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क्या बायो-सीएनजी गैस बन सकता है भविष्य का ईंधन?
इस साल अगस्त के महीने में पंजाब सरकार ने घोषणा की कि राज्य में संपीडित (कंप्रेस्ड) बायोगैस (सीबीजी) का व्यावसायिक उत्पादन संगरूर के भुट्टन कलन नाम के गांव से बड़े पैमाने में शुरू हो गया है. प्रतिदिन 33.23 टन की उत्पादन क्षमता वाले इस प्लांट को एशिया में सीबीजी का सबसे बड़ा प्लांट बताया जा रहा है. इसी के साथ पंजाब ऊर्जा विकास एजेंसी (PEDA) ने 42 सीबीजी प्लांट्स का आवंटन भी किया है जिसकी कुल क्षमता 492.58 टन प्रतिदिन है. इस संपीडित बायोगैस का उत्पादन खेती में उत्पन्न कचरे ओर दूसरे जैविक स्रोतों से होता है.
जब खेती का कचरा, पेड़-पौधों के अवशेष या शहरी कचरा आदि का उपघटन, बिना ऑक्सीजन के संपर्क में होता है तो बायोगैस का उत्पादन होता है. संपीडित बायोगैस का निर्माण बायोगैस की सफाई से होता है. इसके लिए उसमें मिली गैसों, जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, की मात्रा को कम कर दिया जाता है और मीथेन की मात्रा 90 प्रतिशत से अधिक होती है.
सीबीजी जिसे बायो-संपीडित प्राकृतिक गैस (बायो-सीएनजी) भी कहते हैं, अधिकांश मीथेन से बना होता है और उसमें कुछ मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड भी होती है. बायो-सीएनजी या सीबीजी का इस्तेमाल सीएनजी से चलने वाले वाहनों में, रसोई के लिए ईंधन के रूप में किया जा सकता है. साथ ही इसका इस्तेमाल सीमेंट और स्टील उद्योगों में और गैस से चलने वाले बिजली जनरेटरों, जिनसे इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्ज किया जाता है, में भी किया जाता है.
सीबीजी के नए प्लांट, भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश की तीन महत्वपूर्ण समस्याओं – बढ़ती ऊर्जा आवश्यकता, कचरे का निपटान और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी – का समाधान एक साथ करने में सक्षम हैं.
इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के एक बड़े सीबीजी प्लांट का मध्य प्रदेश के इंदौर में उद्घाटन किया. इसका विकास भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत हुआ है, जिसके अंतर्गत देश में बहुत से कचरे से ऊर्जा (गोबरधन) प्लांट बनाने की योजना है. इंदौर के इस गोबरधन प्लांट की प्रतिदिन की क्षमता 17,000 किलो सीबीजी बनाने की है, जो प्रतिदिन 550 टन कचरे का निपटान भी करने में सक्षम है. इंदौर नगर निगम ने इस सीबीजी प्लांट के साथ समझौता भी किया है, जहां निगम इस प्लांट के द्वारा उत्पादित 50 प्रतिशत सीबीजी, शहर में चलने वाली 400 बसों में इस्तेमाल के लिए खरीदेगी.
इस समझौते के अनुसार यह प्लांट बायो-सीएनजी को बाज़ार में मिल रहे सीएनजी के रेट की तुलना में 5 रुपए प्रति किलोग्राम कम पर निगम के माध्यम से शहर के सीएनजी बसों को मुहैया कराएगी. बचा 50 प्रतिशत सीबीजी खुले बाज़ार में बेचा जाएगा. इस प्लांट में सीबीजी बनाने की प्रक्रिया में जो 100 टन प्रतिदिन जैविक खाद निकलेगा उसका भी खेतों की उर्वरता को बढ़ाने में उपयोग होगा. इसके एवज में निगम इस प्लांट को निरंतर अलग किया हुआ कचरा भी देगी जिसका इस्तेमाल यह गोबरधन प्लांट बायो-सीएनजी के उत्पादन में करेगा.
साल 2015 में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने बायो-सीएनजी को ट्रांसपोर्ट क्षेत्र में इस्तेमाल करने के लिए कुछ मानक भी बनाए थे. साल 2018 में भारत के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने बायो-सीएनजी को यातायात के ईंधन के लिए भी मान्यता दी थी.
इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि देश में सीबीजी के प्रति बढ़ती जागरूकता और एक देशी नवीन ऊर्जा का साधन होने के कारण यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है.
भारत में इस क्षेत्र के लिए बनी नीतियों के कारण भी इस क्षेत्र को बढ़ावा मिलने के आसार हैं. हालांकि इस क्षेत्र की कुछ खुद की चुनौतियां भी हैं.
एक प्रभावशाली बाजार
सरकारी और छोटे निजी निवेशकों के अलावा देश की बड़ी कंपनियां भी बायो-सीएनजी में बड़े निवेश करने का सोच रही हैं. रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और अदानी न्यू इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (अनिल) ने लगभग 500 करोड़ से 600 करोड़ रुपए तक का निवेश सीबीजी के क्षेत्र में करने की योजना बनाई है.
जहां अनिल बायो-सीएनजी का इस्तेमाल अपने पहले से मौजूद गैस नेटवर्क के माध्यम से घरेलू ईंधन की जरूरतों के लिए कर सकती है, वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज़ इसका इस्तेमाल अपने ईंधन आउटलेट के जरिए मोटर गाड़ियों में ईंधन के रूप में कर सकती है. इन कंपनियों के पास पहले से मौजूद नेटवर्क इस ईंधन के प्रसार को बढ़ाने में अच्छी मदद कर सकता है.
आर्थर डी लिटिल नाम की अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन की कंसल्टेंसी कंपनी के निदेशक बृजेश सिंह कहते हैं कि जागरूकता के बढ़ने से और 2015 के बाद सरकारी नीतियों के प्रोत्साहन के कारण इस क्षेत्र को बल मिला है. उन्होंने बताया, “सीबीजी में ज्वलंत क्षमता (कैलोरिफिक वैल्यू) अधिक होती है और यह एक सस्ता और वातावरण के लिए एक अच्छा ईंधन का विकल्प है. यह घरेलू और व्यावसायिक रूप में भी अच्छे तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है.”
उन्होने यह भी बताया, “चूंकि 2030 तक देश में 4,100 सीएनजी स्टेशन होने की संभावना है, भारत में सीबीजी का बाज़ार 2.5 मिलियन डॉलर तक हो सकता है. देश में भारी उद्योग, केमिकल और खाद उद्योग, उत्पादन, शॉपिंग मॉल, रियल एस्टेट आदि गैस को ईंधन के रूप में प्रयोग करने में सबसे आगे हैं और ये अक्सर इस क्षेत्र में एक अच्छा विकल्प चाहते हैं.”
सीबीजी बन सकता है भविष्य का ईंधन
हालांकि अभी देश में सीबीजी का योगदान देश की ऊर्जा में अभी बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन आने वाले दिनों में इसका भविष्य सुनहरा लगता है.
सरकारी आंकड़ें कहते हैं कि जनवरी 2019 तक देश में 1,742 सीएनजी स्टेशन थे जो जनवरी 2022 तक बढ़कर 3,878 तक हो गए. भारत सरकार अपनी कुल ऊर्जा में प्राकृतिक गैसों का योगदान बढ़ाने की भी योजना बना रही है. भारत सरकार इसके अभी के 6.7 प्रतिशत योगदान को 2030 तक 15 प्रतिशत तक करना चाहती है, जिसके कारण आने वालें दिनों में सीएनजी ईंधन स्टेशनों की संख्या बढ़ सकती है.
भारत की नई और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के आकलन को मानें तो देश में शहरी और औद्योगिक कचरे से देश में 5,690 मेगावाट तक की बिजली बनाई जा सकती है. यह आकलन यह भी कहता है कि सिर्फ 20-25 किलो गोबर से 2 यूनिट बिजली या 400 ग्राम बायो-सीएनजी बनाया जा सकता है.
पुणे की बायो-सीएनजी का उत्पादन करने वाली कंपनी प्राइमोव इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के मालिक अतुल अकोलकर ने बताया, “बायो-सीएनजी भारत के भविष्य का ईंधन बन सकता है, जो न केवल भारत के प्राकृतिक गैसों के आयात पर आने वाले खर्च को कम कर सकता है बल्कि देश में कचरे से निपटने में भी मदद कर सकता है.” अकोलकर की कंपनी फिलहाल पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसी जगहों पर 15 टन प्रतिदिन की क्षमता तक के बायो-सीएनजी के प्लांट लगाने के तैयारी में है.
अकोलकर ने बताया, “बायो-सीएनजी नवीकरणीय ऊर्जा का एक बहुत ही स्वच्छ साधन है. इसका निर्माण कचरे से होता है और इस प्रक्रिया में जो कचरा निकलता है वो भी जैविक होता है, जिसका खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है.”
अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (आईआरईएनए) की एक रिपोर्ट के अनुसार गाड़ियों में जीवाश्म ईंधन की बजाय बायो-सीएनजी के प्रयोग से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 73 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है. कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि बायो-सीएनजी, सीएनजी की तुलना में भी करीब छह प्रतिशत कम उत्सर्जन करती है.
अब बायोगैस के निर्माण में द्वितीय श्रेणी के फीडस्टॉक का भी प्रयोग हो रहा है जो पहले नहीं हुआ करता था. इस श्रेणी में ऐसे स्रोत आते हैं जो खाद्य के स्रोत नहीं होते बल्कि अक्सर उनके अवशेष होते है जैसे फसलों के अवशेष, खेतों के दूसरे अवशेष, लकड़ी के छिलके, प्रयोग किया हुआ खाने का तेल आदि.
अकोलकर बताते हैं, “बायोगैस देश में बहुत सालों से रहा है लेकिन पहले बहुत अच्छी सफलता नहीं मिली थी. पहले इसका निर्माण प्रथम श्रेणी के फीडस्टॉक से होता था जैसे गोबर, शहरों के कचरे आदि से लेकिन द्वितीय श्रेणी के फीडस्टॉक के इस्तेमाल से बदलाव साफ है. किसी भी ईंधन की बाज़ार में सफलता उसकी मांग पर निर्भर होती है. बायो-सीएनजी का मोटर गाड़ियों में इस्तेमाल काफी आकर्षक है क्योंकि गैसों से चलने वाली गाड़ियों का बाज़ार मांग में है. यह बाज़ार आर्थिक मंदी में भी मांग में रहता है जिसके कारण बायो-सीएनजी का बाज़ार सुनहरा है.”
मांग, मानक और स्थापित ढांचे से फायदा
अदनान वानी कोअन एडवाइजरी ग्रुप में ऊर्जा विश्लेषक हैं. यह ग्रुप स्वच्छ ऊर्जा के मामलों पर शोध करता है. वानी कहते हैं कि बायो-सीएनजी को, दूसरे नवीन ऊर्जा के साधनों की तुलना में अधिक फायदा है क्योंकि इसके इस्तेमाल के लिए देश में पहले से ही बहुत से ढांचे मौजूद हैं, जबकि दूसरे नवीन ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए अलग सिस्टम बनाने में अतिरिक्त खर्च करने की जरूरत पड़ती है.
वानी बताते हैं, “भारत में अभी सीएनजी से चलने वाले वाहनों की अच्छी मांग है. बहुत से ऐसे वाहनों की बड़ी कंपनियां हैं जिन्होंने अब तक इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ रुख नहीं किया है, जैसे मारुति सुजुकी जो अब तक सीएनजी से चलने वाले वाहनों के विक्रय पर ही ज़ोर दे रही है.” उनका मानना है कि चूंकि बायो-सीएनजी को सीधे तौर पर सीएनजी से चलने वाले वाहनों में डाला जा सकता है, इसलिए देश में सीएनजी स्टेशनों का बढ़ता नेटवर्क बायो-सीएनजी के वितरण में फायदेमंद साबित होगा.
वानी ने बताया, “इसका इस्तेमाल सरकार अपने नवीन ऊर्जा के विस्तार के लक्ष्यों को पाने में भी कर सकती है और देश में कार्बन के उत्सर्जन में कमी लाने में भी कर सकती है.”
निवेश और कचरे को अलग करना क्यों है जरूरी
देश के अलग अलग हिस्सों में काम कर रहें विशेषज्ञों का मानना है कि बायो-सीएनजी (सीबीजी) को और बढ़ावा देने के लिए देश में अच्छे निवेश और गीले और सूखे कचरे को अलग करना बहुत जरूरी है. संजीव कुमार कर्मी, गुजरात के आनंद में स्थित सरदार पटेल नवीकरणीय ऊर्जा संस्थान में प्रमुख वैज्ञानिक हैं. उन्होंने बताया कि भारत में बायोगैस का एक अच्छा भविष्य है क्योंकि देश एक सम्पन्न कृषि अर्थव्यवस्था है और यहां अच्छी संख्या में मवेशी हैं.
कर्मी ने बताया, “देश के ग्रामीण इलाकों में बहुत से बायोगैस प्लांट काम नहीं कर रहे हैं क्योंकि इनका प्रबंधन ठीक से नहीं हुआ है. अगर हमें देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ाना है तो इन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत है. शहरी इलाकों में भी बायोगैस का एक अच्छा बाज़ार है क्योंकि यहां उत्पन्न होने वाला कचरा भी अच्छी मात्रा में है और आने वालें दिनों वो बढ़ने ही वाला है.”
कर्मी बताते हैं, “बायोगैस प्लांट की सफलता के लिए फीडस्टॉक के स्रोत की निकटता बहुत जरूरी है. देश में कई बार नगर निगम के कचरे का इस्तेमाल बायोगैस बनाने में हुआ है, लेकिन कई बार यह लंबे समय तक नहीं चल पाता क्योंकि गीले कचरे और सूखे कचरे का अलग-अलग मिलना मुश्किल होता है.”
गीले और सूखे कचरे को ठीक तरीके से अलग न होने की वजह से इसका इस्तेमाल बायोगैस बनाने में नहीं हो पता है. नतीजतन कई शहरों में कचरे के ढेर बढ़ते जा रहे हैं और बायोगैस का उत्पादन नहीं हो पा रहा है.
देश के बहुत से शहरी इलाकों में कचरे का बड़ा अंबार (लैंडफिल) कई जगहों पर देखने को मिल जाता है. ऐसे कचरे के ढेर अक्सर मीथेन जैसी गैसों का उत्सर्जन करते हैं. शोध बताते हैं कि मीथेन 100 सालों में कार्बन डाइऑक्साइड के तुलना में गर्मी को 25 प्रतिशत ज्यादा सोखता है, जो ग्रीन हाउस प्रभाव को और बढ़ा सकता है.
(साभार- MONGABAY हिंदी)
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