Opinion
मुसलमानों, वामपंथियों या धर्मनिरपेक्षतावादियों पर कभी भरोसा न करें: क्यों द कश्मीर फाइल्स, शिंडलर्स लिस्ट नहीं है
विवेक अग्निहोत्री ने एक बार हमसे कहा था कि तथ्य, तथ्य नहीं होते. यह कहते हुए उनका लहजा कुछ ऐसा था मानो उन्होंने कोई दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लिया है जिसे वो अब हमारे जरिए इस संसार तक पहुंचा रहे हैं.
किसी प्रस्तुत तथ्य को देखने के अनगिनत तरीके हैं. जो चीज तथ्यों को ज्ञान से अलग करती है वह है, संदर्भ. यह संदर्भ या आख्यान अथवा नैरेटिव हमें तथ्यों को आपस में एक साथ बुन कर देखने में मदद करते हैं - और ये आख्यान/नैरेटिव्स ही हैं जो इन तथ्यों को हमारे सीमित मानव मस्तिष्क के लिए सुगम बनाते हैं. फिर चाहे नाटक हो या राजनीति इनके केंद्र में आख्यान ही होते हैं. और अगर इनका इस्तेमाल जानबूझकर भ्रामक तरीके से किसी पक्षपातपूर्ण उद्देश्य के लिए किया जाए तो इसे दुष्प्रचार कहना ज्यादा सटीक होगा.
अग्निहोत्री ने अपनी बहुचर्चित फिल्म द कश्मीर फाइल्स में कश्मीरियों के पलायन के बारे में कई तथ्य सही दिखाए हैं. फिल्म में दिखाई गई हत्याएं वास्तव में हुईं हैं, ठीक इसी तरह पंडितों को खौफ के साए में जीते हुए दिखाया जाना भी सच्चाई ही है. फिर भी फिल्म एक खास तरीके की उथली और शोषक परियोजना की तरह चलती है जहां कहानी कहने का उद्देश्य पंडितों की तकलीफों पर रोशनी डालने के बजाय अग्निहोत्री जी की विश्वदृष्टि पर प्रकाश डालने के लिए एक स्प्रिंगबोर्ड के रूप में पंडितों की इस पीड़ा का इस्तेमाल करना है.
ऐसी विश्वदृष्टि सत्ता में बैठे हिंदू राष्ट्रवादियों के साथ गठजोड़ करने के लिए भी है, जिसका पता इस बात से लगता है कि फिल्म को कई भाजपा शासित राज्यों में टैक्स-फ्री कर दिया गया है. इसी कारण प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से फिल्म की प्रशंसा की और इसके आलोचकों की "जमात" की निंदा भी की. फिल्म की मार्केटिंग अब भारत के सबसे बड़े मार्केटर द्वारा की जा रही है.
आखिर यह किस तरह की विश्वदृष्टि है?
इसका सर्वप्रथम पहलू ये है कि घाटी के सभी मुसलमान राजनेताओं के बीच कोई अंतर नहीं है, ये सभी जन्मजात हिंदू विरोधी हैं और हिंदुओं के "नरसंहार" में शामिल हैं. मुख्यमंत्री के तौर पर फारूक अब्दुल्ला को जेकेएलएफ के उग्रवादियों के साथ बैठक और सहयोग करते हुए दिखाया गया है. आईएएस ब्रह्म दत्त (मिथुन चक्रवर्ती द्वारा अभिनीत) कहते हैं कि उनकी पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस, असल में उग्रवादियों का एक राजनीतिक मोर्चा थी.
अगर यह सच्चाई है तो फिर नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ताओं पर उग्रवादियों ने क्यों हमला किया और उनकी हत्याएं क्यों कीं? फिल्म इस बात का जवाब भी नहीं देती कि आखिर क्यों फारूक अब्दुल्ला उग्रवादी तत्वों के साथ सहयोग करेंगे जिन्होंने धीरे-धीरे उनकी सारी ताकत और वैधता ही छीन ली थी और इस सबका अंत उनके इस्तीफे से हुआ था.
जैसा कि 1989 में ट्रिब्यून के संपादक वीएन नारायण ने उल्लेख किया था, घाटी में अशांति फैलाने के प्रति फारूक अब्दुल्ला की नीति असल में काफी दमनकारी थी: "उन्होंने अपना भरोसा राज्य पुलिस बल से हटा केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल पर जताने की कोशिश की है. सीआरपीएफ ने शहर में एक शांति के एक भ्रामक माहौल वाली स्थिती बना दी है...बिना किसी आरोप के गिरफ्तारियों और लोगों को हिरासत में लेने के मामलों में इजाफा हुआ है. ऐसे मामलों की संख्या राज्य में चरमपंथियों की संख्या के आधिकारिक दावे के अनुपात से बहुत अधिक है."
इसी तरह उग्रवादियों को भी एक ऐसी भीड़ की तरह दिखलाया गया है जिनमें आपस में कोई अंतर करना बहुत मुश्किल है. आजादी के समर्थक जेकेएलएफ और पाकिस्तान समर्थक इस्लामी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन में कोई अंतर नहीं है. यहां तक कि ऐसा भी दिखाया गया है कि उग्रवादियों के बीच कोई राजनीतिक मतभेद भी नहीं हो सकते क्योंकि उनकी खुद की कोई राजनीतिक शिकायत या आकांक्षा ही नहीं है - ये सभी सिर्फ हिंदू काफिरों के प्रति नफरत से ही प्रेरित हैं. दरअसल, द कश्मीर फाइल्स में यासीन मलिक और फारूक अहमद डार (बिट्टा कराटे) को एक किरदार को बनाने के लिए आपस में जोड़ा दिया गया है, जो कि कहानी का मुख्य खलनायक है.
जहां तक कश्मीर की नागरिक आबादी की बात है उन्हें भी पूरी तरह काफिरों के उत्पीड़न के अभियान में लगा हुआ दिखाया गया है. उनकी महिलाएं कश्मीरी महिलाओं का राशन गिरा देती हैं; उनके मर्द अपने पड़ोसियों की जमीन-जायदाद पर नजर रखते हैं और उन जायदादों को उग्रवादियों को बेच देते हैं; उनके धार्मिक नेता ऐसे कामुक और पतित लोग हैं जो अपनी यौन इच्छाओं के लिए कश्मीरी विधवाओं की मांग करते हैं; उनके बच्चे, पंडित बच्चों को इस्लाम समर्थक नारे लगाने के लिए पीटते हैं. मैं फिर से यही कहूंगा कि इनमें कुछ सच्चाई भी हो सकती है. लेकिन ऐसा एक भी दृश्य नहीं है जहां एक कश्मीरी मुसलमान को द्वेष और नफरत के अलावा किसी और चीज से प्रेरित दिखाया गया हो.
अग्निहोत्री कह सकते हैं कि यह इस्लामोफोबिया नहीं है, यह कश्मीरी मुसलमानों की असलियत है: वे सभी कपटी, आक्रामक, अति कामुक, कट्टरपंथी हैं. और यह केवल एक संयोग भर है कि हिंदू राष्ट्रवाद के पवित्र ग्रंथों में मुस्लिम व्यक्ति का एक मानक इस्लामोफोबिक खाका भी बिलकुल ऐसा ही रचा हुआ होता है.
इस विश्वदृष्टि का दूसरा पहलू यह है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों ने अपनी राजनीति के लिए कश्मीरी पंडितों का सौदा कर दिया क्योंकि वे कश्मीरी मुसलमानों का "तुष्टिकरण" करना चाहते थे. मिथुन चक्रवर्ती हमें बताते हैं कि राजीव गांधी ने पंडितों की मदद इसलिए नहीं की क्योंकि वो फारूक अब्दुल्ला के साथ अपनी दोस्ती को खराब नहीं करना चाहते थे. यह और बात है कि पलायन के दौर में भाजपा के समर्थन वाली तत्कालीन सरकार का नेतृत्व वीपी सिंह कर रहे थे. इस महत्वपूर्ण तथ्य का फिल्म में एक बार भी जिक्र नहीं किया गया है.
साथ ही फिल्म में यह भी दिखलाया गया है कि एक धर्मनिरपेक्ष सरकार के प्रधानमंत्री ने अपने कार्यालय में फिल्म के मुख्य खलनायक को कश्मीर पर चर्चा करने के लिए बुलाया था. यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह वही खूंखार उग्रवादी था जिसने बिना पछतावे के मीडिया के सामने शेखी बघारते हुए कहा था कि उसने 20 से अधिक कश्मीरी पंडितों को मार डाला जिसमें नागरिक कश्मीरी पंडित भी शामिल हैं. फिल्म में यही वो मौका है जहां यासीन मलिक और बिट्टा कराटे का घालमेल करने की कला सबसे ज्यादा लाभकारी साबित होती है. यह पूर्व हाई-प्रोफाइल उग्रवादी यासीन मलिक था, जिसने हिंसा को त्याग दिया था और दावा किया था कि उसने गांधीवादी तर्ज पर एक शांतिपूर्ण समाधान के लिए खुद को समर्पित कर दिया है. यही वो आदमी है जो मनमोहन सिंह से मिला था न कि बिट्टा कराटे जो कि उस समय जेल में था.
फिल्म यह भी बताती है कि पिछला कोई भी प्रधानमंत्री अनुच्छेद 370 को हटाने जैसे कड़े फैसले नहीं ले सकता था क्योंकि मुख्य खलनायक के शब्दों में, वे चाहते थे उनसे खौफ खाने के बजाय मुहब्बत की जाए हालांकि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मामले में पिछले प्रधानमंत्रियों से अलग हैं.
फिल्म के अनुसार अनुच्छेद 370 कश्मीरी पंडितों के पलायन से बहुत साफ तौर पर जुड़ा हुआ है. फिल्म में दूसरे हिस्से के दौरान पूरे समय अनुपम खेर की मुख्य राजनीतिक मांग इसको हटाने को लेकर ही है. वास्तव में कश्मीरियों का पलायन राज्यपाल के शासन में हुआ, उस वक्त जब कि भारत द्वारा नियुक्त व्यक्ति को असीमित शक्तियां प्राप्त थीं और उसके काम में बाधा डालने वाली न तो कोई निर्वाचित राज्य विधानसभा ही थी और न ही वो भारत की संसद द्वारा बेबस या लाचार था.
इस विश्वदृष्टि का तीसरा और सबसे खास पहलू यह है कि भारतीय बौद्धिक वर्ग और उसमें भी खास तौर से वो वामपंथी जिनका प्रतीक जेएनयू परिसर है, नैतिक रूप से दिवालिया हैं. फिल्म का यह हिस्सा निश्चित तौर पर अग्निहोत्री की विशिष्टता है. हमें यह याद रखना चाहिए कि उन्होंने ही "अर्बन नक्सल" शब्द गढ़ा था. यहां तक कि उन्होंने इस विषय पर एक किताब भी लिखी थी. बाद में यह शब्द उनसे प्रधानमंत्री मोदी ने भी उधार लिया और राष्ट्र विरोधी असंतुष्ट लोगों और बुद्धिजीवियों का वर्णन करने के लिए चुनावी भाषणों में इसका इस्तेमाल किया. यह कहना कि द कश्मीर फाइल्स में वामपंथियों का चित्रण अति विद्रूप और उपहासास्पद है, शायद इस फिल्म के प्रति बहुत उदारता होगी.
यह कहने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि इस फिल्म में वामपंथियों को इस तरह से दिखाया गया है कि वे भारत के बारे में हर चीज से घृणा करते हैं, यहां आत्म-घृणा करने वाले हिंदू हैं जो मुसलमानों से प्यार करते हैं. और ऐसे लोगों का अस्तित्व अभिजात संस्थानों पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए नकली उत्पीड़न के नैरेटिव के इर्द-गिर्द घूमता है. मुख्य पात्र के तौर पर उन्होंने एक गुमराह किए जा चुके युवा कश्मीरी पंडित को दिखाकर दर्शकों को लुभाने का प्रयास किया है. यह युवा कश्मीरी पंडित भी इन्हीं वामपंथियों की सेना का सिपाही बनना चाहता है लेकिन उसे मिथुन और हताश हुए पंडितों के समूह द्वारा सही रास्ते पर ले जाया जाता है. यहां पर भी यासीन मलिक के साथ वामपंथी बुद्धिजीवियों के मेलजोल को जानबूझकर बिट्टा कराटे के समर्थन के रूप में चित्रित किया गया है.
कोई भी यह जायज तर्क दे सकता है कि बौद्धिक और राजनीतिक वामपंथ ने कश्मीरी पंडितों के मसले को पर्याप्त तवज्जो नहीं दी, लेकिन फिल्म में इस तरह से उनका चित्रण ट्विटर पर 'अर्बन नक्सल्स' के खिलाफ अग्निहोत्री की शेखी का स्क्रीन संस्करण है. जिसका असलियत से कोई लेना-देना नहीं है.
अग्निहोत्री के विश्वदृष्टि के इन तीन पहलुओं को ही चित्रित करने में अधिकांश फिल्म निकल जाती है: कश्मीरी मुसलमानों, धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं और वामपंथी बुद्धिजीवियों के बारे में उनका दृष्टिकोण, फिल्म की मुख्य प्रेरक शक्ति दर्शकों को कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा के बारे में जागरूक करने के बजाय उन वर्गों को खलनायक के रूप में चित्रित करना है जो देश के भीतर हिंदू राष्ट्रवादियों के दमन के लिए सबसे पहले निशाने पर हैं. कश्मीरी पंडितों की भूमिका केवल बेजान लाशों के तौर पर काम करने की है जिनके द्वारा कुछ विद्रूप दृश्यों को एक साथ पिरोया जा सकता है. अगर आप कश्मीरी पंडितों की जिंदगी की एक संजीदगी भरी कहानी देखना चाहते हैं; कि पलायन से पहले उनकी जिंदगी कैसी थी?; कैसे पलायन ने उनकी सामूहिक पहचान को प्रभावित किया?; वे अपने उत्पीड़न की यादों से कैसे निपटते हैं?; या खुद पर बीती इस त्रासदी के बावजूद कैसे उन्होंने जिंदगी में वापसी कर ली है?; तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है.
कई साल पहले इंटरनेट पर दिया गया एक जवाब "कश्मीरी पंडितों का क्या" लगभग एक मजेदार मीम बन गया था. इसके जरिए सरकार किसी भी असुविधाजनक राजनीतिक मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने के लिए कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा का हवाला देती थी. यह फिल्म भी बिल्कुल उस मीम की ही तरह है. यह एक शोषक उपकरण के समान है जो सरकार के लिए असुविधाजनक पॉलिटिकल नैरेटिव्स को गलत ठहराने के लिए कश्मीरी पंडितों के उत्पीड़न के मामले का दुरुपयोग करता है और साथ ही सरकार के पक्ष में पॉलिटिकल नैरैटिव को मजबूत करता है.
कल रात मैंने यह फिल्म देश राजधानी के एक व्यस्त थिएटर में देखी जहां संवाद दक्षिणपंथी नारों और बीच-बीच में आने वाली तालियों की गड़गड़ाहट की आवाज के साथ चल रहे थे. अनुपम खेर की अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग के लिए सबसे जोरदार तालियां बजीं. फिल्म के अंत में जैसे-जैसे क्लोजिंग क्रेडिट स्क्रीन पर उतर रहे थे भीड़ में से पुरुषों का एक गुट अपनी सीटों पर बैठे-बैठे एक जूलूस में बदल गया. भारतीय झंडे लहराते हुए उन्होंने कई तरह के परेशान कर देने वाले नारे लगाए: "ठोक के देंगे आजादी", "अफजल को दी है आजादी", "जेएनयू को देंगे आजादी", "जिस हिंदू का खून न खौला खून नहीं वो पानी है", "जय श्री राम", और "हर हर महादेव".
मुझे शक है कि उनमें से कई आरएसएस के कार्यकर्ता थे जो अक्सर सिनेमाघरों में आकर फिल्म देखने आने वाले लोगों जैसा बनने का ढोंग कर रहे थे. और वाकई, थिएटर के बाहर मौजूद एक और भीड़ ने आरएसएस के समर्थन में नारे लगाए: "एटम बम, एटम बम, आरएसएस एटम बम". दर्शकों की भीड़ में से भी कई लोगों ने वापस यही नारे लगाकर उनका जवाब दिया. इस फिल्म के जरिेए बिलकुल यही असर पैदा करने की ही तो कोशिश की गई थी - यहां पर आरएसएस और विवेक अग्निहोत्री एक हैं.
सोशल मीडिया पर इस फिल्म की तुलना शिंडलर्स लिस्ट से की जा रही है. लेकिन शिंडलर्स लिस्ट देखने के बाद एक आम इंसान जो संदेश लेता है, वह है "फिर कभी नहीं" - फिर कभी अल्पसंख्यकों के प्रति किसी तरह की कट्टरता को इस हद तक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि वह बर्बर हिंसा के तांडव में फट पड़े. लेकिन इस फिल्म से एक साधारण हिंदू को जो संदेश लेने की उम्मीद की जाती है (जैसा कि सिनेमाघरों से आने वाले कई वायरल वीडियो से प्रमाणित है) वह एक दूसरे तरह का "फिर कभी नहीं" है - मुस्लिम, धर्मनिरपेक्षतावादी या वामपंथी पर फिर कभी भरोसा नहीं करना है. ऐसा न हो कि बंगाल, केरल या भारत के किसी दूसरे हिस्से में भी हिंदुओं के साथ फिर वही दोहराया जाए जो कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुआ.
यह बहुसंख्यकवादी राजनीति का खंडन और अल्पसंख्यकों पर उसके दुष्परिणामों का वर्णन नहीं है बल्कि उसी बहुसंख्यकवादी राजनीति और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को जायज ठहराने की एक कोशिश है - नाजी दुष्प्रचारकों के नैतिक मापदंडों के साथ बनाई गई शिंडलर्स लिस्ट.
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