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10 हजार एफपीओ की हालत खराब तो कैसे होगी किसानों की आय दोगुनी?
सरकारी नीतियों और किसानों की आय दोगुनी करने की योजना में किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) की भूमिका महत्वपूर्ण है, हालांकि एक ताजा विश्लेषण में पाया गया है कि इन सगंठनों के लिए फंड हासिल करना टेढ़ी खीर है.
द स्टेट ऑफ इंडियाज लिवलीहुड (एसओआईएल) की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सात सालों में केंद्र सरकार की इस योजना के तहत केवल एक से पांच फीसद एफपीओ को फंड मिल सका है.
रिपोर्ट तैयार करने वाले राष्ट्रीय आजीविका सहायता संगठन एक्सेस डेवलपमेंट सर्विसेज ने केवल किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीसी - एफपीओ, कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत) का विश्लेषण किया, क्योंकि ये हाल के सालों में शुरू किए गए किसान उत्पादक संगठनों का एक बड़ा हिस्सा हैं. सहकारी समितियों या समितियों के रूप में पंजीकृत एफपीओ की संख्या बहुत कम है.
2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया था कि देश में लगभग एक हजार एफपीओ बनाए जाएंगे. एफपीओ के लिए उनकी गतिविधियों में सहयोग करने के लिए धन प्राप्त करने की खातिर शुरू किए गए दो प्राथमिक कार्यक्रम, इक्विटी अनुदान योजना और क्रेडिट गारंटी योजना थी.
इक्विटी अनुदान योजना के तहत केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा लघु किसान कृषि-व्यवसाय सहायता संघ (एसएफएसी) 2014 से तीन साल की अवधि के भीतर दो चरणों में अधिकतम 15 लाख रुपए तक इक्विटी अनुदान की पेशकश कर रहा है.
हालांकि बहुत कम एफपीओ ऐसे हैं, जो इस अनुदान को हासिल करने की पात्रता रखते हैं. सितंबर 2021 तक, पिछले सात सालों में केवल 735 एफपीओ ऐसे रहे, जिन्हें यह अनुदान मिल सका है. यह देश में पंजीकृत कुल उत्पादक कंपनियों का महज पांच फीसद है.
वैसे, यह आंकड़ा भी एक बढ़ा-चढ़ाकर किए गए मूल्यांकन की वजह से मिला लगता है, क्योंकि अनुदान-स्वीकृति की हर किश्त को एक अलग मामले के तौर पर गिना जाता है और कोई भी व्यक्तिगत उत्पादक कंपनी, जो दोनों किश्तों को हासिल करती है, उसे दो बार गिना जाता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा संख्या (144) में अनुदान-स्वीकृत किए गए, उसके बाद तमिलनाडु (104) और फिर उत्तर प्रदेश (96) का नंबर आता है. प्रसार की दृष्टि से इस लिस्ट में पहला नंबर पश्चिम बंगाल का दूसरा कर्नाटक और तीसरा तमिलनाडु का है.
क्रेडिट गारंटी योजना में, जो एफपीसी को एक करोड़ रुपए तक के बिना गारंटी का लोन देने वाले बैंकों को जोखिम से बचाती है, उसमें केवल एक फीसद पंजीकृत निर्माता कंपनियां ही लाभ उठा पाई हैं.
सरकारी योजनाओं को सहयोग देने की योजना से तैयार किए गए एफपीओ का सफर आसान नहीं रहा है. 272 किसान सदस्यों के साथ करनाल में एक एफपीओ के निदेशक विकास चौधरी ने बताया कि वे एक साल से अधिक समय से जिले के तिलावडी गांव में टमाटर प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने के लिए बैंक से लोन लेने की कोशिश कर रहे हैं.
इस परियोजना को हरियाणा कृषि विभाग द्वारा अनुमोदित किया गया है. उनके मुताबिक, "यह सात करोड़ का प्रोजेक्ट है, जिसके फंड के लिए हम एक साल से कोशिश कर रहे हैं. बैंक चाहता है कि किसान इसके लिए अपनी जमीन को गारंटी के तौर पर रखें, जिसके लिए हम तैयार नहीं हैं. हमने इक्विटी अनुदान योजना के तहत भी प्रयास किया लेकिन उससे हमें केवल साढ़े तीन लाख रुपए ही मिले."
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ डेवलपमेंट में प्रोफेसर और एफपीओ पर अध्याय (जिसका शीर्षक- ‘किसान उत्पादक कंपनियां: मात्रा से गुणवत्ता तक’ है) की सह-लेखिका, रिचा गोविल ने बताया कि छोटे और सीमांत किसानों को सामूहिक रूप से संगठित करने में 10 हजार एफपीओ की नीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
इस दिशा में और प्रयास किए जाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि किसान लंबे समय से संकट का सामना कर रहे हैं. उनके मुताबिक, "चूंकि भारत के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, इसलिए यह उम्मीद करना यथार्थ से परे है कि वे बाजारों में इस तरह से भाग लेने के काबिल बनें, जिससे उन्हें पर्याप्त आय अर्जित करने और फलने-फूलने का मौका मिले."
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में ही स्कूल ऑफ डेवलपमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर अन्नपूर्णा नेति, भी इस अध्याय की सह-लेखिका हैं. उनके मुताबिक, हालांकि इस दिशा में सरकार के प्रयास काफी विस्तृत हैं लेकिन प्रयासों और लाभांवितों के बीच की दूरी पर ध्यान दिया जाना भी जरूरी है. दस हजार एफपीओ योजना के तहत सरकार काफी कोशिशें कर रही हैं, लेकिन जिस तरह से हर बिजनेस स्टार्ट-अप को सहयोग की जरूरत होती है, उसी तरह एफपीओ को भी है.
उन्होंने विस्तार से बताया कि एफपीओ को फंडिंग सुरक्षित करने, ग्राहकों की पहचान करने व उनके साथ संबंध बनाने और आंतरिक-शासन प्रक्रियाओं को स्थापित करने की आवश्यकता है. इसके लिए, उन्हें अपनी क्षमता-निर्माण करने की जरूरत है ताकि वे स्टार्ट-अप चरण से विकास और अंततः परिपक्वता तक पहुंच सकें. उनके मुताबिक, "यह एक फासला है जिस पर अभी ध्यान नहीं दिया गया है."
नेति इस पर जोर देती हैं कि सरकारी कार्यक्रमों तक एफपीओ की पहुंच की प्रकिया को सरल बनाना जरूरी है. साथ ही उसके लिए इक्विटी अनुदान और लोन मिलना भी आसान होना चाहिए. उनके मुताबिक, ऐसा या तो पात्रता के लिए सीमा को कम करके या पात्रता मानदंड तक पहुंचने के लिए एफपीओ का समर्थन करके, या दोनों तरीकों को एक साथ अपनाकर किया जा सकता है.
(डाउन टू अर्थ से साभार)
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