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बीएचयू: आरक्षित वर्ग के छात्रों के पीएचडी एडमिशन में भेदभाव के आरोप, मामला गरमाया तो कमेटी बनी
देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में शामिल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय यानि बीएचयू पर छात्रों से भेदभाव के आरोप लगे हैं. इस बार मामला बीएचयू के इतिहास विभाग से जुड़ा है. आरक्षित वर्ग के छात्रों का आरोप है कि उन्होंने मुख्य परिसर (मेन कैंपस) में दाखिले के लिए परीक्षा दी. साथ ही फीस भी भरी लेकिन अब उन्हें संबद्ध (एफिलिएटेड) कॉलेजों में भेजा जा रहा है. जो कि न सिर्फ आरक्षण के नियमों का उल्लंघन है बल्कि प्रशासन की ओर से भेदभाव भी दिखाता है.
इतिहास विभाग के इन छात्रों ने इन आरोपों के साथ कुलपति कार्यालय के बाहर धरना दिया. चार दिन तक चले इस धरने को बीच में रोककर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से पांच छात्रों को कुलपति से मुलाकात के लिए बुलाया गया. कुलपति ने छात्रों से धरना समाप्त करने की अपील की और कहा कि इस पूरे मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई जाएगी, जिसमें छात्रों की ओर से भी एक प्रतिनिधि शामिल होगा.
ये है मामला
बीएचयू में पीएचडी में दाखिला दो तरह से होता है. एक रिसर्च एंट्रेस टेस्ट यानि आरईटी के जरिए और दूसरा आरईटी- एग्जेंपटेड यानि इस प्रक्रिया से छूट के जरिए. आरईटी के जरिए जो दाखिला होता है, उसमें टेस्ट पास करने वाले छात्रों को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है. फिर दाखिले के लिए अंतिम सूची जारी होती है. जिसमें आरईटी के अंकों का 70 फीसदी और 30 फीसदी अंक इंटरव्यू के शामिल होते हैं. इस तरह कुल 100 अंकों के आधार पर मेरिट सूची तय होती है.
वहीं, आरईटी-एग्जेंपटेड मोड में नेट/जेआरएफ की राष्ट्रीय परीक्षा पास करने वाले उम्मीदवारों का सीधे 100 अंकों का इंटरव्यू लिया जाता है.
2024-25 के सत्र लिए इतिहास विभाग में आरईटी के 28 और आरईटी- एग्जेंपटेड की 15 सीटों पर एडमिशन हुआ. आरोप है कि आरईटी के जरिए 28 सीटों पर दाखिला पाने वाले 13 छात्रों को एफिलिएटेड कॉलेज भेज दिया गया है. जबकि आरईटी एग्जेंपटेड के सभी 15 छात्रों को कैंपस में ही रोक लिया गया.
नियम साफ कहते हैं कि छात्रों के दाखिले के दौरान आरक्षण प्रणाली का ध्यान रखा जाए. इन छात्रों का आरोप है कि स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद मुख्य परिसर की सीटों का आवंटन नियमों के अनुरूप नहीं किया गया.
कमेटी बनी लेकिन तीन दिन बाद भी कोई संवाद नहीं
13 छात्रों में से एक छात्रा चांदनी सिंह को प्रतिनिधि बनाते हुए पांच प्रोफेसर्स की कमेटी में रखा गया है. चांदनी ने बैचलर्स की डिग्री बीएचयू से ली थी और मास्टर्स की पढ़ाई के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय गईं. बातचीत में चांदनी कहती हैं, “बीते दो दिन से सिर्फ एक मेल आया है. जिसमें कहा गया है कि कमेटी बनी है. मैं यहां पहले भी पढ़ चुकी हूं. विभाग के कुछ प्रोफेसरों ने अपने ‘पसंदीदा छात्रों’ को मेन कैंपस में बनाए रखने के लिए ये सब किया है. आरईटी एग्जाम के जरिए चुने गए 28 छात्रों में से 13 को एफिलेटेड कॉलेज भेज दिया गया, जबकि यह प्रक्रिया कुल 43 सीटों के आधार पर होनी चाहिए थी.
इस पूरी प्रक्रिया पर छात्रों के कई आरोप हैं. बीचएयू की आधिकारिक सूचना-पत्रिका के अनुसार, हरेक विषय में अनुसूचित जाति को 15 फीसदी एवं अनुसूचित जनजाति को 7.5 फीसदी सीटें आरक्षित हैं और अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण है. आरोप है कि इस नियम का उल्लंघन किया गया है. साथ ही ज्यादा नंबर पाने वाले ओबीसी/एससी/एसटी छात्रों को एफिलेटेड कॉलेजों में भेज दिया गया जबकि उनसे कम नंबर पाने वाले अनारक्षित (सामान्य) श्रेणी के छात्र मुख्य परिसर में स्थान पा गए.
जामिया मिलिया इस्लामिया से एमए करने के बाद धर्मेंद्र ने बीएचयू में दाखिला लिया. एससी कैटेगरी के छात्र धर्मेंद्र कुमार कहते हैं, “जुलाई-अगस्त में एडमिशन पूरा हुआ. मेरा एडमिशन डीएमसी (डिपार्टमेंट मेन कैंपस) में हुआ. मेरे फीस पोर्टल पर यही लिखा है. इसके बाद अचानक से लिस्ट जारी कर दी कि एफिलेटेड कॉलेज में जाना होगा. मेरा 85.50 इंडेक्स आया है. इसके बावजूद डीएवी कॉलेज (बीएचयू से संबद्ध कॉलेज) में दाखिला दिया गया, जबकि 78.40 अंक वाले सामान्य वर्ग के कैंडिडेट को मुख्य परिसर में एडमिशन दे दिया गया है.
जेएनयू से हिस्ट्री में एमए करने के बाद राहुल कुमार ने बीएचयू में पीएचडी इंटरव्यू दिया और मेरिट में आए हैं. उनका कहना है कि एफिलेटेड कॉलेज में फीस ज्यादा और लाइब्रेरी सहित कई सुविधआओं से वंचित कर दिया जाता है. हमसे बातचीत में वो कहते हैं, “मेरा पेमेंट डीएमसी में हुआ और कहा जा रहा कि मैं अब कहीं और जाकर एडमिशन लूं. किसी और एफिलिएटेड कॉलेज में मुझे ज्यादा फीस देनी है. साथ ही मुझे पांच साल कोई फेलोशिप नहीं मिलेगी. ना ही मैं सेंट्रल लाइब्रेरी जा सकता हूं. बगल के अंग्रेजी विभाग में सही तरीके से आरक्षण के नियमों को फॉलो किया गया. फीस पेमेंट करने के समय ही मेरिट के आधार पर बता दिया गया कि किस छात्र को कहां एडमिशन मिलेगा.”
वह आगे कहते हैं, “हमने जब फॉर्म भरा तब ये स्पष्ट नहीं किया गया था कि सिर्फ आरईटी से ही छात्रों को एफिलिएटेड कॉलेज भेजा जाएगा. हमारा कहना है कि अगर भेजना है तो फिर दोनों में जाएं और मेरिट के आधार पर भेजा जाए. यूनिवर्सिटी अपने स्तर से दावा कर रही है. कमेटी बना दी गई है. वो अगर हमें बुलाएगी, हमारा पक्ष सुनेती हम तब ही तो जान पाएंगे कि वो क्या फैसला देंगे. तीन दिन हो गया अभी कुछ हुआ नहीं है.”
छात्रों ने एफिलिएटेड कॉलेज भेजे जाने की सूचना के बाद अक्टूबर से दिसंबर, 2025 के बीच विभागाध्यक्ष, रजिस्ट्रार, कुलपति, उप रजिस्ट्रार एवं परीक्षा नियंत्रक को पत्र लिखे हैं. इन पत्रों में उन्होंने आरक्षण अवहेलना का विवरण देते हुए राहत की गुहार लगाई है.
इस संदर्भ में हमने विभागाध्यक्ष डॉ. घनश्याम से मूल मुद्दा समझना चाहा. उन्होंने हमसे कहा, “मुझे भी सूचना मिली है कि कमेटी बनी है. कुलपति जी ने कहा है कि दस जनवरी तक रिपोर्ट देनी है, इसलिए मैं मीडिया से बात नहीं कर सकता हूं. आपके सारे सवाल जायज हैं और यही सवाल कमेटी के भी हैं. मैं आपको बस एक बात कह सकता हूं कि एडमिशन से संबंधित फैसले सिर्फ हेड ऑफ डिपार्टमेंट नहीं ले सकते हैं. प्रोफेसर्स और अन्य लोगों का बोर्ड होता है, जो एडमिशन प्रोसेस मिल कर तय करता है. आप सब को दस जनवरी तक का इंतजार करना चाहिए.”
विश्वविद्यालय के पीआरओ का भी लगभग यही कहना था. हमारे सवालों के जवाब में उन्होंने बताया, “ये एडमिशन प्रक्रिया 05.11.2024 को हुई एकेडमिक काउंसिल की मीटिंग में तय हुई थी. इस मीटिंग में एफिलिएटेड कॉलेजों और बीएचयू के बीच समझौता हुआ.”
हालांकि, उन्होंने आरक्षण प्रक्रिया या सीटों के आवंटन पर कोई जिक्र नहीं किया.
दूसरे विश्वविद्यालयों के ऑफर ठुकराने का दावा
कुछ छात्रों का यह भी कहना है कि उन्होंने बीएचयू मेन कैंपस में दाखिले की उम्मीद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय समेत अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तरफ ध्यान नहीं दिया. उन्होंने केवल बीएचयू के मेन कैंपस को प्राथमिकता दी लेकिन अब बाद में उन्हें संबद्ध कॉलेज भेजा जा रहा. लिस्ट में 92 इंडेक्स के साथ नेहा मंडल को वसंत कन्या महाविद्यालय भेज दिया गया है. हमसे बातचीत में वो कहती हैं, “बीएचयू के बाकी विभागों में ऐसी स्थिति आई है तो आरक्षण का ध्यान रखते हुए एफिलेटेड कॉलेज में भेजा गया है. इंडेक्स के हिसाब से 43 में से मैं एससी स्टूडेंट्स में पहले नंबर पर हूं. उस हिसाब से मुझे डीएमसी ही मिलता लेकिन गलत तरीके से ट्रांसफर किया गया है.”
वह आगे बताती हैं, “मैंने लखनऊ विश्वविद्याल में पीएचडी में ए़डमिशन ले रखा था. यहां जब फीस पेमेंट का लिंक आया तो साफ-साफ लिखा था कि मेन कैंपस के लिए फीस भरनी है. इसलिए मैंने वहां से एडमिशन कैंसिल करा लिया. यहां आने के दो महीने बाद पता चला कि एफिलिएटेड कॉलेज भेजा जा रहा है.”
फिलहाल छात्र विश्वविद्यालय प्रशासन से समिति की बैठक बुलाने और पूरी प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शी समीक्षा की मांग कर रहे हैं. छात्रों का कहना है कि यूनिवर्सिटी ने सूचना पुस्तिका में जो आरक्षण की व्यवस्था बताई थी, उसे लागू करने के बजाय ऐसी उलझनें पैदा कर दीं जो बिल्कुल भी ठीक नहीं थीं. इसी वजह से आरक्षित वर्ग के स्टूडेंट्स को ये परेशानी पेश आ रही है.
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