Opinion
तालिबानी सरकार देश चलाने के लिए चीन पर निर्भर!
तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने कहा है कि उनकी सरकार वित्तीय सहयोग के लिए मुख्य रूप से चीन पर निर्भर होगी और चीन की मदद से वे देश का आर्थिक पुनर्निर्माण करेंगे. उन्होंने चीन को अपना मुख्य सहयोगी बताते हुए यह भी कहा कि तालिबान चीन द्वारा निर्मित हो रहे नए सिल्क रूट (बेल्ट-रोड परियोजना) को बहुत सम्मान के साथ देखता है. मुजाहिद चीन को अफगानिस्तान के लिए वैश्विक बाजार का दरवाज़ा भी मानते हैं. तालिबान का यह नज़रिया अचरज की बात नहीं है और न ही अफगानिस्तान में निवेश चीन के लिए कोई पहला मौका होगा.
चीन-अफगानिस्तान की सीमा केवल 76 किलोमीटर लंबी है और बेहद दुरूह है, लेकिन दोनों देशों के आर्थिक संबंध लंबे समय से हैं तथा पहले भी तालिबान ने अनेक चीनी परियोजनाओं का समर्थन किया है. साल 2019 में अफगानिस्तान में चीन का 400 मिलियन डॉलर से अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश था, जबकि अमेरिकी निवेश केवल 18 मिलियन डॉलर था. दोनों देशों की सीमा से आवागमन की आसानी के लिए वखान गलियारा परियोजना के तहत अफगान सरकार 50 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कर रही है. पूरी परियोजना, जो चीन के बेल्ट-रोड परियोजना का हिस्सा है, की प्रस्तावित लंबाई 350 किलोमीटर है. अभी तक सड़क का 20 फीसदी काम ही हुआ है और इसे पूरा करने के लिए चीन की मदद की दरकार होगी. इससे न केवल दोनों देशों के बीच आवाजाही आसान होगी, बल्कि अफगानिस्तान चीन की खनन परियोजनाओं के लिए भी सहूलियत हो जायेगी.
अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए व्यापक निवेश की आवश्यकता है. आकलनों की मानें, तो 3.8 करोड़ की आबादी का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा ग़रीबी में है. 50 वर्षों से जारी युद्ध, आतंक और हिंसा ने उस देश को हर तरह से तबाह कर दिया है. इससे उबरने का एक ही उपाय है कि अफगान धरती के नीचे दबे लगभग तीन ट्रिलियन डॉलर के प्राकृतिक संसाधनों को निकाला जाए और उससे अर्जित आमदनी से शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों का विकास हो. यह इसलिए भी जरूरी है कि अफगान अर्थव्यवस्था की निर्भरता अफीम की खेती पर न रहे. अफगानिस्तान की स्थिरता की गारंटी का आधार केवल आर्थिक विकास हो सकता है. इससे उसके मध्य एशियाई और दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों को भी लाभ होगा.
निश्चित रूप से चीन इसमें सबसे अधिक सहायता करने की स्थिति में है. अमेरिका और पूर्व अफगान सरकार की निकटता के कारण बेल्ट-रोड परियोजना में जो बाधाएं थीं, अब वे दूर हो जायेंगी. यह चीन के फायदे में भी है. लीथियम और अन्य खनिज पदार्थों के साथ उसे रेयर अर्थ मटेरियल्स की बड़ी मात्रा भी हाथ आ सकती है. इन पदार्थों के 80 फ़ीसदी वैश्विक उत्पादन पर चीन का एकाधिकार है. लेकिन आस-पड़ोस के सभी देशों को भी व्यापारिक लाभ मिलेगा.
मध्य एशियाई देश अफगानिस्तान के रास्ते भारत और पाकिस्तान के बंदरगाहों तक पहुंच सकते हैं. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे, ग्वादर और चाबहार बंदरगाहों जैसी परियोजनाओं के तेज़ विकास के साथ तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत पाइपलाइन परियोजना को भी नया जीवन मिल सकता है. उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान में प्राकृतिक गैस का भंडार भी है. अन्य खनिजों के साथ पश्चिमी देशों समेत समूची दुनिया को आज लीथियम और प्राकृतिक गैस की बड़ी जरूरत है.
निश्चित रूप से अफगानिस्तान का आर्थिक भविष्य उसकी राजनीतिक स्थिरता पर निर्भर करेगा तथा चीन या अन्य देशों के निवेश, परियोजनाओं आदि की सुरक्षा का मसला प्राथमिक होगा, लेकिन चीन ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि शिनजियांग में सक्रिय आतंकी गिरोहों से तालिबान को अपने संबंध तोड़ने होंगे. आतंक को शह देने के मामले पर अमेरिका, रूस, यूरोप और चीन की एक राय है. तालिबान ने भी भरोसा दिलाया है कि वह किसी भी देश के खिलाफ अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल नहीं होने देगा.
इस मामले में दो बातें रेखांकित की जानी चाहिए. अफगानिस्तान के भीतर ऐसे आतंकी गुट हैं, जो तालिबान को चुनौती दे रहे हैं तथा तालिबान और उसके विरोधी गुटों के संबंध उन गिरोहों से भी हैं, जो चीन के अलावा ईरान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि पड़ोसी देशों में सक्रिय हैं. तो, इन पर नकेल कसना न केवल तालिबान के अपने अस्तित्व के लिए ज़रूरी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी इस प्रयास में उसकी मदद करनी होगी क्योंकि आतंक एक वैश्विक चुनौती है और तालिबान अकेले दम पर दशकों के जटिल आतंकी ताने-बाने को ख़त्म नहीं कर सकता है.
इसके साथ यह भी ध्यान रखना होगा कि अफगानिस्तान का आर्थिक विकास भी अकेले चीन नहीं कर सकता है और चीन हड़बड़ी में भी नहीं है. आज जिस प्रकार मानवीय मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयास हो रहे हैं, वैसी ही साझा कोशिशों की ज़रूरत आगे पड़ेगी. जहां तक चीन के सहयोग की बात है, तो वह यह जानता है कि बीते दशकों में आर्थिक और सैनिक प्रगति के बावजूद चीन समुद्र में पश्चिम देशों की बराबरी अभी नहीं कर सकता है. उसे सड़कों, रेलमार्गों और जलमार्गों के मिले-जुले नेटवर्क से ही अपने आर्थिक हितों का विस्तार करना होगा.
14वीं सदी में मिंग राजवंश के दौर में समुद्र में चीन का एकछत्र साम्राज्य था, लेकिन अचानक उस राजवंश ने चीन को एक दीवार के दायरे में बंद कर दिया और फिर यूरोपीय पाइरेटों ने लहरों पर कब्जा कर लिया और दुनिया ने भोगा गुलामों का कारोबार और उपनिवेशवाद. चीन मिंग राजवंश की भूल को दोहराना नहीं चाहेगा और पिछले साल राष्ट्रपति शी जिनपिंग कह भी चुके हैं कि वे दुनिया से मुंह नहीं मोड़ेंगे.
इससे जुड़ी एक और बात अहम है. मिंग राजवंश ने समुद्र से और अन्य तरह से दुनिया से ज़रूर चीन को अलग कर लिया था, पर दुनिया ने चीन को अकेला नहीं छोड़ा और 19वीं व 20वीं सदी में लंबे समय तक हर ताकतवर देश- ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, जापान, कोरिया आदि- ने चीन को रौंदा. चीनी इतिहास में वह दौर ‘अपमान की सदी’ के नाम से जाना जाता है. वह दौर बहुत हद तक अफगानिस्तान के बीते 50 साल की तरह था. उसी दौर में चीनी आबादी को अफीम का आदी बनाकर कंगाल और बदहाल कर दिया गया, जिससे उबरने के लिए चीन को 20वीं सदी के 60 के दशक तक इंतजार करना पड़ा.
चीन अफीम के कहर को दुनिया के किसी भी देश से अधिक जानता-समझता है, अमेरिका से भी अधिक, जहां हर साल 70 हज़ार लोग अफीम से बने मादक पदार्थों व दवाओं के अत्यधिक सेवन से मारे जाते हैं. अफीम ही नहीं, चीन हिंसा, युद्ध, अकाल, अशिक्षा, बीमारी आदि के उस अवसाद और पिछड़ेपन को भी 50-60 के दशक में देख चुका है, जिससे अफगानिस्तान आज गुजर रहा है. जैसा कि कुछ विश्लेषकों ने रेखांकित किया है, वे दिन मौजूदा चीनी नेताओं की अपनी यादों में हैं. वे चाहेंगे कि अफगान इस दुर्दशा से निकलें.
वे यह भी जानते हैं कि इससे निकलने की राह शिक्षा ही है. इसलिए, तालिबान की शिक्षा नीति को लेकर चाहे जो आशंकाएं हों, नयी सरकार को शिक्षा पर ध्यान देना ही होगा, अन्यथा कोई निवेश कारगर नहीं होगा. चीन को भी मिंग राजवंश के अनुभव के साथ सातवीं-आठवीं सदी के तांग राजवंश के अनुभव को भी याद करना होगा, जब आज के अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर उसका शासन था और चीन की समृद्धि में इस क्षेत्र के साथ इस क्षेत्र से गुजरने वाले सिल्क रूट का बड़ा योगदान था. लेकिन अब्बासी खिलाफत से जंग हारकर तांग राजवंश को ये इलाके छोड़ने पड़े और कुछ समय बाद मिंग राजवंश की तरह तांग राजवंश का भी खात्मा हो गया. साम्राज्यों की कब्रगाह में खेमा लगाते हुए थोड़ा सिहरना और सतर्क रहना बीजिंग के लिए भी अच्छा रहेगा. वैसे चीनी बहुत धैर्यवान होते हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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