Assembly Elections 2022
मणिपुर में क्यों हो सकता है एक नए मुख्यमंत्री का उदय?
चुनाव की कमर कस रहे मणिपुर राज्य के पहाड़ी इलाकों में 25 फरवरी को मतदाताओं को चिट्ठी प्राप्त हुई. इस ‘ओपन लेटर’ में एक ‘अपील’ के रूप में स्पष्ट किया गया कि किस पार्टी को वोट देना है.
मीडिया में रिपोर्ट किया गया यह पत्र, कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (केएनओ) के नाम से प्रचलित उग्रवादी संगठनों के सामूहिक संगठन द्वारा जारी किया गया था, जिसका कुकी नेशनल आर्मी एक सशस्त्र विंग भी है. इस पत्र में संगठन ने स्पष्ट रूप से कहा कि वोट भाजपा को देना है. वर्ना, "इस अपील के विपरीत काम करने वाले किसी भी व्यक्ति या संगठन को कुकी हितों के खिलाफ काम करने वाला माना जाएगा."
मतदाताओं को यह धमकियां, दिल्ली में गृह मंत्रालय के साथ बातचीत कर रहे एक समूह से मिल रही थीं. यह तथ्य बाद में विपक्षी कांग्रेस पार्टी द्वारा एक ज्ञापन में चुनाव आयोग के ध्यान में लाया गया, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.
गौरतलब है कि केएनओ ने 2019 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा के लिए खुले तौर पर "प्रचार" किया था. इस दौरान उन्होंने कथित तौर पर ग्राम प्रधानों को उनके पसंदीदा उम्मीदवार, के. बेंजामिन माटे को 90 प्रतिशत से कम वोट मिलने पर ‘गंभीर परिणाम’ भुगतने की धमकी दी थी. उग्रवादी समूहों द्वारा उनकी उम्मीदवारी की सिफारिश के बाद, माटे ने भाजपा से टिकट पाने के लिए भीतरी प्रतिद्वंद्वियों को मात दी थी. इनमें से एक समूह जोमी रीयूनिफिकेशन ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष ने, गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखा- जिसमें कहा गया था कि "अगर बाहरी मणिपुर निर्वाचन क्षेत्र से श्री एच सोखोपाओ बेंजामिन माटे को भाजपा पार्टी का टिकट दें… तो वे बड़े आभारी रहेंगे."
माटे को भाजपा का टिकट मिल गया. हालांकि खुली धमकियों के बावजूद वह चुनाव हार गए. उन्हें नागा पीपुल्स फ्रंट के उम्मीदवार लोरहो फोजे ने मात दी. हालांकि माटे को जनजातियों के व्यापक समूह, जिससे वह स्वयं भी आते हैं (कुकी, चिन और जोमी) का समर्थन प्राप्त था, लेकिन लोरहो को नागा जनजातियों और उनसे जुड़े हुए उग्रवादी संगठनों का समर्थन प्राप्त था. जिनमें नागालैंड के इसाक-मुइवा गुट की राष्ट्रीय समाजवादी परिषद शामिल है; यह इस तरह का सबसे ताकतवर समूह है, जो 1997 से भारत सरकार के साथ शांति-वार्ता का हिस्सा भी है.
मणिपुर की राजनीति काफी हद तक सांप्रदायिक है. सत्ता के लिए संघर्ष राज्य के तीन प्रमुख समुदायों, मैतेई, नागा और कुकी के बीच है. मणिपुर की पहाड़ियों में राजनीति में मुख्य प्रतिद्वंद्विता, चाहे वह खुलकर हो या भूमिगत, दोनों स्तर पर कूकी और नागा जनजातियों के समूहों के बीच है. मणिपुर विधानसभा की 60 सीटों में से लगभग 10 सीटें क्रमशः कुकी और नागा जनजातियों के वर्चस्व वाली पहाड़ियों में हैं, जबकि शेष 40 इंफाल घाटी में हैं. जहां मुख्य रूप से हिंदू, गैर-आदिवासी मैती समुदाय बहुतायत में हैं. घाटी की तीन सीटों में एक बड़ी मुस्लिम आबादी है, ये मुख्य रूप से स्थानीय मैती मुसलमान हैं, जिन्हें पंगल के नाम से जाना जाता है. इंफाल के पास की पहाड़ियों में एक सीट कांगपोकपी में गोरखाओं की भी एक बड़ी आबादी है.
आबादी में संख्याबल को देखते हुए, मणिपुर के मुख्यमंत्रियों का मैती समुदाय से आना आम बात है. कांग्रेस के पूर्व सीएम ओकराम इबोबी सिंह और भाजपा के मौजूदा सीएम बीरेन सिंह दोनों ही मैती हैं. नेशनल पीपुल्स पार्टी के युमनाम जॉयकुमार सिंह भी मैती ही हैं. भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए बिरेन सिंह के प्रतिद्वंद्वी बिस्वजीत सिंह भी मैती समुदाय से ही आते हैं.
पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में विचारधारा का ज्यादा महत्व नहीं है. केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के साथ गठबंधन करने के लिए विधायकों की दल-बदली आम बात है. उदाहरण के लिए 2014 में, कांग्रेस ने अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में 60 में से 44 सीटें जीती थीं. लेकिन 2016 तक, इन 44 कांग्रेस विधायकों में से 43 भाजपा में शामिल हो गए थे.
ऐसा ही कुछ मणिपुर में भी हुआ जहां कांग्रेस 2017 में पिछले विधानसभा चुनावों के बाद, 60 सीटों वाली विधानसभा में 28 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी. भाजपा 21 सीटों के साथ बहुत पीछे थी. लेकिन चार-चार सीटों वाले एनपीपी और एनपीएफ के समर्थन से, भाजपा सरकार बनाने में कामयाब रही. तब से लेकर अब तक, कांग्रेस से पलायन, जिसमें पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष भी शामिल हैं, ने भाजपा की संख्या में बढ़ोतरी की है.
हालांकि सभी विधायकों का भाजपा के रास्ते जाने के बावजूद, बीरेन सिंह की सरकार का सफर काफी अस्थिर रहा है. दो साल पहले सरकार लगभग गिरती हुई लगी थी, जब एनपीपी के सभी चार विधायकों समेत नौ विधायकों द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद वह अल्पमत में आ गई थी.
इसकी शुरुआत तब हुई जब सिंह ने, अपने डिप्टी, एनपीपी के जॉयकुमार सिंह और अन्य एनपीपी मंत्रियों को उनके विभागों से हटा दिया था. इसके तुरंत बाद गृह मंत्री अमित शाह, असम के सीएम हेमंत बिस्वा शर्मा, मेघालय के सीएम और एनपीपी प्रमुख कोनराड संगमा के साथ-साथ, मणिपुर के आपस में भिड़ रहे नेताओं के साथ गहन बातचीत हुई, और सरकार किसी तरह बच गई. इससे एक साल पहले जून 2019 में सिंह और भी बड़े विद्रोह से बच गए थे, जब राज्य के 21 भाजपा विधायकों में से 17 ने मणिपुर भाजपा नेतृत्व में बदलाव की मांग की थी. यह मुद्दा महीनों तक चला किंतु अमित शाह और नरेंद्र मोदी के समर्थन की बदौलत, सिंह किसी तरह बच गए थे.
इसलिए इन चुनावों में भाजपा एक बंटा हुआ पक्ष है. उम्मीदवारों की घोषणा के बाद, टिकट के इच्छुक निराश लोगों ने पार्टी छोड़ दी और उनके साथ इन नेताओं के हजारों समर्थकों का पलायन भी हुआ. कहीं-कहीं सिंह और मोदी के पुतले जलाए गए, और इस्तीफा देने वालों ने कुछ पार्टी कार्यालयों को तहस-नहस कर दिया. इन असंतुष्ट, अस्वीकृत भाजपा उम्मीदवारों ने अब मणिपुर में पार्टी के किसी न किसी प्रतिद्वंदी का हाथ थाम लिया है. जिसमें इसकी सहयोगी एनपीपी और हाल ही में पलायन के बाद राज्य में लगभग रातों-रात उभरी, बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) शामिल हैं. यह एक ऐसी पार्टी है जिसने मणिपुर में पिछला विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ा था और लगभग एक महीने पहले तक उसकी नामलेवा उपस्थिति तक नहीं थी. अब वह 38 सीटों पर चार मौजूदा और कई पूर्व विधायकों समेत अपने उम्मीदवार उतार रही है. दिलचस्प बात यह है कि सिंह को अपने कई हाई-प्रोफाइल उम्मीदवारों के विरोध के बावजूद, जेडीयू ने मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा किया है.
कम से कम पांच पार्टियों, भाजपा, कांग्रेस, एनपीपी, एनपीएफ और जेडीयू की मौजूदगी को देखते हुए, जिन सभी से कई सीटें जीतने की उम्मीद की जा सकती है - किसी भी एक पार्टी के अपने दम पर बहुमत ला पाने की संभावना कम दिखाई देती है. त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में कई जोड़-तोड़ और समीकरण संभव हो जाते हैं. उदाहरण के लिए, संगमा के नेतृत्व वाली मेघालय की एनपीपी सरकार को वर्तमान में भाजपा और कांग्रेस, दोनों के विधायकों का समर्थन होने का अनूठा गौरव प्राप्त है. यह संभव है कि मणिपुर में एनपीपी कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के पुराने सहयोगी जॉयकुमार सिंह के नेतृत्व में गठबंधन करने के लिए तैयार हों.
इसी तरह स्थानीय मामलो पर नजर बनाए रखने वाले जेडीयू को, मणिपुर में भाजपा की ‘बी-टीम’ के रूप में देख रहे हैं. जिसका मुख्य उद्देश्य उन लोगों को जगह देना है जो किसी कारणवश भाजपा के टिकट पर खड़े नहीं हो सकते, लेकिन भाजपा सरकार का समर्थन कर सकते हैं.
पूर्वोत्तर भारत के राजनेताओं का केंद्र में सत्ताधारी पार्टी का समर्थन करने की प्रवृति (क्योंकि सरकारी फंड वहीं से आते हैं) का मतलब है कि भाजपा को फायदा होगा, भले ही वे दूसरे स्थान पर रहें. वैसा ही जैसा पिछली बार भी हुआ था. उग्रवादी समूह, जिनमें से कई भारत के गृह मंत्रालय के साथ लंबे समय से जुड़े हुए हैं, भी ऐसा ही करते दिखते हैं. इसलिए त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में लामबंदी इस बात पर निर्भर करेगी कि मुख्यमंत्री कौन होगा.
मणिपुर में व्यक्तित्व और अहंकार का बहुत महत्व है. मौजूदा मुख्यमंत्री बीरेन सिंह, एनपीपी जैसे अपने सहयोगियों और उन्हीं के द्वारा कांग्रेस के दलबदलुओं से भरी गई भाजपा में कई लोगों बीच अलोकप्रिय हैं. वे खुद भी कांग्रेस से आए हैं. त्रिशंकु फैसले के आने के बाद अगर नए सौदे होते हैं, तो संभावित सहयोगियों द्वारा उनके बच जाने के चमत्कारी हुनर को एक नई चुनौती मिलेगी.
बहुमत के अभाव में मणिपुर में एक नए मुख्यमंत्री का उदय हो सकता है.
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