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जलवायु संकट: "मौसम में आए बदलाव ने करीब 6 अरब लोगों को जोखिम में डाला"

जून-जुलाई 2021. हाल के जलवायु इतिहास में ये दो महीने काफी ज्यादा बदलाव से भरे रहे. दुनिया ने मौसम संबंधी ऐसी घटनाओं की सूचना दी, जो न केवल तीव्रता में अधिक थीं, बल्कि अपनी प्रकृति में भी उलट थीं.

इस दौरान, मौसम ने इतनी बार रिकॉर्ड तोड़े कि वैज्ञानिकों ने इसका वर्णन करने के लिए एक नई शब्दावली का उपयोग करना शुरू कर दिया, "रिकॉर्ड तोड़ने वाली मौसम की घटनाएं". मौसम में आए इस बदलाव ने लगभग 6 अरब लोगों को जोखिम में डाल दिया, जो मौसम की विपरीत घटनाओं को लगातार सहन कर रहे थे.

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) 9 अगस्त को साइंस ऑफ़ क्लाइमेट चेंज पर बहु-प्रतीक्षित रिपोर्ट जारी करेगा. यह रिपोर्ट 2013 से अपडेटेड होगी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करेगी.

पिछले एक साल के दौरान, कोविड-19 महामारी कई देशों के लिए सबसे मुख्य मुद्दा रहा. कोविड-19 फ्रंट-पेज पर छाया रहा और इस वजह से प्रलयकारी बाढ़, ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ की चादर पिघलने और गिरने, तेज गर्मी, लू (हीट वेव) और जंगल की आग जैसी खबरें मीडिया की सुर्खियों से गायब रहीं.

इंस्टीट्यूट फॉर एटमॉस्फेरिक एंड क्लाइमेट साइंस, ईटीएच ज्यूरिख के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक और यूएन क्लाइमेट साइंस असेसमेंट के प्रमुख लेखक एरिक फिशर ने कहा, "वर्तमान में जलवायु ऐसा व्यवहार कर रही है जैसे कोई एथलीट स्टेरॉयड सेवन के बाद व्यवहार करता है." फिशर ने हाल ही में ग्लोबल वार्मिंग के कारण इस तरह की "रिकॉर्ड तोड़" घटनाओं पर एक पेपर प्रकाशित किया है.

नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) की ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट जून 2021 के अनुसार, जून में वैश्विक सतह का तापमान 142 वर्षों के दौरान 5वीं बार सबसे अधिक था. यह 20वीं सदी के औसत से 0.88 डिग्री सेल्सियस अधिक था. यह एक रिकॉर्ड था.

ये महीना इस गरम होते ग्रह के लिए एक और गंभीर समय रहा. यह लगातार 45वां जून था, जिसका तापमान 20वीं सदी के औसत से अधिक था और साथ ही ये सामान्य से अधिक तापमान वाला लगातार 438वां महीना भी रहा.

अप्रैल 2017 में, जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्ट करने और शोध करने वाले वैज्ञानिकों और पत्रकारों के एक अंतरराष्ट्रीय संघ, क्लाइमेट सेंट्रल के वैज्ञानिकों ने एक आश्चर्यजनक चार्ट जारी किया. यह चार्ट 1880 के बाद से महीने दर महीने हो रहे तापमान वृद्धि को दर्शाता है. चार्ट बताता है कि "628 महीनों में एक भी ठंडा महीना नहीं रहा है."

यदि किसी का जन्म फरवरी 1986 में हुआ है, तो उसने वास्तव में कभी भी सामान्य तापमान वाले महीने का अनुभव नहीं किया. इसके बाद प्रत्येक माह औसत से अधिक गर्म रहा है. इस पीढ़ी को एक अशुभ ग्रह विरासत में मिला है. उनके जीवनकाल में, जीएचजी उत्सर्जन में लगातार और अनियमित वृद्धि हुई है. वैश्विक तापमान में वृद्धि हुई और इसके परिणामस्वरूप जलवायु में परिवर्तन हो रहा है.

यह परिवर्तन चरम मौसमी घटनाओं के जरिये देखा जा सकता है. ग्रहों के वायुमंडलीय चरित्र में भारी परिवर्तन हो रहा है. शुरुआत में असाधारण मौसम की घटनाएं बहुत कम देखने को मिलती थीं. लेकिन, जल्द ही ये आम होने लगे और हाल के समय में तो ये और भी खतरनाक होते चले गए.

2018 में, "स्पेशल रिपोर्ट ग्लोबल वार्मिंग ऑफ़ 1.5°सी" का अनुमान था कि वैश्विक आबादी का 2/5 हिस्सा 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में रहता है. इस रिपोर्ट ने चेतावनी दी, "तापमान में वृद्धि के कारण पहले से ही मानव और प्राकृतिक प्रणाली में बड़ा परिवर्तन हुआ है. कुछ प्रकार के चरम मौसम, सूखा, बाढ़, समुद्र स्तर में वृद्धि और जैव विविधता के नुकसान में वृद्धि हुई है. इससे कमजोर व्यक्तियों और आबादी के लिए अभूतपूर्व जोखिम पैदा हो रहा है."

2015 के बाद से सभी साल रिकॉर्ड गर्मी रही. हर दूसरे साल ने पहले के रिकॉर्ड को तोड़ा. 2020 इतिहास का दूसरा सबसे गर्म साल रहा. कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों की वायुमंडलीय सांद्रता ने भी 2020 में रिकॉर्ड तोड़ दिया था और ऐसी संभावना है कि यह रिकॉर्ड भी 2021 में टूट जाएगा. अप्रैल 2021 में, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता 416 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) के उच्चतम मासिक स्तर पर पहुंच गई.

फिशर ने नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित अपने हालिया पेपर में कहा, "उच्च-उत्सर्जन की स्थिति में, सप्ताह भर की चरम गर्मी, जो तीन या इससे अधिक मानक विचलन से आगे जा कर रिकॉर्ड तोड़ती है, 2021-2050 में दो से सात गुना अधिक हो जाएगी. यही चीज पिछले तीन दशकों की तुलना में 2051-2080 के दौरान तीन से 21 गुना अधिक होने की संभावना है. 2051-2080 में, उत्तरी मध्य अक्षांश में कहीं न कहीं हर 6-7 वर्षों के बीच ऐसी घटनाओं के होने का अनुमान है."

दुनिया ने जुलाई 2021 में इसका जीवंत उदाहरण देखा. यह महीना इस बात का सबूत था कि हमारा ग्रह एक न्यू नार्मल के रूप में क्या सहन करने जा रहा है. इसकी विनाशकारिता और अप्रत्याशितता ने भयभीत कर दिया. ऐसा लगा जैसे सामान्य मौसम का अब अस्तित्व ही नहीं रहा और मौसम की भौगोलिक पहचान अप्रासंगिक हो गई हो.

जुलाई 2021 के लिए सतह की हवा का तापमान

यूरोपीयन कमीशन के कॉपरनिकस के अनुसार, "जुलाई 2021 विश्व स्तर पर रिकॉर्ड तीसरा सबसे गर्म जुलाई है. जुलाई 2019 और जुलाई 2016 की तुलना में यह 0.1 डिग्री सेल्सियस से कम ठंडा रहा है". कॉपरनिकस ने कहा, "जुलाई आमतौर पर विश्व स्तर पर वर्ष का सबसे गर्म महीना होता है. हालांकि, अगस्त भी कभी-कभी गर्म हो सकता है. जुलाई 2019 और जुलाई 2016 के अलावा, डेटा रिकॉर्ड में जुलाई 2021 किसी भी पिछले महीने की तुलना में वैश्विक रूप से गर्म था.”

जुलाई 2021 में 2011 के बाद से सबसे अधिक मौसम की चरम घटनाएं देखी गईं, जिसमें सभी महाद्वीपों में 52 महत्वपूर्ण आपदाएं आईं. जुलाई 2020 की तुलना में इस महीने 132 प्रतिशत अधिक हाइड्रोलॉजिकल और मौसम संबंधी आपदाएं आईं. वैज्ञानिक अध्ययन अक्सर इसका कारण जलवायु परिवर्तन बताते हैं. इस महीने ने 2021 के अंतिम छह महीनों के रूझान का अनुसरण किया है.

जनवरी-जुलाई, 2021 के बीच कम से कम 227 प्राकृतिक आपदाएं हुईं. इनमें मौसम संबंधी आपदाएं, जैसे अत्यधिक तापमान, कोहरा और तूफान, जल विज्ञान संबंधी आपदाएं जैसे वेव एक्शन, भूस्खलन, बाढ़ और जंगल की आग, हिमनद का फटना और सूखा जैसी जलवायु संबंधी आपदाएं शामिल हैं. यह 2011 के बाद से पहले सात महीनों में सबसे अधिक रिपोर्ट किया गया. इन सात महीनों के दौरान, 92 देशों में कम से कम 18 प्राकृतिक आपदाओं ने 10 से 1,000 वर्षों के बीच के रिकॉर्ड तोड़ दिए.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के महासचिव पेटेरी तालस ने कहा, "कोई भी देश, विकसित या विकासशील, इससे बचा नहीं है. जलवायु परिवर्तन अभी और होना है." जुलाई में एक भी दिन ऐसा नहीं था जो न्यू नार्मल (नया सामान्य) मौसम का संकेत न देता हो.

जुलाई 13-14 में, जर्मनी में तूफान के कारण 15 सेंटीमीटर अधिक वर्षा हुई. जर्मन राष्ट्रीय मौसम विज्ञान सेवा ने कहा कि सिर्फ दो दिनों में दो महीने की बारिश हुई. यह ऐसे समय में हुआ जब ऊपर की एक मीटर मिट्टी नम थी. यह जलप्रलय का कारण बना. चांसलर एंजेला मर्केल ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "जर्मन भाषा इस तबाही का बमुश्किल ही वर्णन कर सकती है." बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग में भी विनाशकारी बाढ़ देंखी गईं.

इसके विपरीत, स्कैंडिनेवियाई देशों ने बहुत अधिक गर्मी का सामना किया. फ़िनलैंड के मौसम विभाग के अनुसार, जून सबसे गर्म महीना था. फ़िनलैंड के कौवोला अंजाला शहर ने 1961 के बाद से देश की सबसे लंबी हीटवेव दर्ज की. लगातार 31 दिनों तक इसका तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर था, जो देश में हीट वेव घोषित करने की ऊपरी सीमा थी.

संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में जून की गर्मी की यादें अभी भी ताजा थीं. 9 जुलाई को, कैलिफोर्निया में डेथ वैली ने ऐतिहासिक 54.4 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया. लास वेगास ने अपने सर्वकालिक रिकॉर्ड 47.2 डिग्री सेल्सियस का अनुभव किया. इसी तरह, ब्राजील सबसे खराब सूखे में से एक का अनुभव कर रहा है. अधिकारियों ने नवंबर 2021 तक पराना बेसिन और इस क्षेत्र में सूखे से प्रभावित सभी क्षेत्रों के लिए सूखा आपातकाल घोषित कर दिया है.

20 जुलाई तक, साइबेरिया में जंगल की आग ने रूस के याकुतिया क्षेत्र के उत्तर-पूर्व में कम से कम 1.5 मिलियन हेक्टेयर जमीन को बर्बाद कर दिया था. रूस के इस क्षेत्र में पिछले पांच महीनों से जंगल में आग लगी हुई है. स्थानीय मीडिया ने अधिकारियों के हवाले से इस गर्मी को 150 साल का सबसे अधिक गर्म बताया है. मॉस्को टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है, "लोगों ने पहले ऐसा कभी नहीं देखा था, जिसे दुनिया की सबसे खराब वायु प्रदूषण घटनाओं में से एक कहां जा रहा है. इस मौसम की आग से बने घने धुंध ने दिन को रात में बदल दिया."

शुष्क, गर्म मौसम और बढ़ती आग पृथ्वी के सबसे ठंडे क्षेत्र के लिए न्यू नार्मल लग रहा था. याकुतिया की राजधानी याकुतस्क (बर्फ की सतह पर बनने वाला एकमात्र शहर) में अधिकतम 20 डिग्री सेल्सियस के उलट 35 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया. यह जंगल की आग से उत्पन्न हीटवेव के कारण था.

इसका असर दूर-दराज के इलाकों तक फैल गया. यूरोपीय संघ के अर्थ ऑब्जर्वेशन प्रोग्राम कॉपरनिकस के अनुसार, 1 अगस्त को जंगल की आग का धुआं 3,200 किलोमीटर से अधिक बहने के बाद उत्तरी ध्रुव तक पहुंच गया था. अगस्त के मध्य तक यह देश को वायु प्रदूषण संकट में डालते हुए कनाडा पहुंच गया होगा.

इससे और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड पैदा हुई, जिसने ग्लोबल वार्मिंग प्रक्रिया को बढ़ावा दिया. कॉपरनिकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस ने अनुमान लगाया कि साखा गणराज्य में जंगल की आग के कारण इस साल 1 जून से 65 मेगाटन कार्बन डाइऑक्साइड निकल चुका है. यह पहले से ही 2003-2020 के औसत स्तर से ऊपर था.

2020 में, याकूतिया क्षेत्र में जंगल की आग के कारण 2018 में मेक्सिको के ईंधन खपत के बराबर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुआ. यह आर्कटिक जंगल की आग के कारण 2019 के कार्बन उत्सर्जन से 35 प्रतिशत अधिक था. उम्मीद है कि इस साल 2020 का रिकॉर्ड भी टूट जाएगा.

इस साल मई में संयुक्त राज्य अमेरिका के नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की कार्यवाही में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर “पर्माफ्रोस्ट कार्बन फीडबैक थ्रेटेन ग्लोबल क्लाइमेट गोल्स” में चेतावनी दी गयी है कि, "तेज गति से हो रही आर्कटिक वार्मिंग ने उत्तरी जंगल की आग को तेज कर दिया है और कार्बनयुक्त पर्माफ्रॉस्ट को पिघला रहा है. पर्माफ्रॉस्ट थॉ और आर्कटिक जंगल की आग से हो रहे कार्बन उत्सर्जन, जिसका वैश्विक उत्सर्जन बजट में हिसाब नहीं है, ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को बहुत कम कर देगा, जो इंसान 1.5 डिग्री सेल्सियस या दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रहने के लिए उत्सर्जित कर सकते हैं."

2021 में चरम मौसम की घटनाओं से एशिया सबसे बुरी तरह प्रभावित महाद्वीप बना रहा. जून के बाद से, अभूतपूर्व वर्षा से पहले गंभीर बाढ़ की घटनाएं देखने को मिलीं. चीन के हेनान प्रांत ने 17 जुलाई के बाद से केवल पांच दिनों के भीतर अपने वार्षिक वर्षा से अधिक वर्षा दर्ज की.

प्रांत की राजधानी शहर झेंग्झौ पानी में डूबा हुआ था और इसकी वार्षिक वर्षा का आधा हिस्सा 20 जुलाई को केवल छह घंटों में जमा हो गया था. चीनी मीडिया ने झेंग्झौ के मौसम अधिकारियों के हवाले से कहा कि शहर की बारिश "एक हजार साल में एक बार" जैसी घटना थी. कुछ मीडिया रिपोर्टों ने इसे "हर 5000 साल में एक बार" जैसी घटना के रूप में इसे बताया है.

भारत में मानसून 13 जुलाई तक रुका हुआ था. जब यह सक्रिय हुआ, तो यह असामान्य रूप से उच्च वर्षा वाली घटनाओं का एक समूह था. भारतीय मौसम विभाग, गोवा के वैज्ञानिक राहुल एम ने बताया कि राज्य में 10-23 जुलाई, 2021 तक औसत से 122 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई. राज्य में औसत वर्षा 471 मिमी के मुकाबले 1047.3 मिलीमीटर दर्ज की गई, जो इस दौरान बारिश की गतिविधि में वृद्धि के कारण दर्ज की गई थी. 23 से 24 जुलाई के बीच, उत्तर और दक्षिण गोवा के जिलों में 24 घंटों में 23 इंच तक बारिश हुई.

मूसलाधार बारिश के कारण भूस्खलन हुआ और राज्य के निचले इलाकों में पानी भर गया. महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला में भीषण बाढ़ आई, जिसने 200 से अधिक लोगों की जान ले ली. जुलाई में इसने सबसे अधिक वर्षा का 40 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया. आईएमडी और फ्लडलिस्ट वेबसाइट के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जुलाई से 22 जुलाई के बीच जिले में 1781 मिलीमीटर बारिश हुई है. जिले के लिए औसत जुलाई वर्षा 972.5 मिमी है. 23 जुलाई को कोल्हापुर जिले में 232.8 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य बारिश से लगभग 10 गुना अधिक थी.

उसी दिन, सतारा जिले में भी सामान्य से सात गुना ज्यादा बारिश हुई. आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार, इनमें से सबसे खराब बाढ़ मुंबई की थी क्योंकि शहर और उसके उपनगरीय इलाकों में 18 जुलाई को क्रमश: 180.4 मिमी और 234.9 मिमी बारिश हुई थी. ये आंकड़े दो क्षेत्रों के लिए सामान्य दिन में हुई बारिश से क्रमश: छह और सात गुना अधिक थे.

इस साल जून-जुलाई की घटनाएं न केवल एक चेतावनी थीं बल्कि नई वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए एक भारी झटका भी थीं. जलवायु की चरम घटनाएं अब युद्ध और जैविक घटनाओं से अधिक संख्या में आ रही हैं और अधिक आर्थिक नुकसान का कारण बनती हैं.

1960 और 2018 के बीच, प्राकृतिक आपदाओं की संख्या, युद्धों की तुलना में 25 गुना और 2008 जैसी वित्तीय संकट की तुलना में 12 गुना अधिक थी. विश्व बैंक की "ग्लोबल प्रोडक्टिविटी: ट्रेंड्स, ड्राइवर्स एंड पॉलिसीज" अध्ययन के अनुसार, प्राकृतिक आपदा, चक्रवात और चरम मौसम की घटनाएं दुनिया की अर्थव्यवस्था और श्रम उत्पादकता को नुकसान पहुंचाने वाले कारक के रूप में अधिक तेजी से उभर कर सामने आ रहे हैं. इस अवधि में, सभी प्राकृतिक आपदाओं का 70 प्रतिशत हिस्सा जलवायु संबंधी था और वे कोविड-19 जैसी जैविक आपदा की तुलना में ज्यादा बार (दोगुनी) घटित हुई हैं.

इस अवधि के दौरान, जलवायु आपदाओं ने श्रम उत्पादकता में सालाना 0.5 प्रतिशत की कमी ला दी, जो श्रम उत्पादकता पर युद्ध के प्रभाव का लगभग पांचवां हिस्सा था. लेकिन जलवायु से संबंधित आपदाओं की संख्या इतनी अधिक थी कि कुल मिलाकर श्रम उत्पादकता का अधिक नुकसान हुआ.

डब्ल्यूएमओ द्वारा शीघ्र प्रकाशित होने वाली एक रिपोर्ट ("एटलस ऑफ़ मोर्टालिटी एंड इकॉनोमिक लॉसेज फ्रॉम वेदर, क्लाइमेट एंड वेदर एक्सट्रीम्स (1970-2019)”) से पता चला है कि वैश्विक स्तर पर पिछले 50 सालों के दौरान, सभी आपदाओं का 50 फीसदी, सभी मौतों का 45 फीसदी और सभी आर्थिक नुकसानों का 74 फीसदी कारण मौसम, जलवायु और पानी से संबंधित (तकनीकी खतरों समेत) खतरे रहे.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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