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क्या हरियाणा सरकार सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई मौतों की कम गिनती कर रही है?
पिछले साल 13 दिसंबर को केंद्र सरकार ने लोकसभा को बताया कि 2022 में 48 लोगों की मौत "सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय हुई दुर्घटनाओं" के कारण हुईं.
48 में से सबसे ज्यादा मौतें हरियाणा (13), उसके बाद महाराष्ट्र (12) और तमिलनाडु (10) में हुईं. महत्वपूर्ण रूप से, यह भारत में मैला ढोने की कानूनी परिभाषा से अलग है जिसमें सूखे शौचालयों से मानव मल की सफाई शामिल है.
हरियाणा में 13 मौतें काफी खराब हैं खासकर इसलिए क्योंकि राज्य ने 2020 में शून्य मौतों और 2021 में केवल पांच मौतों की सूचना दी. लेकिन न्यूज़लॉन्ड्री के अपने शोध में पिछले साल कम से कम 24 मौतों का खुलासा "सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई करते समय हुई दुर्घटनाओं" के कारण हुआ. ये सभी मौतें सरकार द्वारा 13 दिसंबर को पेश किए गए आंकड़ों से पहले हुईं.
हमारा शोध हरियाणा के स्थानीय पुलिस स्टेशनों की खबरों और इनपुट पर आधारित था. हमने पलवल, गुरुग्राम और नूंह जिलों में दो-दो मौतों की गिनती की, पानीपत और भिवानी में एक-एक. फरीदाबाद और झज्जर में छह-छह और चार हिसार में.
मरने वालों की संख्या वास्तव में इस संख्या से कहीं अधिक हो सकती है. हरियाणा के नगर पालिका कर्मचारी संघ अध्यक्ष नरेश शास्त्री ने कहा कि कई मामले मीडिया में आते भी नहीं हैं क्योंकि उन पर "पर्दा डाला जाता है" क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 10 साल पहले हाथों से मैला ढोने (मैन्युअल स्क्वेंजिंग) पर प्रतिबंध लगा दिया था.
इस बीच, सफाई कर्मचारियों के लिए हरियाणा राज्य आयोग के एक अधिकारी ने कहा कि मौतों की वास्तविक संख्या "तय करना मुश्किल" था क्योंकि सभी मामले "रिकॉर्ड पर नहीं आए".
गुमनामी की शर्त पर बात करने वाले एक अधिकारी मृतकों की संख्या केंद्र सरकार के 13 के दावे से अधिक होने की संभावना से सहमत थे.
गणना
हम 24 के आंकड़े पर कैसे पहुंचे?
फरीदाबाद में पिछले साल अक्टूबर में क्यूआरजी अस्पताल में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान चार लोगों की मौत हुई थी. इसी जिले के हुडा बाजार में फरवरी 2022 में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दो सफाई कर्मचारियों की मौत हुई थी.
अगस्त में झज्जर के रोहद औद्योगिक क्षेत्र में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान चार लोगों की मौत हुई थी. जून में इसी जिले के मॉडर्न इंडस्ट्रियल एस्टेट में सेप्टिक टैंक में डूबने से दो की मौत हुई थी.
पलवल में अप्रैल में टंकी की सफाई के दौरान एक सफाई कर्मचारी की मौत हुई और तीन अन्य बेहोश हो गए थे. इसी जिले में जुलाई में एक सफाई कर्मचारी की सीवर की सफाई के दौरान दम घुटने से मौत हुई थी.
मार्च 2022 में, नूंह में एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में टैंक की सफाई करते समय दो भाई जावेद और जाहिद की मौत हुई. अक्टूबर में गुरुग्राम में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान एक सफाई कर्मचारी और एक दर्जी की दम घुटने से मौत हुई थी.
अप्रैल में पानीपत और भिवानी में सफाई कर्मचारी बिलाल और सुनील की इसी तरह का काम करते हुए मौत हुई थी. उसी महीने में, हिसार में एक सीवेज टैंक में जहरीली गैस की चपेट में आने से चार लोगों की मौत हुई.
राज्य के शेड्यूल्ड कास्ट और क्लास्सेस वेलफेयर विभाग के अधिकारियों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उन्होंने फरीदाबाद, नूंह, झज्जर, पानीपत और गुरुग्राम में मौतों को दर्ज किया था लेकिन "प्रोटोकॉल" ने उन्हें और जानकारी देने की अनुमति नहीं दी.
कोई भी अधिकारी ऑन रिकॉर्ड बात करने को राजी नहीं हुआ.
सफाई कर्मचारियों के राज्य आयोग के एक अधिकारी ने कहा कि आधिकारिक तौर पर 13 मौतें हुईं या नहीं यह "प्रमाणित" करने में अधिकारी असमर्थ थे. यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्र सरकार 13 के आंकड़े पर कैसे आई क्योंकि उसने मौतों का विवरण नहीं दिया.
नगर पालिका कर्मचारी संघ के शास्त्री ने बताया कि क्योंकि मैला ढोने पर प्रतिबंध है इसलिए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए और पीड़ितों के परिवार 10 लाख रुपए के मुआवजे के हकदार हैं.
"लेकिन गलत आंकड़ा देकर सरकार पीड़ित परिवारों को मुआवजे और न्याय दोनों से वंचित कर रही है," उन्होंने कहा. “गिरफ्तारी या लोगों को हिरासत में लेने के कुछ उदाहरण हो सकते हैं. लेकिन उनमें से किसी को भी सजा नहीं हुई. ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार का सफाई कर्मचारियों के लिए कुछ भी अच्छा करने का कोई इरादा नहीं है.”
मामलों में की गई कार्रवाई
न्याय में देरी के बारे में शास्त्री गलत नहीं हैं. उदाहरण के लिए, पानीपत और भिवानी की स्थानीय पुलिस ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि पिछले साल बिलाल या सुनील की मौत के संबंध में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी.
जून में रवीश और अरविंद की मौत के बारे में पूछे जाने पर, झज्जर के बहादुरगढ़ की पुलिस ने कहा कि कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई क्योंकि यह एक "दुर्घटना" थी. दोनों व्यक्ति, जो मूल रूप से बिहार के रहने वाले थे, को एक सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए काम पर रखा गया था.
इसके अतिरिक्त, उनके परिवारों ने हमें बताया कि उन्हें सरकार से कोई मुआवजा नहीं मिला. हालांकि जिस ठेकेदार ने उन्हें काम पर रखा था, उसने प्रत्येक परिवार को 1.75 लाख रुपए का भुगतान किया.
"ठेकेदार भी स्थानीय था इसलिए स्थानीय ग्रामीणों का हम पर बहुत दबाव था," रवीश के भाई विकास पासवान ने कहा. "मैं बहुत अकेला महसूस कर रहा था. कोई मामला दर्ज नहीं किया गया था."
पिछले अक्टूबर फरीदाबाद के क्यूआरजी अस्पताल में हुई चार मौतों के बाद, पीड़ित परिवारों को 25-25 लाख रुपए मिले और पीड़ितों की पत्नियों को अस्पताल के कर्मचारियों के रूप में नौकरियां मिलीं. पुलिस ने उस कंपनी के मालिकों को गिरफ्तार किया जिसने चारों पीड़ितों को नौकरी पर रखा था; कंपनी का "ग्रीस ट्रैप और सीवर सम्प पिट" की सफाई सेवाओं के लिए अस्पताल के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट था.
हालांकि, नवंबर में एक स्थानीय अदालत ने आरोपी को जमानत दे दी और मामले में अस्पताल की भूमिका की जांच नहीं करने के लिए पुलिस को फटकार लगाई. आरोपी को "बलि का बकरा" बताते हुए अदालत ने कहा, "ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब सिर्फ दिखाने के लिए किया गया है कि कुछ कार्रवाई की गई है."
हिसार में, जहां पिछले अप्रैल में बुद्धा खेड़ा गांव में चार लोगों की मौत हुई थी, उकलाना पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि पीड़ितों के परिवारों और ग्रामीणों के बीच "समझौते" के बाद मामला बंद कर दिया गया था. पुरुषों में से दो सफाई कर्मचारी थे जिन्हें टैंक में प्रवेश कराया गया था; बाकि दो स्थानीय लोग थे जिन्होंने उन्हें बचाने की कोशिश की लेकिन उनकी भी मौत हो गई.
"हमने पंचायत बुलाई और सुनिश्चित किया कि परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी मिले," बुढा खेड़ा निवासी राकेश मांडा ने कहा. "बदले में, वे किसी के खिलाफ मामला नहीं चलाने पर सहमत हुए." पीड़ितों के परिवार के सदस्यों ने न्यूज़लॉन्ड्री से पुष्टि की कि उन्हें सरकार से 11 लाख रुपए का मुआवजा और राज्य सरकार के विभागों में कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी मिली है.
पुलिस अधिकारी ने कहा, "हम एक निश्चित प्रक्रिया का पालन करते हैं. एक बार एफआईआर दर्ज होने के बाद, हम पीड़ित परिवार से उनके बयान दर्ज कराने के लिए मिलने जाते हैं. अगर वे किसी पर आरोप नहीं लगाएंगे तो केस कैसे चलेगा?"
इस तरह के समझौते राज्य में आम हैं. पीड़ितों के परिवार अक्सर सरकारी मुआवजा प्राप्त करने की पुष्टि करने वाले हलफनामों पर हस्ताक्षर करते हैं और फिर मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते. उदाहरण के लिए, 2021 में, विपिन कुमार ने अपने भाई विक्रांत की हिसार के लाहौरिया चौक में एक सीवर लाइन खोलने के दौरान मृत्यु हो जाने के बाद इस तरह के एक हलफनामे पर हस्ताक्षर किए. हलफनामे में कहा गया है कि विक्रांत की मौत के लिए हरियाणा के सार्वजनिक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारी जिम्मेदार नहीं थे और विपिन उक्त अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही नहीं करना चाहते थे.
विपिन ने एक दूसरे हलफनामे पर भी हस्ताक्षर किए जिसमें कहा गया था कि विभाग ने उन्हें 15 लाख रुपए का मुआवजा दिया था और यह कि परिवार विभाग के अधिकारियों के लिए "हमेशा आभारी" था. न्यूज़लॉन्ड्री के पास दोनों हलफनामों की प्रतियां हैं.
विपिन ने न्यूज़लॉन्ड्री से पुष्टि की कि उनके परिवार को मुआवजा मिल गया है. उन्होंने कहा कि वह पूर्णकालिक सरकारी नौकरी भी चाहते हैं जिसका मौखिक तौर पर वादा किया गया था. इसके बजाय, उन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग में एक संविदात्मक नौकरी मिली लेकिन किसी दिन नियमित नौकरी पाने की उम्मीद है.
सफाई कर्मचारी आंदोलन के संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने कहा कि ये समझौते सीमांत समुदायों के खिलाफ अत्याचारों की जिम्मेदारी लेने में राज्य की नाकामी को दर्शाते हैं.
"यह जरूरी नहीं है कि ऐसे मामलों में परिवार के सदस्यों को शिकायत दर्ज करानी पड़े," उन्होंने कहा. “परिवार के सदस्य पहले से ही कमजोर हैं और अधिकारियों या प्रमुख जातियों के खिलाफ लड़ने की स्थिति में नहीं हैं. इसलिए इन मामलों में राज्य और पुलिस की जिम्मेदारी है. अगर पुलिस ने सावधानी नहीं बरती तो कई और मौतें हो सकती हैं जिनकी रिपोर्ट नहीं की जाती. पुलिस की जिम्मेदारी सीमांत समुदायों के खिलाफ इस तरह के अत्याचारों को देखना है.”
राजकीय मुआवजे पर विल्सन ने कहा, "वे इस देश के नागरिकों के मूल्य की कीमत निर्धारण कर रहे हैं. जीवन का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है. यह राज्य की पूरी तरह से विफलता के अलावा और कुछ नहीं है.”
यह महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने फरीदाबाद के क्यूआरजी अस्पताल और हिसार के बुद्धा खेड़ा गांव में हुई घटनाओं का संज्ञान लिया था. लेकिन दोनों ही मामलों में आयोग की कार्रवाई राज्य सरकार को नोटिस जारी कर रिपोर्ट मांगने तक ही सीमित थी.
न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा दायर एक आरटीआई के जवाब में एनएचआरसी ने कहा कि उसे क्यूआरजी अस्पताल मामले के संबंध में हरियाणा के डीजीपी से एक रिपोर्ट मिली है लेकिन बुद्धा खेड़ा मामले में हरियाणा के मुख्य सचिव से "अपेक्षित रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है". एनएचआरसी ने कहा कि "दोनों मामले आयोग के विचाराधीन हैं".
लेकिन क्या यह काफी है?
विल्सन ने कहा, “एनएचआरसी के पास आदेश देने की शक्ति है. जब अधिकतम सीमांत की बात आती है, तो एनएचआरसी को ऐसी घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए. यह ऐसा करता है, लेकिन यह किसी भी जांच के लिए नहीं बुलाता है. पिछले कुछ वर्षों में भारत में हजारों मौतें हुईं. एनएचआरसी इसके लिए एक विशेष आयुक्त की नियुक्ति क्यों नहीं करता है?”
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