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एक बाज़ी जीती है पूरी लड़ाई नहीं: ओशो आश्रम में 'माला' प्रदर्शन की पड़ताल
बीते 23 सालों से ओशो के अनुयायियों को पुणे में उनके द्वारा स्थापित आश्रम के अंदर ओशो माला पहनने की अनुमति नहीं थी, यह लॉकेट सहित पहनी जाने वाली मोतियों की एक माला होती है. लेकिन 21 मार्च को हालात बदल गए, जब आश्रम के विवादों से घिरे ट्रस्ट ने "विद्रोही" अनुयायियों के एक समूह की मांगों को मान लिया.
इसी तरह का विरोध जनवरी में भी हुआ था. 21 मार्च, जो ओशो के अनुयायियों द्वारा उनके "ज्ञान दिवस" के रूप में मनाया जाता है, प्रदर्शनकारियों ने आश्रम में प्रवेश करने के लिए पुलिस सुरक्षा की मांग की थी और मंजूरी मांग थी कि ऐसा करते समय उन्हें माला पहनने की अनुमति दी जाए. आश्रम के एक प्रवक्ता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, "सभी का स्वागत है लेकिन उन्हें रिसॉर्ट के नियमों और निर्देशों का पालन करना होगा."
आखिरकार प्रदर्शनकारियों की जीत हुई. लेकिन ये मुद्दा ओशो मेडिटेशन रिजॉर्ट, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ओशो आश्रम कहा जाता है, के वर्तमान प्रमुखों के साथ उनके कई मतभेदों में से सिर्फ एक ही है.
2021 में न्यूज़लॉन्ड्री ने रिपोर्ट की थी कि कैसे दो लोगों, माइकल ओ'बर्न और जॉन एंड्रयूज ने कथित तौर पर ओशो आश्रम से हजारों की कीमत वाली बौद्धिक संपदा के अधिकारों को जब्त कर लिया, जिसको लेकर ओशो के कुछ अनुयायियों ने विरोध-प्रदर्शन और अदालती मामले दाखिल किए. ये दोनों लोग, जो 1990 में ओशो के निधन के एकमात्र गवाह थे, ने कथित तौर पर ओशो की जाली वसीयत बना ली - ये मामला 2013 में अनुयायियों द्वारा उन्हें अदालत ले जाने के बाद सामने आया.
वसीयत में कथित तौर पर कहा गया है कि ओशो का इनर सर्किल - जो उनके करीबी सहयोगियों की 21 सदस्यीय समिति थी - ओशो कम्यून को चलाएगी. ओ'बर्न, जो अब स्वामी आनंद जयेश के नाम से जाने जाते हैं, इस इनर सर्कल के अध्यक्ष हैं. जबकि एंड्रयूज उर्फ स्वामी प्रेम अमृतो इसके सदस्य हैं. ओ'बर्न ज्यूरिक में ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन के सर्वेसर्वा भी हैं. इन दोनों के खिलाफ अब कई मामले जारी हैं.
प्रदर्शनकारी किशोर रावल, जो स्वामी प्रेम अनादि के पास जाते हैं, ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “यह विडंबना ही है कि हमें ओशो की माला पहनने की अनुमति उनके ही आश्रम में नहीं दी गई. लेकिन जिन लोगों ने यह नियम बनाया है, वे मुट्ठी भर विदेशी हैं जो अपने फायदे के लिए कम्यून की संपत्ति को लूटते आ रहे हैं. पिछले 23 सालों से उन्होंने किसी को भी आश्रम के अंदर ओशो की माला पहनने की इजाजत नहीं दी. पर आखिरकार उन्हें हमारी मांगें माननी पड़ीं.”
रावल का मानना है कि वर्तमान प्रबंधन ओशो के आश्रम को "पांच सितारा रिसॉर्ट" में "रूपांतरित" करना चाहता है. उन्होंने बताया कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया था, और कहा था कि "याचिकाकर्ता या भक्तों के लिए समाधि पर जाने की कोई रोक नहीं है".
रावल ने आरोप लगाया, "माइकल ओ'बर्न, उनके भाई डार्सी और जॉन एंड्रयूज ट्रस्ट में हेरफेर कर रहे हैं. लेकिन अब चीजें बदल जाएंगी क्योंकि वे किसी के भी आश्रम में अंदर आने पर रोक नहीं लगा सकते. और अब उन्हें ओशो की माला को भी आश्रम के अंदर जाने देना है. यह आश्रम को बचाने के लिए बदलाव की दिशा में हमारा अहम कदम है.”
प्रदर्शनकारी और ओशो भक्त आरती राजदान ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि वह विरोध में शामिल होने के लिए मुंबई से पुणे आई थीं.
उन्होंने कहा, "मैं 1988 से ओशो आश्रम से जुड़ी हुई हूं. यह चौंकाने वाली बात है कि ओशो का भजन-कीर्तन करना उनके ही आश्रम में एक अपराध बन गया है. हमें उनके ही आश्रम में उनकी माला पहनने की अनुमति नहीं थी! लेकिन हमने बड़ी संख्या में विरोध किया और उनसे हमारी मांगें मनवायीं.”
रावल की तरह उन्होंने भी सिर्फ ओ'बर्न पर उंगली उठाई. उन्होंने आगे कहा, "माइकल ओ'बर्न ही वो प्रमुख व्यक्ति है जो चीजें संभालता है. भारतीय ट्रस्टी उसकी कठपुतलिया हैं. वे आँख मूंद कर ओ'बर्न का अनुसरण करते हैं और वो जो कुछ भी कहता है, वैसा ही करते हैं. वे ये दिखाना चाहते हैं कि आश्रम घाटे में चल रहा है और उसे बेचना चाहते हैं. हम इस तानाशाही के खिलाफ पिछले कई सालों से लड़ रहे हैं.”
2020 में ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन ने आश्रम में 9,836.2 वर्ग मीटर के दो प्लॉट और एक बंगले को बेचने का प्रस्ताव रखते हुए मुंबई चैरिटी कमिश्नर के पास एक आवेदन दायर किया. बजाज ऑटो के एमडी राजीव नयन राहुल कुमार बजाज के रूप में उन्हें एक खरीदार मिला, जिन्होंने 107 करोड़ रुपये कीमत देने की पेशकश की.
इसके अगले साल, ओशो के कुछ शिष्यों ने इस बिक्री पर आपत्ति जताई, शिकायत दर्ज की और फिर मुंबई के ज्वाइंट चैरिटी कमिश्नर के खिलाफ उच्च न्यायालय गए. आज की स्थिति ऐसी है कि कुछ विद्रोही अनुयायी प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप चाहते हैं और उनकी इच्छा है कि पीएम उनके आश्रम को "बचाएं".
अहमदाबाद से पुणे आए 75 वर्षीय शिराज रंगवाला ने कहा, "मैं 1980 के दशक से ओशो से जुड़ा हूं. अब वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार हस्तक्षेप करें और ओशो की विरासत को नष्ट करने की इच्छा रखने वाले कुछ विदेशियों के इन घोटालों को रोकें. उनकी विरासत पूरे देश के लिए है. उनकी शिक्षाएं और साधनाएं देश की सम्पत्ति जैसी हैं.”
एक अन्य अनुयायी मां आनंद मधु ने ओ'बर्न और उनके साथियों पर आरोप लगाया कि वे "ओशो द्वारा बनाई गई हर चीज को नष्ट कर रहे हैं".
उन्होंने कहा, "इन लोगों को भारतीय दंड संहिता की धारा 295 के तहत कानूनी रूप से सजा दी जानी चाहिए. विदेशियों का यह झुंड ओशो की मृत्यु के बाद से उनके आश्रम को लूट रहा है. ज्यूरिक का कॉपीराइट हासिल कर वे अपने लॉकर भर रहे हैं. लेकिन अब ओशो के अनुयायी एकजुट हो रहे हैं. हम उन्हें उनकी विरासत को नष्ट नहीं करने देंगे.”
न्यूज़लॉन्ड्री ने ओशो मेडिटेशन रिज़ॉर्ट के प्रवक्ताओं से संपर्क किया लेकिन उनकी ओर से कोई टिप्पणी नहीं प्राप्त हुई.
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