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एनएल इंटरव्यू: ‘आतंकवाद के आरोपियों को अदालतें बाइज़्ज़त बरी कर देती हैं, लेकिन समाज और मीडिया नहीं’
आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में लंबे समय तक जेल में रहने के बाद बरी हुए 16 मुस्लिम युवाओं की कहानी को एकत्रित कर हाल ही में ‘बाइज़्ज़त बरी?’ नाम की किताब छपी है. इस किताब के लेखक पत्रकार मनीषा भल्ला और डॉ. अलीमुल्लाह खान हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता बसंत कुमार ने मनीषा भल्ला और डॉ. खान से उनकी किताब को लेकर बातचीत की.
किताब के नाम के बाद प्रश्नवाचक चिन्ह क्यों लगाया गया? इस सवाल के जवाब में मनीषा भल्ला कहती हैं, ‘लंबे समय तक जेल में रहने और कानूनी संघर्ष के बाद ये लोग कोर्ट से बाइज़्ज़त बरी तो हो जाते हैं, लेकिन समाज, रिश्तेदार और मीडिया कभी बरी नहीं कर पाता है. लोग दूरी बना लेते हैं.’’
भल्ला आगे कहती हैं,’’जब भी कहीं कोई बम धमाका होता है और पुलिस की गाड़ी आसपास से गुजरती है तो ये लोग डर जाते हैं. मीडिया बरी होने के बाद भी इन्हें आंतकी लिखता है. कानपुर के रहने वाले सैय्यद वासिफ हैदर खान एक बेहतरीन नौकरी करते थे. उन्हें गिरफ्तार किया गया. नौ साल के क़ानूनी संघर्ष के बाद वे बाइज्ज़त बरी हुए, लेकिन आज भी मीडिया उन्हें आतंकवादी लिखता है.’’
‘‘ऐसे में बरी होने के बाद बस सलाखें नहीं होती बाकी हर तरह की परेशानी रहती है.’’ भल्ला कहती हैं.
भारत में लंबे समय से इस तरह की खबरें आती रही हैं. अभी हाल ही में कश्मीर के रहने वाले बशीर अहमद 11 साल जेल में रहने के बाद बरी हुए. उन्हें गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में साल 2010 के आतंकवादी निरोधी दस्ते ने गिरफ्तार किया था.
बशीर अहमद एक एनजीओ के वर्कशॉप में शामिल होने गए थे, लेकिन उन्हें विस्फोटक रखने और आतंकवादी गतिविधियों की योजना बनाने का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया. 11 साल बाद बशर को अदालत ने बाइज़्ज़त बरी कर दिया. ऐसे में बीबीसी से बात करते हुए वे कहते हैं, ‘‘मैं बेकसूर हूं तो मेरा गुजरा वक़्त भी लौटा दो.’’
इतनी कहानियों के बीच आपने सिर्फ 16 लोगों की कहानी कहने का फैसला क्यों किया? इस सवाल के जवाब में अलीमुल्लाह खान कहते हैं, ‘‘इन 16 लोगों की कहानी उन हज़ारों लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिन्हें साजिशन जेल में डाला गया और वे अपना सबकुछ खोकर जेल से रिहा हुए.’’
पूरा इंटरव्यू देखें.
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