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दिल्ली: कोरोना के बाद पहली बार स्कूल पहुंचे रोहिंग्या बच्चे
चाहे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार की बात करें, यूएन कन्वेंशन्स की या फिर भारत के अपने संविधान की, शिक्षा प्रत्येक बच्चे का मूलभूत अधिकार है. लेकिन इसके बावजूद दिल्ली मे रोहिंग्या शरणार्थियों के बच्चों को करीब पांच साल तक शिक्षा से वंचित रखा गया. इन बच्चों के परिजन बार-बार स्कूल का दरवाजा खटखटाते रहे लेकिन हर उन्हें निराशा हाथ लगी. पांच साल के संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट के दखल पर बीते शुक्रवार को 19 रोहिंग्या बच्चों को दिल्ली के सरकारी स्कूलों में एडमिशन मिला.
हमने इस रिपोर्ट में पहली बार स्कूल पहुंचे बच्चों और उनके परिजनों से बात की. 9 वर्षीय सफिज्जुर शुक्रवार को पहली बार स्कूल गए. उनका एडमिशन चौथी कक्षा में हुआ है. हमसे बातचीत में सफिज्जुर बताते हैं, “उन्हें पढ़ना- लिखना अच्छा लगता है और वह बड़े होकर टीचर बनना चाहते हैं.” वह आगे बताते हैं कि “हमें बहुत बुरा लगता था जब गली के बाकी बच्चे स्कूल जाते थे और हम नहीं जा पाते थे. हमें तो लगता था कि हम कभी स्कूल नहीं जा पाएंगे.”
कुछ ऐसी कहानी आठ वर्षीय आयशा की है. आयशा पढ़ लिखकर डॉक्टर बनना चाहती है. मूलरूप से बर्मा के रहने वाले आयशा के पिता हुसैन अहमद भारत में एक रोहिंग्या शरणार्थी हैं. वह पिछले 10 सालों से दिल्ली में रह रहे हैं. परिवार चलाने के लिए राजमिस्त्री का काम करते हैं. हमसे बातचीत में वह बताते हैं, “मैं भारत सरकार, यहां के कानून और भारतीय लोगों का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने हमारे बच्चों को स्कूल जाने का मौका दिया.”
वहीं, इस पूरे मामले में कानूनी लड़ाई मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता और सीनियर एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने लड़ी. बच्चों के एडमिशन के कानूनी पक्ष पर बोलते हुए वह कहते हैं, “भारत का संविधान हर किसी को जीवन जीने का अधिकार देता है फिर चाहे वह भारतीय नागरिक हो या फिर शरणार्थी. इसी बात को ग्राउंड बनाकर हमने पहले हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. अंत में सुप्रीम कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला दिया. यह भारत के संविधान और बच्चों के पढ़ने के अधिकार की जीत है.”
वहीं, इस मामले पर दिल्ली में राजनीतिक सरगर्मी भी बढ़ गई. एक तरफ जहां विपक्ष में बैठी आम आदमी पार्टी ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया कि वह रोहिंग्या के बच्चों को दिल्ली के सरकारी स्कूल में एडमिशन करा रही रही है तो वहीं, भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि इन बच्चों के एडमिशन के लिए सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर फरवरी, 2025 में ही आ गया था और तब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी.
इस पूरे मसले पर राजनीति को देखते हुए अशोक अग्रवाल कहते हैं, “यह बेहद घटिया किस्म की राजनीति है. शिक्षा हर बच्चे का अधिकार और बच्चों के शिक्षा के मामले राजनीति करना दुर्भाग्यपूर्ण है.”
देखिए हमारी ये विशेष रिपोर्ट.
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