Opinion
‘फौलादी’ नेताओं का छुई-मुई अहंकार, ज्यों बुलबुले से कुश्ती
पंजाबी पॉप के ‘दिलेर’ गायक और कबूतरबाजी के दोषी दलेर मेहंदी लिखते हैं: मैं डरदी, रब रब करदी, के लोकि कैंदे छुई-मुई, छुई-मुई, छुई-मुई.
कवि का भाव कुछ ऐसा है: पंजाबी में रब का मतलब है ऊपरवाला. अगर आप ईसाई हैं तो यह ऊपरवाला आपके लिए यीशु हो सकता है (ताल के साथ में दि बल्ले बल्ले भी जोड़ा जा सकता है). अगर मुसलमान है तो अल्लाह, और अगर हिंदू हैं तो राम/शिव/हनुमान आदि अपने किसी इष्टदेव का नाम स्वेच्छा से जोड़ सकते हैं. चूंकि मैं तो हिंदू हूं और समय-काल-परिस्थिति का भी तकाजा यही होगा कि मैं राम का नाम ही लूं. तो मैं मेहंदी साहब को अपने शब्दों में कुछ ऐसे कहना चाहूंगा.
‘मैं डर के मारे, श्री राम, जय राम, जय-जय राम कर रहा हूं, और लोग मुझे छुई-मुई कह रहे हैं.. लेकिन अगर आपको जीवों का वैज्ञानिक नाम पसंद हो तो आप मिमोसा प्यूडिका भी कह सकते हैं. लेकिन अगर आप जीव विज्ञान से ऊपर उठ चुके हैं, तो आप पर छुई-मुई ज्यादा जंचेगा.
एक नाज़ुक मिज़ाज दंतकथा
आपको सुनाई गई सबसे बड़ी दंतकथा ये है कि केवल प्रगतिवादी या रूढ़िवादी लोग ही चुटकुलों पर सबसे ज़्यादा चिढ़ते हैं. ट्रंप के आने से पहले, उदारवादियों पर ये आरोप लगता था कि वो ही ऐसी जमात हैं, जो राजनीतिक व्यंग्य या कटाक्ष नहीं झेल सकते (जो तब कई मामलों में सही भी था). और अब मागा (ट्रंप के कट्टर समर्थकों) और रूढ़िवादियों पर ये आरोप लग रहा है कि वे लोग कॉमेडी शो और कलाकारों का मुंह बंद करने की कोशिश कर रहे हैं. क्योंकि अब उनके प्रिय नेता को व्यंग्य चुभते हैं. जैसा कि जॉन स्टीवर्ट ने कहा, अब छुई-मुई कौन है?
सच्चाई ये है कि इनमें से कोई भी धड़ा, छुई-मुई से नहीं जीत सकता. असली छुई-मुई तो अधिनायकवादी या वैसा बनने की चाह रखने वाले लोग हैं या फिर तानाशाह और उनके चमचे है. ऐसे लोग जिनके होंठ दशकों पुरानी दुख भरी कहानियां सुनाते समय कंपकपा उठते हैं– भले ही वो खुद ऐशो-आराम में जी रहे हों और सारी ताकत रखते हों, और अपनी बेपरवाही से हजारों जिंदगियां बर्बाद कर रहे हों.
उनमें यह अनोखी काबिलियत होती है कि वे नागरिकों, खासकर पत्रकारों से उम्मीद करते हैं कि वे खराब तरीके से बनाए गए कानूनों से होने वाले अन्याय को (कुछेक इसे सबसे बेहतर इस्तेमाल भी मानते हैं) झेल लेंगे, और विभिन्न समुदायों पर उनके चमचों की हिंसक व नस्लभेदी गालियों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. फिर भी वे खुद छोटे से छोटे मज़ाक या व्यंग्य पर ढेर हो जाते हैं (हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि ये गुस्से में होता है या सदमे में), जिसके चलते सरकारी तंत्र को सोशल मीडिया पोस्ट, लेख, चैनल, प्रकाशन या सोशल मीडिया हैंडल हटवाने पर मजबूर होना पड़ता है. ये छप्पन इंची सीने वाले ये दमदार तानाशाह, अंदर से बिल्कुल छुई-मुई निकलते हैं.
जब व्यंग्य जीवित था
मैं यह कहानी हमारे साप्ताहिक पॉडकास्ट एनएल हफ़्ता पर कई बार सुना चुका हूं.. (जो सिर्फ सब्सक्राइबर्स के लिए है: अगर आपको पूरी कहानी सुननी है तो यहां क्लिक करें. हम सब्सक्राइबर पर निर्भर एक निडर, विज्ञापन-मुक्त प्लेटफ़ॉर्म हैं. इसी बहाने अपना भी प्रचार हो गया.
2003 से 2010 तक, मैं गुस्ताखी माफ़ (NDTV इंडिया) और द ग्रेट इंडियन तमाशा (NDTV 24X7) का मुख्य लेखक था. कुछ लोगों को राजनीतिक हस्तियों की बड़ी-बड़ी कठपुतलियां याद होंगी. हमने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी, सोनिया और राहुल गांधी, अंबानी भाइयों के बारे में जैसे व्यंग्य किए, वैसा तो अब सोचना भी मुमकिन नहीं. आज का “राजनीतिक व्यंग्य” इंडिया टुडे का एक घटिया सा चापलूसी कार्यक्रम नजर आता है, वैसा ही उसका नाम भी है- सो सॉरी. हालांकि, उस बकवास के प्रायश्चित के लिए सिर्फ सॉरी कह देना पर्याप्त नहीं.
गुस्ताखी माफ़ और द ग्रेट इंडियन तमाशा 2003 में शुरू हुए थे. सबसे पहले सोनिया गांधी और वाजपेयी की कठपुतलियां बनी थीं, लेकिन वे स्क्रीन पर जाने वाली पहली नहीं थी. क्योंकि हमें अनुमान नहीं था कि प्रधानमंत्री वाजपेयी और अक्सर अतिसंवेदनशील सरकारी एजेंसियां कैसे प्रतिक्रिया देंगी. हास्य और व्यंग्य के मामले में भारत का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है.
अमेरिका-इराक युद्ध 2003 में शुरू हुआ. बुश और उनके विश्वस्त टोनी ब्लेयर ने इराक में ओसामा बिन लादेन (और सामूहिक विनाश के वो हथियार, जो थे ही नहीं) को ढूंढ़ने का फैसला किया. तो कार्यक्रम सद्दाम हुसैन, ओसामा बिन लादेन, जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर की कठपुतलियों के साथ ऑन एयर हुआ. पूरी तरह सुरक्षित, सटीक और जानकारीपूर्ण. इनमें से हर किरदार ने काम करने के लिए काफी सामग्री दी. जैसे-जैसे शो मशहूर हुआ, तो हफ्ते में दो बार के दो प्रसारण, जल्दी ही हफ्ते में तीन बार हो गए. सोनिया गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी को जोड़ा गया. कोई विरोध नहीं. हमें लगा कि हम और ज़्यादा भी कर सकते हैं.
2003 के अंत में दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनावों की घोषणा हुई. खबरों के सिलसिले में छह नई कठपुतलियों की मांग थी: शीला दीक्षित, मदन लाल खुराना, वसुंधरा राजे, अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह और उमा भारती. पता नहीं वे खुश हुए या नाराज़, लेकिन चूंकि सोनिया और वाजपेयी ने कोई शिकायत नहीं की थी, और जब बड़े दो को कोई फर्क नहीं पड़ता था तो छोटे नेताओं के लिए गुस्सा दिखाना मुश्किल था.
2004 में यूपीए ने एनडीए की जगह ले ली. भाजपा के युवा नेता– वेंकैया नायडू, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन– वाजपेयी और आडवाणी के बाद अगली पीढ़ी के अग्रणी बनने की होड़ में लग गए. गुस्ताखी माफ़ में दिखना एक पहचान का पैमाना बन गया. भाजपा को कवर करने वाले रिपोर्टर (कुछ एडिटर भी) कभी-कभी मुझसे कहते थे कि फलां आदमी पूछ रहा है कि उसकी कठपुतली क्यों नहीं बनी. क्या उसकी अहमियत वेंकैया नायडू से कम है? मिस्टर नायडू एक हफ़्ते में इतनी बार क्यों दिखते हैं? या इस तरह की ही कोई शिकायत. अब तक शो रोज़ाना प्रसारित हो रहा था. (यह मेरे लिए पीछे मुड़कर देखने और आंखों में आंसू भरने और इस बात पर रोने का इशारा है, कि हर सुबह 6 बजे उठकर 11 बजे तक 3 स्क्रिप्ट तैयार करना कितना मुश्किल था, और ज़िंदगी मेरे लिए कितनी मुश्किल रही है, और अगर अब कोई मेरा मजाक उड़ाए तो उसे जेल भेज देना चाहिए वगैरह वगैरह. आप जानते हैं, आपने कई दम्भी आत्ममुग्ध लोगों को इस रास्ते पर जाते देखा है.)
2003 में जन कृष्णमूर्ति के पद छोड़ने के बाद 2004 में नायडू को पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया (पहले नायडू एक अस्थाई रिप्लेसमेंट थे)– यही उनके बार-बार आने की वजह थी. साथ ही, कठपुतलियां महंगी थीं और उनके बनने में वक्त लगता था (लेटेक्स मास्क, मिट्टी, मूर्तियां). पहले से बनी कठपुतलियों का तब तक इस्तेमाल किया जाता था जब तक वह व्यक्ति राजनीतिक तौर पर गौण नहीं हो जाता था.
मैं पर्दे के पीछे की पॉलिटिक्स को समझने के लिए बीट संवाददाताओं से नियमित तौर पर मिलता था, ताकि हम उन चीज़ों पर भी टिपण्णी कर सकें जिनकी रिपोर्ट नहीं की जा सकती. भाषा में व्यंग्य का यही किरदार है. कभी-कभी हम जाने-माने फिक्सरों की बिना चेहरे वाली ऑफ-कैमरा आवाज़ें लाते थे– जो नेताओं और पत्रकारों के लिए आपस में समझ आने वाली ठिठोली हुआ करती थी. नेता हमें उन चुटकुलों के बारे में मैसेज करते थे, जिनमें उन्हें मज़ा आता था.
ऐसा इसलिए, क्योंकि किसी सरकार या समाज के किरदार और चारित्रिक गुण ऊपर से एक झरने की तरह बहते हैं. चूंकि वाजपेयी में ठिठोली और व्यंग्य को बर्दाश्त करने का आत्मविश्वास था, इसलिए दूसरों में भी था. अगर ऊपर वाला असुरक्षित, चिड़चिड़ा, और असहिष्णु रोतडू है– तो समाज में भी उस बर्ताव से फायदा होता है, जिससे लगातार बुरा मानने का चक्र चलता रहता है.
कुछ साल बाद 2006 में हम रफी पीर परफॉर्मिंग आर्ट्स फेस्टिवल के लिए पाकिस्तान गए (जिसमें जनरल मुशर्रफ खुद अपनी पत्नी के साथ आए, मैंने इस अभूतपूर्व अनुभव के बारे में अपने ब्लॉग पर लिखा है). हम सब लाहौर में गद्दाफी स्टेडियम के आसपास कुछ लॉन में इंजमाम-उल-हक, शोएब अख्तर और मुशर्रफ की कठपुतलियों का इस्तेमाल करके अपने व्यंग्य प्रस्तुत करने के लिए तैयार थे. लेकिन हमारी परफॉर्मेंस से कुछ घंटे पहले आयोजक ने हमसे मुशर्रफ पर व्यंग्य हटाने के लिए कहा. तो हमने उनसे कहा कि हमें तो लगा था कि उन्हें (मुशर्रफ को) शो पसंद आया, क्योंकि हमें बताया गया था कि जब वे पिछले साल इंडिया आए थे तो कुछ डीवीडी देखना चाहते थे. लेकिन आपको समझना है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. वे पाकिस्तान के तानाशाह थे. मुझे एक घंटे में पूरी स्क्रिप्ट दोबारा लिखनी पड़ी, जिसमें से एक किरदार को पूरी तरह से हटाना पड़ा. (आप समझ सकते हैं कि कितनी कड़ी मेहनत लगी, साथ ही मौके की नजाकत को भी समझना था और मेरे लिए यह करना कितना मुश्किल रहा होगा…)
सच्चे जनतांत्रिक नेता क्या समझते हैं
जवाहरलाल नेहरू ने मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर से कहा था: ‘शंकर, मुझे भी मत छोड़ना’. अपनी सभी कमियों के बावजूद, नेहरू जनतांत्रिक मूल्यों के लिए समर्पित थे और उन्होंने इसे दिखाया भी. समय में पीछे झांककर आज हम ये स्पष्ट रूप से देख सकते हैं.
व्यंग्य, मजाक और हास्य, एक समझदार व परिपक्व समाज, और लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं. सिर्फ़ असुरक्षित, हीन भावना से ग्रसित कमज़ोर लोग ही इस परंपरा को खत्म करना चाहते हैं. यह कोई मामूली बात नहीं, इसके परिणाम बहुत गहरे और दूरगामी हैं.
जब देशों के सिरमौर ऐसे नाज़ुक मिज़ाज या छुई-मुई नेता हों, जिनकी सत्ता की भूख कभी खत्म नहीं होती और जिन्हें हर हाल में सम्मान चाहिए, और अगर सम्मान न मिले तो डरा कर सम्मान छीन लो, ऐसे में नतीजे फौलादी नहीं, अक्सर खोखले ही निकलते हैं. एक दम खोखले.
ऐसी स्थितियों का अंजाम क्या होगा, यह कोई ज्योतिषी भी नहीं बता सकता. जब छुई-मुई नेताओं का पहाड़ सा अहंकार, रोज डांवाडोल होती विचारधाराएं, उथल-पुथल भरा सियासी मौसम और ‘बेकाबू’ टेक्नोलॉजी एक साथ मिल जाएं, तो मामला अक्सर आख़िरी पल तक फंसा रहता है. हां, इसी बीच द वायर ने भी कुछ कर डाला था, याद है? उसका अंजाम क्या हुआ? क्या आपको पसंद आया?
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