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खामेनेई की हत्या पर लखनऊ में भारी विरोध प्रदर्शन: अमेरिका-इज़राइल के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई की अमेरिकी हमले में हुई मौत ने पश्चिम एशिया की राजनीति में उथल पुथल मचा दी है. भारत में भी इसका असर देखने को मिल रहा है. देशभर के अलग-अलग शहरों में लोग इस हमले के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 1 मार्च को लोगों ने भारी तादाद में एकत्र होकर विरोध दर्ज करवाया. इस दौरान शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के लोग शामिल रहे. लखनऊ में प्रदर्शनों का सिलसिला अभी थमा नहीं है और निरंतर तीसरे दिन भी विरोध जारी है.
हुसैनाबाद स्थित छोटे इमामबाड़े से शुरू हुआ ये प्रदर्शन बड़े इमामबाड़े में ख़त्म हुआ. जिसमें महिलाओं और बच्चों समेत हज़ारों की संख्या में लोग शामिल हुए. वरिष्ठ शिया धर्मगुरु कल्बे जवाद ने ख़ामेनेई की शहादत के मद्देनज़र शहर में तीन दिन के शोक की घोषणा की और लोगों से तीन दिनों तक दुकानें बंद रखने का आह्वान किया.
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में मौलाना कल्बे जवाद ने कहा, “अमेरिका ने जिस बुज़दिली के साथ रहबर को मारा है यह क़ाबिले मज़म्मत है. पूरी दुनिया में अमेरिका की गुंडागर्दी फैली हुई है और किसी में हिम्मत नहीं है, जो उसके खिलाफ आवाज़ उठा सके. यह एक अकेली ऐसी शख़्सियत थी, जिसने ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाई और अमेरिका और इज़राइल ने उन्हें शहीद कर दिया ताकि यह आवाज़ बंद हो जाए. लेकिन यह उनकी ग़लतफ़हमी है क्योंकि शहीद का खून कभी ज़ाया नहीं जाता. इनके खून की एक-एक बूंद से इंक़लाब पैदा होगा, जिसमें नेतन्याहू भी फ़ना हो जाएगा और ट्रंप भी.”
गौरतलब है कि अमेरिकी हमले में अयातुल्लाह ख़ामनेई समेत उनकी पत्नी, बेटी, बहू, दामाद और 14 महीने की नवासी की भी मौत हुई.
हिंदुस्तान की अवाम क्यों एक विदेशी नेता के लिए सड़कों पर है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए देखिए लखनऊ से हमारी ये खास रिपोर्ट.
मणिकर्णिका घाट से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर तक, उजड़े (ढहा दिए गए) घरों और खामोश हो चुके मोहल्लों के बीच यह सीरीज़ बताएगी कि कैसे तोड़फोड़ की राजनीति बनारस की सिर्फ़ इमारतें नहीं, उसकी आत्मा को भी बदल रही है. बनारस पर हमारे इस सेना प्रोजेक्ट को सपोर्ट करिए.
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