड़-फोड़ सिर्फ़ उतनी ही होगी जितनी अब तक हो चुकी है. एक पंडे वरुण ने कहा, 'उन्होंने इसे गलत बताया और माफी मांगी कि इसके आगे और कुछ नहीं होगा.'

लेकिन घाट पर 3,00,000 वर्ग फीट की विशाल जगह पर बनने वाली नई इमारत के होर्डिंग्स से यह साफ हो गया है कि तोड़-फोड़ यहीं रुकने वाली नहीं है. जिन मंदिरों के रखवाले ये पंडे हैं, उनमें से कई अब बुलडोजर की चपेट में आने वाले हैं.

जब वरुण से पूछा गया कि उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि मुख्यमंत्री अपना वादा निभाएंगे, तो वे बस अपनी उम्मीदें ही दोहरा पाए. 'और कुछ नहीं होगा. ऐसा हो ही नहीं सकता, नहीं तो...' वे कहते-कहते चुप हो गए.

महंत को इस बात पर यकीन नहीं है. वे कहते हैं, 'सामान उठाकर भाग गए. वे फिर से शुरू करेंगे! वे शहर की पहचान मिटाने और अपनी पहचान थोपने पर अड़े हुए हैं!'

जब यह साफ हो गया कि ‘विकास’ का नारा काम नहीं कर रहा है, तो सरकार की तरफ से जो सार्वजनिक बयान आए, वे पंडों को दिए गए भरोसे से बिल्कुल भिन्न थे.

जिन लोगों ने उस जगह पर विरोध प्रदर्शन किया था और सोशल मीडिया पर उसका लाइव वीडियो डाला था, उनमें से कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर मुकदमे चलाए गए, ताकि लोगों का गुस्सा दब जाए और कोई भी आगे बढ़कर विरोध करने की हिम्मत न करे. शुरुआती कुछ दिनों में, कोई भी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं था.

वरुण कहते हैं, 'बनारस में सुकून भरी शांति होती है– यह शांति नहीं, सन्नाटा है.'

फिर नए-नए बहाने सामने आने लगे. एक के बाद एक कई खंडन दिए गए.

मुख्यमंत्री योगी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि टूटी हुई मूर्तियों की तस्वीरें असली नहीं थीं, वे 'एआई' (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) से बनाई गई थीं.

मां अहिल्या और मां गंगा की कलाकृतियां मूर्तियां नहीं थीं– वो तो बस आकृतियां या सजावटी नक्काशी थीं. वाराणसी के जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने कहा, 'उनकी पूजा नहीं की जाती थी.' मतलब ये कि उनके टूटने से उतना बड़ा नुकसान नहीं हुआ था, जितना बताया जा रहा था.

विधायक नीलकंठ तिवारी ने कहा, 'जो कलाकृति हटाई गई है, उसे दोबारा स्थापित करने का इंतजाम किया गया है.'

लेकिन सरकार के ये दावे जब उनके अपनों (बनारस वासियों) को नहीं समझ आ सके, तो दूसरों को कैसे समझ आएंगे?

क्रोधित महंत कहते हैं, 'काशी का कॉन्सेप्ट ही नहीं समझे! कंकर कंकर में है शंकर. उनके लिए पत्थर हो सकता है, पर हमारे लिए पूजनीय है. इसका मूल्य तभी माना जाता है जब यह अपनी जगह पर होता है. यदि आप इसे संग्रहालय में रखते हैं, तो यह एक शोपीस है.'

इस घटनाक्रम का यही वो अहम पड़ाव है जहां काशी विश्वनाथ कॉरिडोर एक बोझ बन गया है; इसकी वृहद् मौजूदगी इस बात का कोरा सबूत है कि 'विकास' के नाम पर किन चीज़ों की 'बलि' देनी पड़ी. शहर के दिल में आए उन अकल्पनीय बदलावों को किसी तरह हजम करने के बाद बनारस अब पूरी तरह समझ चुका है, कि 'विकास' असल में दर्द की एक नई खुराक का ही दूसरा नाम है.

और अब ऐसा नहीं लगता कि उसमें और ज्यादा दर्द सहने की इच्छा बची है.

यह बात खासकर भाजपा समर्थकों के लिए सच थी; वे एक ऐसी कहानी गढ़ने की कोशिश में जुटे रहे जिसमें 'धोखे' की बू न आए - लेकिन सब कुछ अपनी नज़रों से देखने के बाद, उनके पास न तो एआई वाली मनगढ़ंत कहानियों पर यकीन करने का दिल बचा, और न ही वे 'विकास' के उस बासी चारे को निगलने को तैयार थे.

विश्वासघात

भाजपा के प्रति समर्पित लोगों में इस विश्वासघात की भावना को समझना तब आसान हो जाता है, जब आप यह महसूस करने लगते हैं कि असल घाव कहां है – और कैसे वफादारी उसे भरने की कोशिश करती तो है, लेकिन नाकाम रहती है. बस उस घाव की पपड़ी को खुरचने की देर होती है, और लोगों का दबा हुआ गुस्सा और दुख फूट पड़ता है. उन लोगों का, जिन्होंने अपनी आंखों से उस तबाही की बेपरवाह और मनमानी प्रवृत्ति को देखा है.

अक्षय, एक पंडा जिसका रोज का काम पूजा-पाठ और कर्मकांड करवाना है, जब मैंने मणिकर्णिका के बारे उनसे पूछा, तो वह चुप्पी साध लेते है. 'मुख्यमंत्री ने कह दिया है कि अब यह सब और नहीं होगा– तो अब बात किस बात पर करनी है?' वह कहते है. जैसे ही वह इस रटी-रटाई बात को दोहराना शुरू करते हैं कि विकास के लिए 'बलिदान' ज़रूरी है, तो मेरा उनसे एक साधारण सा सवाल था.

'काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह?'

'नहीं, हमने नहीं देखा.'

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर खुले हुए लगभग चार साल हो चुके हैं. हैरानी की बात है कि अक्षय– एक ब्राह्मण, एक पंडा, जिसने अभी-अभी सरकार की 'विकास' वाली बात का समर्थन किया था– उस विशाल परिसर के अंदर कभी नहीं गया, जो उसके घर से महज पांच मिनट की पैदल दूरी पर है, जो उसके मोहल्ले की पहचान है, और जो राज्य में विकास के मामले में सत्ताधारी पार्टी का पैमाना बन चुका है.

'लेकिन क्यों?'

वह अपना चेहरा झुका लेते हैं. क्या वह रो रहे हैं? क्या ये आंसू हैं? ठीक से समझ न आने की वजह है अक्षय का मुझे अपना चेहरा दिखाने से मना कर देना. हमारी बातचीत के दौरान उन्होंने अपना चेहरा दीवार की तरफ कर लिया ताकि मुझे चेहरा न दिखे. और फिर वे अपनी रटी-रटाई बात को पूरी तरह से छोड़ देते है.

'मन विचलित हो जाता है. हमें नहीं देखना.'

यही हिचकिचाहट– वो दिखावटी रवैया कि 'सब ठीक है', जिसके जरिए वे उस चीज का बचाव करने की कोशिश करते हैं, जो उनकी अपनी नज़र में भी सही नहीं है, और जो कुछ ही मिनटों में गुस्से और दुख में बदल जाती है. अमीर व्यापारियों, अघोरी बाबाओं, बनारस की गलियों में घूमने वाली ज़ेन जी के युवाओं, घाटों पर घूमने वाले फकीरों, दुकानदारों, फेरीवालों और आम राहगीरों के साथ हुई बातचीत में भी स्पष्ट रूप से झलकती है.

किसी चीज ने उन समर्थकों की पूरी फौज को बेचैन कर दिया है, जिन्होंने सोचने-समझने का अपना काम आईटी सेल के निर्देशों के भरोसे छोड़ दिया था. कहीं न कहीं सम्मोहन टूटा है, कोई पलक झपक गई लगती है.

दो शब्द इस पूरे पल को परिभाषित करते हैं: मनमानी और सेवा.

'मनमानी' को सरकार की उस जबरदस्ती के तौर पर देखा जाता है, जिसके तहत वह लोगों पर ऐसी चीजें थोपती है, जिन्हें लोग बिल्कुल नहीं चाहते. शासन-व्यवस्था पर एक विचार के तौर पर, यह लोकतंत्र के अपने मूल स्वरूप की एक स्पष्ट अपेक्षा है– जहां नागरिक ही केंद्र में होता है.

बनारस में, किसी को भी इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि इस शहर का स्वामित्व अस्थायी नहीं है. यह शहर महादेव का है– न कि इसके सांसारिक शासकों का. वे हर जगह मौजूद हैं, या जैसा कि कहा जाता है, 'कंकर-कंकर में शंकर.' कोई भी उस पहचान पर कब्जा नहीं कर सकता, न ही ऊपर से यह तय कर सकता है कि शहर के लिए क्या सही है, उसकी क्या इच्छाएं हैं, या वह कितने 'बलिदान' को सहन कर सकता है.

सबसे बड़ी बात, कोई भी अपनी निजी विरासत ऐसे शहर में नहीं बना सकता जो सिर्फ एक ही का हो.

अघोरी शैव संप्रदाय के एक युवा साधु कहते हैं, 'यह महादेव का शहर है, कोई और उससे अपनी कंपनी जैसे नहीं चला सकता. यहां वही होता है जो महादेव चाहते हैं, किसी और की मनमानी नहीं चलेगी.'

सेवा, एक जनतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार का अपने नागरिकों के प्रति फ़र्ज़ है. अगर सरकार चुने जाने के बाद अपने नागरिकों से बात नहीं करती है, और न ही उनके प्रति जवाबदेह महसूस करती है, तो तर्क यह दिया जाता है कि सेवा कहीं और जा रही है.

विनोद पांडे, जो पीढ़ियों से बनारस के रहने वाले हैं और कॉरिडोर के पास दुकान के मालिक हैं और जो तोड़-फोड़ से बाल-बाल बचे थे, कहते हैं, 'सरकार को हम बनाए हैं. अगर जनता की सेवा नहीं कर रही है तो किसके लिए बिठाए हैं?'

'ऐसा नहीं हो सकता कि विकास भी हो और हमारी सभ्यता भी बच जाए?' एक युवा आईटी प्रोफेशनल मामले की नब्ज़ पकड़ते हुए कहते हैं. विरासत, धरोहर, आधुनिकता और शासन का यह आसान सा समीकरण ही सब कुछ है– लेकिन इसे कोई नहीं मानता.

इस बीच, दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री योगी को एक पीड़ित के तौर पर देखा जा रहा है, जिनका इन केंद्र-संचालित परियोजनाओं पर कोई नियंत्रण नहीं और इसपर उनके ऊपर वालों की छाप है.

पांडे कहते हैं, 'गुजरात लॉबी जो कहती है, वही बनारस में होता है. धर्म का आदमी है (सीएम), धर्म के खिलाफ नहीं हो सकता.'

फिर भी, मुख्यमंत्री के मशहूर प्रतीक- बुलडोजर- को कोई आराम नहीं है, जो एक और ऐतिहासिक गली, एक और बसे हुए मोहल्ले में 'विकास' और 'बलिदान' लाता रहता है.

मणिकर्णिका के सुर्खियों में बने रहने के बीच दालमंडी का एक बड़ा हिस्सा– जो सदियों से मुस्लिम बहुल इलाका था, जिसमें हिंदू किराएदार और दुकान मालिक भी रहते थे, जहां कभी भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान, तबला वादक पंडित लच्छू महाराज और हिंदी सिनेमा की अग्रणी महिला संगीतकार और अभिनेत्री नरगिस दत्त की मां जद्दनबाई रहती थीं– उसे भी दुख, विरोध और लाचारी के बीच सड़क चौड़ीकरण के लिए ध्वस्त कर दिया गया.

एक और दिन. प्राचीन बनारस का एक और हिस्सा मिट गया.

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