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स्टूडियो में बैठकर भारत बंद कवर करने का कारनामा कर दिखाया खबरिया चैनलों ने
किसानों को दिल्ली से सटे अलग-अलग बॉर्डर पर बैठे लगभग दस महीने का समय बीत गया है. ये किसान सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं. सरकार और किसान मोर्चे के बीच आखिरी बातचीत 22 जनवरी को हुई थी. उसके बाद से सरकार और किसान नेताओं में कोई वार्ता नहीं हुई है. बिना किसी समाधान के किसान बॉर्डर पर बैठे हैं.
सोमवार 27 सितम्बर को किसान मोर्चे ने ‘भारत बंद’ का आह्वान किया. बंद सुबह 6 बजे से शुरू हुआ और शाम 4 बजे तक जारी रहा. इस बंद का असर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखा गया. केवल देश के अलग-अलग राज्यों में ही नहीं, भारत बंद का असर न्यूज़ चैनलों पर भी अलग-अलग रूपों में देखा गया. हर प्राइम-टाइम और डिबेट शो का मुद्दा किसानों का भारत बंद था. सबने इस मुद्दे को अपना-अपना एंगल दिया. किसी ने फेक न्यूज़ तो किसी ने बेबुनियाद सवालों के सहारे 'भारत बंद' को ट्विस्ट और टर्न देने की कोशिश की.
ज़ी न्यूज़: स्टिंग ऑपरेशन
"लोकतंत्र में विरोध करना नागरिक का अधिकार है. जो बिलकुल सही है लेकिन उसी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के फैसले उन्हें मंज़ूर नहीं है. ये लोकतंत्र का नाम लेकर सड़कें जाम, हिंसा तोड़फोड़ करना चाहते हैं, देश चलने नहीं देना चाहते." ये हमारा नहीं सुधीर चौधरी का बयान है.
ज़ी न्यूज़ ने 'भारत बंद' को तीन हिस्सों में दिखाया. इसका पहला हिस्सा एक स्टिंग ऑपरेशन था. ज़ी ने एक पुराने स्टिंग ऑपरेशन और फेक न्यूज़ के सहारे किसानों और उनके नेताओं को निशाना बनाया. प्राइम टाइम शो, 'डीएनए' के एंकर सुधीर चौधरी ने #TikaitExposed दिखाया. यह स्टिंग ऑपरेशन 29 जुलाई, 2021 को भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत पर मुजफ्फरनगर में किया गया था. यह स्टिंग ऑपरेशन किसी जनहित या देशहित को ध्यान में रखकर नहीं किया गया था. बल्कि इस स्टिंग का मकसद किसान नेताओं को बदनाम करके सरकार का एजेंडा आगे बढ़ाना था.
सुधीर ने इस स्टिंग के बारे में बताया, "हमारे अंडरकवर रिपोर्टर ने नरेश टिकैत से कहा कि वो एक बिज़नेसमैन (उद्योगपति) हैं और उनकी कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट सिंगापुर की एक बड़ी विदेशी कंपनी से हुआ है जिसे गुड़ की फैक्ट्री लगाने के लिए ज़मीन चाहिए." सुधीर ने आगे कृषि कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि किसान आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि किसान अपनी ज़मीन बड़े उद्योगपतियों को नहीं देने चाहते.
इस स्टिंग में देखा जा सकता है कि नरेश टिकैत इस डील के लिए मान जाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि ज़मीन उनकी ही है और वो जब चाहे जिसके साथ चाहे सौदा कर सकते हैं. आगे वीडियो में दिखाया गया कि नरेश टिकैत मिल के दाम से कम दाम पर गन्ना बेचने को भी तैयार हैं यानी एमएसपी से कम कीमत पर. लेकिन नरेश टिकैत यह भी कहते हैं कि क्योंकि मिल इतना गन्ना नहीं ले पाता इसलिए बहुत सारा गन्ना बच जाता है जिसे बाजार में कम दाम पर बेचा जा सकता है.
डीएनए का पूरा ज़ोर यह साबित करने पर भी रहा कि कहां-कहां भारत बंद का असर नहीं दिखा.
शो के तीसरे चरण में सुधीर चौधरी उपदेशक बन गए- ‘पर उपदेश किुशल बहुतेरे.’ उन्होंने बताया कि किसानों को भारत बंद की जगह क्या करना चाहिए. सुधीर कहते हैं, "किसान ट्रैफिक खुलवा सकते थे. आज किसान खेतों में डबल काम करके सरकार का विरोध कर सकते थे. इससे लोग परेशान नहीं होते और कृषि उत्पाद डबल होता. वृक्षारोपण कर सकते थे. जो एक अच्छा संदेश देता."
इसके लिए सुधीर थाईलैंड का उदाहरण देते हैं. शो में बताया गया कि जब कोविड की वजह से थाईलैंड की एक कैब (टैक्सी) कंपनी की ढाई हज़ार गाड़ियां एक जगह खड़े रहने के लिए मजबूर हो गईं तो उसने इन गाड़ियों की छत पर खेती करना शुरू कर दिया और देखते ही देखते वहां की सरकार के खिलाफ ये लोकल प्रोटेस्ट एक ग्लोबल खबर बन गया. जबकि असलियत में यह एक फर्जी खबर है.
बीबीसी की खबर के मुताबिक थाईलैंड में कोविड के कारण कई ड्राइवर अपनी गाड़ियों को छोड़कर अपने घर लौट गए. एक कंपनी ने इन बेकार वाहनों की छतों पर सब्जी और पौधे उगाने का फैसला किया, जिससे उन्हें उम्मीद थी कि यहां से उगने वाली सब्जियां, काम न करने वाले ड्राइवरों और अन्य कर्मचारियों की मदद कर सकती हैं.
एबीपी न्यूज़: किसान से ज़्यादा मोदी की ताकत पर ज़ोर
“आप चार दिनों तक किसी विदेश यात्रा पर हैं. उसमें 65 घंटे हैं. उनमें 20 मुलाकातें कर रहे हैं. 31 घंटे की हवाई यात्रा कर रहे हैं. इन चार दिनों में 24 हज़ार किलोमीटर का सफर तय कर के वतन लौटते हैं. बताइए आप क्या करेंगे?” यह रुबिका लियाकत हैं.
रुबिका लियाकत के लिए शायद 'भारत बंद' उतना ज़रूरी नहीं था जितना ज़रूरी उनके लिए पीएम मोदी के स्टैमिना का परीक्षण. रुबिका अपने शो मास्टरस्ट्रोक की शुरुआत ऊपर वाला प्रश्न पूछकर करती हैं. और फिर वो खुद ही जवाब देती हैं- आप कहेंगे आराम करेंगे. और अगर मैं कहूं आपकी उम्र 71 साल है. आप कहेंगे तब भी आराम ही करेंगे. लेकिन आप जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह सब कहें तो आराम यकीनन उनकी डिक्शनरी में नहीं है."
किसानों की बात होती है कि उनके कारण 'भारत बंद' से देश के तमाम लोग घंटों तक जाम में फंसे रहे. सवाल किया गया क्या ऐसे भारत बंद से किसी को भी फायदा होगा? या इसकी वजह से आम जनता का केवल नुकसान होगा? रिपोर्ट में दिखाया गया क्यों इस तरह के बंद को बंद करने की ज़रूरत है. रिपोर्ट में किसान से ज़्यादा विपक्षी पार्टियों को दिखाया गया.
रुबिका ने संविधान के अनुछेद 19-डी का हवाला देते हुए भारत बंद को गलत ठहराया गया.
इंडिया टीवी: किसानों की आड़ में "एंटी-मोदी" सरकारों पर निशाना
"किसान नेताओं का मकसद मोदी सरकार को शर्मिंदा करना है. भारत बंद वहीं सफल क्यों होता है जहां एंटी-मोदी सरकारें हैं." ये रजत शर्मा हैं.
रजत शर्मा पीछे कैसे रह सकते थे. उन्होंने 50 मिनट के शो में 27 मिनट किसान आंदोलन के बारे में बात किया. इस दौरान उन्होंने जाम और जाम में फंसे लोगों के वीडियो दिखाए. साथ ही बीकेयू (भानु) के अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह का वो बयान दिखाया जिसमें उन्होंने राकेश टिकैत पर निशाना साधते हुए बंद को तालिबानी कदम बताया है.
रजत शर्मा के अनुसार महाराष्ट्र, अहमदाबाद, हरियाणा, पंजाब और बिहार को छोड़कर दूसरे राज्यों में भारत बंद का असर नहीं दिखा. भारत बंद को राजनीति से जोड़ा गया. उन राज्यों का ज़िक्र किया गया जहां बीजेपी की सरकार नहीं है और इसलिए वहां बंद का असर हुआ जैसे पंजाब में कांग्रेस की सरकार है इसलिए पंजाब में असर सबसे ज़्यादा देखा गया. रजत शर्मा ने राकेश टिकैत के एक ट्वीट का ज़िक्र करते हुए आरोप लगाया- "इससे यह पता चलता है कि किसान नेताओं की मंशा क्या है. अब उनका मकसद किसानों का भला करना नहीं है. उनका मकसद मोदी सरकार को शर्मिंदा करना है. भारत बंद वहीं सफल क्यों होता है जहां एंटी- मोदी की सरकारें हैं."
आजतक: कृषिमंत्री को 'रट्टूमल' क्यों कहा
"इस बंद को ज़्यादातर विपक्षी पार्टियों ने अपना समर्थन दिया. सरकार बार- बार अपील कर कर रही है कि आइए बातचीत करिए लेकिन किसानों के अगुवा नेता को रट्टूमल बता रहे हैं और कानून वापिस लेने की ज़िद पर अड़े हुए हैं." ये अंजना ओम कश्यप हैं.
अंजना ओम कश्यप ने हल्ला बोल पर किसान के भारत बंद की चर्चा की. पूरी चर्चा में किसान आंदोलन को राजनीतिक बताया गया. हर बार की तरह ही 26 जनवरी की हिंसा का ज़िक्र किया गया. किन संगठनों ने हिस्सा लिया और किस राज्य में कितना प्रभाव पड़ा यह भी दिखाया गया. अंजना ने कहा, "पंजाब और हरयाणा में भारत बंद के नाम पर ज़ोर- ज़बरदस्ती की गई. कहीं बाजार बंद करवा दिया गया तो कहीं सरकारी दफ्तर में कामकाज बंद करवा दिया गया. ट्रेनों की आवाजाही बंद कर दी गई. देश की 12 विपक्षी पार्टियां किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर गोलियां दागती रही. बॉल भले ही खेती कानूनों का हो और बल्ला किसानों का हो लेकिन मैदान सियासत का है " आंदोलन को यूपी और पंजाब चुनाव से जोड़ा गया. जबकि पूरी डिबेट में राकेश टिकैत बार-बार कहते रहे कि इसे राजनीति से ना जोड़ा जाए.
वहीं न्यूज़ 18 के अमीश देवगन ने अपने शो आर-पार में भी भारत बंद से आम जनता को होने वाली परेशानी और इसका राजनीतिक महत्व बताने लगे व इसे सियासी बताया. रिपब्लिक भारत में डिबेट शो महाभारत का मुद्दा था 'भारत बंद नहीं है'. भारत बंद को 'तथाकथित' बंद और फ्लॉप करार दिया. किसानों को 'आन्दोलनजीवी' कहा गया. हालांकि एंकर सुचरिता कुकरेती थोड़ा उलझी हुई दिखीं. उन्होंने 'आन्दोलनजीवी' मीडिया की पोल खोली जिसने भारत बंद को सही कहा. सुचरिता ने डीएनडी में लगे जाम की तस्वीर दिखाई फिर अपनी एंकर को उसी डीएनडी से रिपोर्टिंग करते हुए दिखाया जो यह बता रही थी कि जाम खुलने के बाद ट्रैफिक स्मूथ चल रहा था. वो कहती हैं, "दर्शक सुबह जाम की तस्वीरें देख रहे थे. पर वो कुछ देर के लिए था. अब यहां स्थिति बिलकुल नार्मल है और जाम का यहां असर नहीं दिखाई दे रहा. यह साफ है कि जनता को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता और वो इस बंद का समर्थन नहीं कर रही है."
एनडीटीवी: किसानों का भारत बंद क्यों सही
"भारत बंद करने वाले किसान अपने भारत में ही खुद बंद नज़र आ रहे हैं. ऐसा लगता है कि किसानों ने भारत बंद नहीं किया है बल्कि सरकार ने किसानों को उनके आंदोलन में बंद कर दिया है." ये रवीश कुमार हैं.
रविश कुमार ने अपने प्रेम टाइम शो के दौरान किसानों के भारत बंद को संवैधानिक रूप से सही ठहराया. उन्होंने ट्रैफिक जाम की भी बात की. रवीश दर्शकों को 2015 में ले जाते हैं जब नितिन गडकरी गुड़गांव-महिपालपुर रोड पर फंस गए थे. तब सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने 24 घंटे के भीतर दिल्ली में ट्रैफिक की समस्या के समाधान का आदेश दिए थे.
रवीश ने अमेरिका में आंदोलन के समर्थन में उतरे लोगों को दिखाया जो किसी और मीडिया ने नहीं दिखाया.
रवीश कहते हैं, "किसान आंदोलन को सिर्फ तीन कानूनों के विरोध का आंदोलन नहीं समझा जाना चाहिए. हर इलाके के हिसाब से अलग-अलग फसलों से जुडी मांगे भी किसान आंदोलन का हिस्सा बनती जा रही हैं. जाम तब भी लगता है जब किसानों का आंदोलन नहीं था. तब भी लगेगा जब किसानों का आंदोलन नहीं होगा. आंदोलन का हल निकालने में सरकार असफल है. लेकिन इस असफलता को आप जाम की समस्या से नहीं ढंक सकते."
लगभग हर टीवी चैनल ने भारत बंद की कवरेज और उस पर चर्चा की. लेकिन फील्ड पर रिपोर्टरों के होने के बावजूद किसी ने भी वहां बैठे किसानों से बात नहीं की. राकेश टिकैत और अन्य विपक्षी नेताओं को चर्चा में बुलाया गया. राजनीतिक पहलू पर बात हुई मगर टीवी चैनलों के जरिए खुद किसानों को अपनी बात रखने और भारत बंद के मायने समझाने का मौका नहीं मिला.
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