Video
ओडिशा में ‘मोंथा’ का कहर: कटाई से पहले ही बर्बाद हुई फसलें
ओडिशा में ‘मोंथा’ चक्रवात का असर 28 से 31 अक्टूबर तक रहा. इसका लैंडफॉल भले ही आंध्र प्रदेश में हुआ, लेकिन इसका व्यापक प्रभाव ओडिशा में देखने को मिला. इस चक्रवात ने न सिर्फ लोगों की जिंदगी को प्रभावित किया, बल्कि उनकी खेती को भी गहरी चोट पहुंचाई जो उनकी आजीविका और आय का मुख्य साधन है. यह पहली बार नहीं है ओडिशा के किसान अक्सर चक्रवातों की चपेट में आते हैं, और इस बार भी जब धान व अन्य फसलों की कटाई का समय था, उसी दौरान मोंथा का कहर टूट पड़ा. नतीजतन, फसलों को भारी नुकसान हुआ और किसानों की रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ा.
राज्य सरकार की ओर से इस नुकसान का आधिकारिक आकलन अभी जारी नहीं किया गया है, लेकिन पिछले वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि यह संकट लगभग हर साल दोहराया जा रहा है. 2023 में ‘दाना’ चक्रवात के कारण लगभग 1,80,000 हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई थी. 2014 में हुडहुड चक्रवात से 8 जिलों की 2,47,557 हेक्टेयर फसलें नष्ट हुईं. मई 2020 में अम्फान चक्रवात के दौरान लगभग 1 लाख हेक्टेयर खेतों को नुकसान पहुंचा. अक्टूबर 2019 में बुलबुल चक्रवात ने 6 जिलों की 2,22,496 हेक्टेयर फसलों को प्रभावित किया. मई 2019 में फनी चक्रवात से 89 ब्लॉकों की 1,81,711 हेक्टेयर फसलें प्रभावित हुईं. 2018 में आए तितली चक्रवात ने सबसे अधिक तबाही मचाई लगभग 3,96,769 हेक्टेयर खेती पूरी तरह नष्ट हो गई थी.
किसानों और किसान संगठनों का कहना है कि सरकार की राहत राशि उनके वास्तविक नुकसान की तुलना में बेहद कम है. कई किसानों ने बताया कि अब तक उनकी फसल के नुकसान का सर्वे तक नहीं हुआ है. ढेंकानाल जिले के गोविंदपुर गांव के किसान सिशिर कुमार साहू बताते हैं, “बस 15 दिन बाद हम धान काटने वाले थे. लेकिन पूरा 10 गुंठा खेत नष्ट हो गया. पानी, हवा और बारिश की वजह से धान के पौधे गिर गए हैं.”
वहीं, सेषदेव नंदा, नव निर्माण कृषक सभा के सभापति, कहते हैं, “जब तक नुकसान आकलन और राहत की प्रक्रिया में बदलाव नहीं होगा, तब तक यह संकट खत्म नहीं होगा। व्यवस्था परिवर्तन ज़रूरी है.”
देखिए पूरा वीडियो-
क्या मीडिया सत्ता या कॉर्पोरेट हितों के बजाय जनता के हित में काम कर सकता है? बिल्कुल कर सकता है, लेकिन तभी जब वह धन के लिए सत्ता या कॉरपोरेट स्रोतों के बजाय जनता पर निर्भर हो. इसका अर्थ है कि आपको खड़े होना पड़ेगा और खबरों को आज़ाद रखने के लिए थोड़ा खर्च करना होगा. सब्सक्राइब करें.
Also Read
-
Is there any hope for Gaza? An Indian judge’s reality check on Israel, justice, and us
-
Banned on paper, but coal still fuels NCR’s brick kilns
-
एनएल चर्चा 430: भारत पाकिस्तान के बीच शांति की नई कोशिश और देश में मानसून की दस्तक
-
Hafta letters: Wrong about CJP, Anand’s Rahul Gandhi take and viewers forming their own opinions
-
Meta pushes child sexual abuse material on Instagram, finds BBC investigation