Opinion
क्यों मीडिया को राहुल के भाषण में 'दूसरे भारत' की ओर ध्यान देना चाहिए?
केंद्रीय बजट के जवाब में 2 फरवरी को संसद में राहुल गांधी के भाषण को इंडियन एक्सप्रेस, टेलीग्राफ और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे कुछ अखबारों ने पहले पन्ने पर छापा. लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया (टीओआई) के मुंबई संस्करण और द हिंदू ने उसे यह जगह नहीं दी.
जहां हिंदू ने इसे 8वें पन्ने पर दो कॉलम में समेट दिया, वहीं टीओआई का जो संस्करण मैंने पढ़ा उससे यह पूरी तरह नदारद था. यह एक महत्वपूर्ण भाषण था, चाहे आप उनकी बात से सहमत हों या नहीं. फिर क्या वजह थी कि इसे दबाया गया, या पूरी तरह से अनदेखा किया गया?
जिन अखबारों ने उसे रिपोर्ट किया, उन्होंने राहुल के भाषण का मुख्य बिंदु उठाया जिसमें उन्होंने दो भारत होने का जिक्र किया था, एक अमीरों का और दूसरा गरीबों का.
भारत में असमानता पर ऑक्सफैम की रिपोर्ट के आंकड़ों को देखते हुए तो अब यह बहस का मुद्दा भी नहीं लगता. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की 77 प्रतिशत संपत्ति पर देश के 10 प्रतिशत सबसे अमीर लोगों का कब्जा है. और जानकारी के अनुसार 2018 से 2022 के बीच, भारत में एक दिन में 70 नए करोड़पति पैदा हुए हैं.
गरीबों का वह दूसरा भारत, जिसकी झलक भी आर्थिक सर्वेक्षण और बजट के बाद के दिनों में पूरे मीडिया में मुश्किल से मिली. अखबारों के पन्ने दर पन्ने रंगीन ग्राफिक्स और चित्रों के साथ बजट की विशेष रिपोर्टिंग और टिप्पणियों को समर्पित थे. जाहिर है, उद्योग और बाजारों की प्रतिक्रियाओं को सबसे अधिक स्थान दिया गया था.
कितने अखबारों ने अपने पत्रकारों को गरीब लोगों से बात करने के लिए भेजा, यह पूछने के लिए कि बजट उनके लिए मायने रखता भी है या नहीं?
1980 के दशक में, जब निजी टेलीविजन चैनल और सोशल मीडिया मौजूद नहीं थे, प्रिंट मीडिया में एक परंपरा की तरह बजट पर आम जनता के विचार लिए जाते थे. बेशक, यह विचार अक्सर संबंधित समाचारपत्र के कार्यालय के बाहर बैठने वाले सिगरेट और पान विक्रेता के होते थे. लेकिन कम से कम यह जानने की कोशिश तो की जाती थी कि आम लोग क्या सोचते हैं.
स्पष्ट रूप से आज की मीडिया को यह पता है कि ऐसे लोगों से उनकी दुकान नहीं चलेगी, तो फिर उन्हें जगह क्यों दी जाए भला?
जिस दिन बजट पेश किया गया, मैंने मुंबई के एक आलीशान इलाके के फुटपाथ पर दो लोगों से बात की. शंकर, एक मोची जो मूल रूप से मध्य प्रदेश के सतना जिले के रहने वाले हैं. और श्रीनाथ, जो केले बेचते हैं और उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) जिले से हैं. दोनों ही दो दशक से अधिक समय से यहां हैं. शंकर कहीं और कमरा लेकर रहते हैं; जबकि श्रीनाथ अपने स्टॉल के बगल में फुटपाथ पर ही सोते हैं.
जब मैंने बजट का जिक्र किया तो दोनों को ही कोई अंदाजा नहीं था कि मैं किस बारे में बात कर रही हूं. मैंने पूछा कि क्या वह जानते हैं, बजट हर साल आता है? दोनों ने कहा नहीं.
मैंने संक्षेप में उन्हें इसके बारे में बताया. श्रीनाथ मेरे पूछे गए किसी भी प्रश्न पर टिप्पणी करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. उन्होंने कहा, "इन नेताओं के कुछ भी कहने से हमारे जीवन पर क्या फर्क पड़ता है? हम मुश्किल से जी रहे हैं." शंकर ने भी यही भावनाएं प्रकट करते हुए कहा कि उनके गांव में लोगों के पास कोई काम नहीं है. उनके पास फुटपाथ बैठ कर मोची का काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
मुझे पता है कि केवल दो लोगों से बात करना काफी नहीं है. लेकिन इस दूसरे भारत के साथ कोई भी बातचीत, भले ही वह खबरों के लिए न हो, हमें याद दिलाती है कि इस देश के एक बड़े तबके के लिए, टेलीविजन पर वार्षिक केंद्रीय बजट पर जोरदार चर्चाओं या अखबार में छपे उम्दा लेखों का महत्व कम ही है.
राहुल गांधी ने जो कहा उस पर बहस होगी, और विडंबना यह है कि भले ही उन्होंने जो कहा वह मुश्किल से दिखाया गया हो, भाजपा के मंत्रियों और प्रवक्ताओं द्वारा उनके भाषण के जवाबों को विस्तार से कवर किया जाएगा. लेकिन उम्मीद के मुताबिक राहुल के भाषण के बाद जिन आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हुआ उससे हटकर क्या मीडिया कभी-कभी उस दूसरे भारत की ओर देख सकता है? शंकर और श्रीनाथ जैसे लोगों से बात करने से शायद कोई शानदार सुर्खियां न मिलें. लेकिन उनसे बात करने का मतलब है उनके अस्तित्व को स्वीकार करना, यह स्वीकार करना कि वे भी इस देश का उतना ही हिस्सा हैं जितने वह विशेषज्ञ जिन्हें हम पढ़ते-सुनते हैं.
पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव ने 2 फरवरी को इंडियन एक्सप्रेस में छपे अपने लेख में एक ऐसी टिप्पणी की है जिसे पूरे मीडिया को फॉलोअप करना चाहिए. वह लिखती हैं, “असमानताएं बढ़ी हैं. छोटी सी अवधि में लोगों ने चिकित्सकीय उपचार पर अनुमानित 70,000 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जो सरकार को देने चाहिए थे.” वह जिस अवधि की बात कर रही हैं वह कोविड महामारी है. ऑक्सफैम की रिपोर्ट जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है इसी बात की ओर इशारा करते हुए कहती है कि भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं वस्तुतः एक लग्जरी हैं, जो केवल उन्हें मिलती हैं जो इनके पैसे दे सकते हैं.
अब जबकि पिछले दो वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं पर रिपोर्टिंग सबसे महत्वपूर्ण हो गई है, फिर भी आपको ऐसी रिपोर्ट्स खोजने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी. ज्यादातर ऐसी रिपोर्ट्स केवल स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ही मिल सकती हैं.
उदाहरण के लिए, परी वेबसाइट पर पार्थ एमएन की इस रिपोर्ट को लें जो उत्तर प्रदेश के मुसहर समुदाय के बारे में है. यह समुदाय अनुसूचित जातियों में भी निचले पायदान पर है. यह रिपोर्ट न केवल बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के बारे में बताती है, बल्कि उस गहरे पूर्वाग्रह को भी उजागर करती है जिसके कारण एक गर्भवती मुसहर महिला को अस्पताल में भर्ती नहीं मिलती और उसे बाहर फुटपाथ पर ही अपने बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाता है.
एक अन्य महिला ने उन्हें बताया कि कैसे उनमें से कई लोगों ने पिछले साल महामारी की दूसरी लहर के दौरान बीमार होने पर अस्पताल जाने के बजाय घर पर ही रहना पसंद किया. "जब आप पहले से ही वायरस से डर रहे हों तो उसपर अपमानित कौन होना चाहता है?" उसने कहा.
पार्थ ने आस-पास के गांवों में मुसलमानों से भी बात की, जो उनके साथ होने वाले भेदभाव की कहानियां बताते हैं और आपातकालीन उपचार के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल जाने के लिए मजबूर होते हैं. नतीजतन, उनमें से ज्यादातर के ऊपर चिकित्सा व्यय के कारण भारी कर्ज चढ़ चुका है.
पार्थ की रिपोर्ट सुजाता राव की बात को पुष्ट करती है कि महामारी के दौरान लोगों को मजबूरी में चिकित्सा पर भारी खर्च करना पड़ा और उनपर कर्ज चढ़ गया. वह लिखते हैं, “यूपी के नौ जिलों के कई गांवों में, महामारी के पहले तीन महीनों (अप्रैल से जून 2020) में लोगों का कर्ज 83 प्रतिशत बढ़ गया. यह आंकड़े सामाजिक संगठनों के समूह कलेक्ट के एक सर्वेक्षण में एकत्र किए गए थे. जुलाई-सितंबर और अक्टूबर-दिसंबर 2020 की अवधि के दौरान लोगों का कर्ज में क्रमशः 87 और 80 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई."
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो इस प्रकार की बारीक रिपोर्टिंग आज अंग्रेजी के प्रिंट मीडिया से विलुप्त हो रही है. परिणामस्वरूप, वह 'दूसरा भारत' हमारी चेतना से गायब हो रहा है जहां इस देश के अधिकांश नागरिक रहते हैं.
पहले चुनावी कवरेज के दौरान पत्रकारों को ग्रामीण भारत में लोगों की वास्तविक समस्याओं को समझने का मौका मिलता था. आज आप केवल जाति और समुदाय की गणना और विभिन्न राजनीतिक दलों और राजनेताओं की ताकत और कमजोरियों के बारे में अंतहीन रिपोर्टें पढ़ते हैं.
यद्यपि इस तरह की रिपोर्ट्स भी आवश्यक हैं, लेकिन क्या इनको पढ़ने वाले लोगों को उन क्षेत्रों के बारे में कुछ पता चल पाता है? क्या इन जगहों का अपना इतिहास है? वहां आजीविका के क्या स्रोत हैं? क्या पानी उपलब्ध है? सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का क्या हाल है? क्या लोग वहां तक पहुंच पाते हैं या ज्यादातर लोग निजी डॉक्टरों से इलाज कराते हैं और कर्ज में डूब जाते हैं? और पर्यावरण के मुद्दों का क्या?
चुनावी रिपोर्टिंग में इन मुद्दों को भी उठाया जा सकता है. इससे पाठक भारत के कुछ हिस्सों की वह तस्वीर देख पाते हैं, जिन्हें आमतौर पर अनदेखा किया जाता है. वह हमारी दृष्टि में तभी आते हैं जब वहां कोई बड़ी आपदा आती है और, निस्संदेह, चुनाव के दौरान.
इस तरह की कहानियां नियमित और घिसी-पिटी रिपोर्ट्स की तुलना में कहीं अधिक दिलचस्प होती हैं. फिर भी, मुख्यधारा के मीडिया में ऐसी रिपोर्टिंग मिलना मुश्किल है. दूसरी ओर, न्यूज़लॉन्ड्री, वायर और स्क्रॉल जैसे स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म कम संसाधनों के साथ भी ऐसा कर रहे हैं.
यद्यपि कुछ लोगों ने राहुल गांधी की सराहना की है की उन्होंने अपने भाषण में इस 'दूसरे भारत' की याद दिलाई, फिर भी जल्द ही इसे भुला दिए जाने की संभावना है. जैसे-जैसे चुनाव का दिन नजदीक आ रहा है, बड़े मीडिया घराने पूरी तरह से विजेताओं और पराजितों के बारे में अटकलें लगा रहे हैं. इन सबके बीच, देश के शंकर और श्रीनाथ अभी भी जी रहे हैं, बमुश्किल.
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