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'घूसखोर पंडत' मामले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: किसी भी समुदाय को नीचा दिखाना 'संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य'
नेटफ्लिक्स की फिल्म 'घूसखोर पंडित' के शीर्षक को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति या संस्था (सरकारी या गैर-सरकारी) द्वारा 'भाषण, मीम, कार्टून या दृश्य कला' के माध्यम से किसी समुदाय को बदनाम करना या नीचा दिखाना 'संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य' है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने यह टिप्पणी की. मालूम हो कि इस बीच फिल्म निर्माताओं द्वारा शीर्षक बदलने के बाद अदालत ने ये मामला बंद कर दिया है. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 'घूसखोर पंडित' एक विशेष समुदाय को अपमानित करता है.
हालांकि, औपचारिक फैसला देने की आवश्यकता नहीं रह गई थी, जस्टिस भुइयां ने अलग से निर्णय लिखते हुए कहा कि वे 'भाईचारे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों को दोहराना चाहते हैं ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे.'
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि विवाद सुलझ चुका है और मामले को समाप्त किया जा सकता है. इस पर जस्टिस भुइयां ने कहा, 'मुझे अपने विचार व्यक्त करने से मत रोकिए.'
'भाईचारा संविधान की मूल भावना'
जस्टिस भुइयां ने कहा कि ये सिद्धांत संविधान की प्रस्तावना के 'मार्गदर्शक मूल्यों' का हिस्सा हैं. उन्होंने अनुच्छेद 51अ (ई) का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है कि वह देश के सभी लोगों के बीच 'सद्भाव और भाईचारे' को बढ़ावा दे.
उन्होंने कहा, 'यह मूल रूप से अपने सह-नागरिकों के प्रति सम्मान और आदर का भाव है. जाति, धर्म या भाषा से परे भाईचारे की भावना विकसित करना और दूसरों का सम्मान करना हम सबका संवैधानिक धर्म है.'
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे सार्वजनिक व्यक्तियों की जिम्मेदारी अधिक होती है. अदालत ने कहा, 'धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना संविधान का उल्लंघन होगा- विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ ली है.'
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी संरक्षित
साथ ही, पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि फिल्म निर्माता अनुच्छेद 19(1)(अ) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से संरक्षित हैं. जस्टिस भुइयां ने कहा कि फिल्म, व्यंग्य और अन्य कलात्मक माध्यम लोकतांत्रिक विमर्श के लिए आवश्यक हैं और केवल किसी समूह की आपत्ति के आधार पर उन्हें दबाया नहीं जाना चाहिए.
नफरत भरे भाषणों की बहस के बीच टिप्पणी
अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कथित भड़काऊ बयानों को लेकर विवाद जारी है. हाल ही में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरमा के खिलाफ घृणा भाषण पर एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली अनुच्छेद 32 की याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया था.
पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा की जा सकती है और याचिकाकर्ताओं को वहीं जाने की सलाह दी. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख करना 'हाई कोर्ट का मनोबल गिराने' की एक सोची-समझी कोशिश हो सकती है.
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सरमा के कुछ बयानों को लेकर राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है. उन्होंने कथित तौर पर 'मियां' समुदाय (जो असम में बांग्ला-भाषी और पूर्वी बंगाल मूल का मुस्लिम समुदाय है) के खिलाफ विवादित टिप्पणियां कीं.
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने एक लेख में शीर्ष अदालत द्वारा सरमा के खिलाफ याचिकाएं खारिज किए जाने की आलोचना करते हुए कहा कि चुनावों के दौरान सत्ताधारी दल के नेताओं द्वारा धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ बयान दिए जाते हैं लेकिन अदालतें अक्सर इसे गंभीरता से नहीं लेतीं.
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी एक बार फिर यह रेखांकित करती है कि संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भाईचारे, दोनों को समान रूप से महत्व देता है, और किसी भी समुदाय को अपमानित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है.
मणिकर्णिका घाट से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर तक, उजड़े (ढहा दिए गए) घरों और खामोश हो चुके मोहल्लों के बीच यह सीरीज़ बताएगी कि कैसे तोड़फोड़ की राजनीति बनारस की सिर्फ़ इमारतें नहीं, उसकी आत्मा को भी बदल रही है. बनारस पर हमारे इस सेना प्रोजेक्ट को सपोर्ट करिए.
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